
सुप्रीम कोर्ट ने समन्वित चुनावी खर्च की सीमा हटाई, रिपब्लिकन को मध्यावधि चुनाव में संभावित बढ़त
6-3 के फैसले में अदालत ने कहा कि यह सीमा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है; इस कदम से धनी दानदाताओं का प्रभाव बढ़ने और भ्रष्टाचार की आशंकाओं पर बहस तेज हो गई है।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक ऐतिहासिक फैसले में राजनीतिक दलों और उनके उम्मीदवारों के बीच समन्वित चुनावी खर्च पर पिछले पचास वर्षों से लागू संघीय सीमा को समाप्त कर दिया। 6-3 के बहुमत से आए इस निर्णय के तहत अब रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों दल अपने उम्मीदवारों के प्रचार, विज्ञापन और रैलियों पर बिना किसी ऊपरी सीमा के धन खर्च कर सकेंगे। यह मामला 2022 में तत्कालीन सीनेट उम्मीदवार जे.डी. वेंस और रिपब्लिकन कांग्रेसी समितियों द्वारा दायर किया गया था, जिसमें तर्क दिया गया कि यह सीमा संविधान के पहले संशोधन का उल्लंघन करती है।
न्यायालय के रूढ़िवादी बहुमत की ओर से न्यायमूर्ति ब्रेट कवानॉ ने लिखा कि संवैधानिक पाठ, इतिहास और पूर्व निर्णय यह स्थापित करते हैं कि राजनीतिक दलों के समन्वित खर्च पर प्रतिबंध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है। बहुमत ने 2001 के एक पूर्व फैसले को पलटते हुए कहा कि पिछले दो दशकों में चुनावी वित्त व्यवस्था और न्यायिक सोच में आए बदलावों ने उस पुराने निर्णय की बुनियाद कमजोर कर दी थी। वहीं, उदारवादी न्यायाधीशों एलेना कागन, सोनिया सोतोमायर और केतनजी ब्राउन जैक्सन ने असहमति जताते हुए चेतावनी दी कि इस कदम से धनी दानदाता पार्टी के जरिए उम्मीदवारों को असीमित धन पहुंचाकर व्यक्तिगत अंशदान सीमा को दरकिनार कर सकेंगे, जिससे भ्रष्टाचार या उसके आभास का खतरा बढ़ेगा।
इस फैसले का तात्कालिक प्रभाव रिपब्लिकन पार्टी के लिए अनुकूल माना जा रहा है। संघीय चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, रिपब्लिकन नेशनल कमेटी के पास मई अंत तक 12.55 करोड़ डॉलर की नकदी थी, जबकि डेमोक्रेटिक नेशनल कमेटी के पास मात्र 1.49 करोड़ डॉलर और 1.83 करोड़ डॉलर का कर्ज था। रिपब्लिकन समितियों ने पहले ही संकेत दिया था कि वे इस मुकदमे के नतीजे को देखते हुए धन संचय कर रही थीं, ताकि सीमा हटने पर उम्मीदवारों पर तुरंत खर्च किया जा सके। डेमोक्रेटिक नेतृत्व ने इसे “अरबपति दानदाताओं और विशेष हितों की जीत” बताया, जबकि ट्रंप प्रशासन ने कानून का बचाव करने के बजाय रिपब्लिकन चुनौती का समर्थन किया।
यह निर्णय अमेरिकी चुनावी वित्त नियमों में ढील की एक लंबी कड़ी का हिस्सा है। 2010 के सिटिजंस यूनाइटेड मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कॉरपोरेट और यूनियनों के स्वतंत्र चुनावी खर्च पर से सीमा हटा दी थी, जिसके बाद सुपर पैक का उदय हुआ। अब समन्वित खर्च की सीमा समाप्त होने से पार्टियां सीधे उम्मीदवारों के अभियान का वित्तपोषण कर सकेंगी। अमेरिकी मीडिया में छपी विश्लेषण रिपोर्टों के अनुसार, इससे चुनावी मैदान में धन की भूमिका और बढ़ेगी तथा छोटे दानदाताओं पर निर्भर डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों के लिए नई चुनौती खड़ी होगी। हालांकि, डेमोक्रेटिक पार्टी भी भविष्य में इसी रणनीति को अपना सकती है। फैसले का असर नवंबर 2026 के मध्यावधि चुनावों में दिखेगा, जब दोनों दल नई वित्तीय स्वतंत्रता के साथ मैदान में उतरेंगे।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के रूढ़िवादी बहुमत ने पार्टियों के समन्वित खर्च पर लंबे समय से चली आ रही सीमाओं को समाप्त कर दिया, आलोचकों का कहना है कि इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा और धनी हितों को लाभ होगा। यह फैसला, जिसका रिपब्लिकन और राष्ट्रपति ट्रंप ने स्वागत किया, वाटरगेट युग की सुरक्षा को पलटता है और असहमत न्यायाधीशों की चेतावनियों को नज़रअंदाज़ करता है कि पहले संशोधन में ऐसा कोई आदेश नहीं है। यह चुनावी वित्त नियमों को खत्म करने की दिशा में एक और कदम है, जो अमेरिकी लोकतंत्र की अखंडता के लिए चिंता पैदा करता है।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर राजनीतिक अभियान खर्च की सीमाओं को खारिज कर दिया, इस बार पार्टियों और उम्मीदवारों के बीच समन्वित खर्च पर संघीय प्रतिबंधों को हटा दिया। 6-3 का फैसला, जो पहले से ही धन लाभ रखने वाले रिपब्लिकन के पक्ष में है, इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा बताया गया है, लेकिन यह न्यायिक निर्णयों के उस व्यापक पैटर्न को दर्शाता है जो धनी हितों का पक्ष लेते हैं। यह निर्णय ऐसे समय आया है जब प्रमुख रिपब्लिकन समितियाँ मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेट्स पर महत्वपूर्ण वित्तीय बढ़त के साथ जा रही हैं।
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