
पेरू में केइको फुजीमोरी की जीत: 50,000 से कम वोटों के अंतर से राष्ट्रपति चुनाव का नतीजा तय
दक्षिणपंथी नेता केइको फुजीमोरी ने चौथे प्रयास में पेरू का राष्ट्रपति चुनाव जीत लिया, जबकि वामपंथी प्रतिद्वंदी रॉबर्टो सांचेज़ ने बिना सबूत धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए नतीजा मानने से इनकार कर दिया।
पेरू के राष्ट्रीय चुनाव कार्यालय (ओएनपीई) ने 29 जून को दूसरे चरण के मतदान की पूर्ण गणना के बाद पुष्टि की कि दक्षिणपंथी फुएर्सा पॉपुलर पार्टी की उम्मीदवार केइको फुजीमोरी ने 50.135 प्रतिशत वोट हासिल कर राष्ट्रपति चुनाव जीत लिया है। उनके प्रतिद्वंदी, वामपंथी गठबंधन जुंटोस पोर एल पेरू के रॉबर्टो सांचेज़ को 49.865 प्रतिशत मत मिले। 1.8 करोड़ से अधिक वैध मतों में केवल 49,641 वोटों का अंतर रहा, जो पेरू के आधुनिक चुनावी इतिहास में सबसे कम अंतरों में से एक है। फुजीमोरी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि देश “व्यवस्था और उम्मीद के रास्ते” के करीब है, जबकि सांचेज़ ने विदेशी मतदान में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए परिणाम को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और समर्थकों के साथ सड़कों पर उतरे।
लैटिन अमेरिकी राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, फुजीमोरी की जीत क्षेत्र में दक्षिणपंथी लहर को मजबूत करती है, जो अर्जेंटीना, इक्वाडोर और अल साल्वाडोर जैसे देशों में पहले ही दिख चुकी है। स्वयं फुजीमोरी ने कोलंबिया के नवनिर्वाचित दक्षिणपंथी राष्ट्रपति के साथ सार्वजनिक रूप से समर्थन का आदान-प्रदान किया था। वहीं, सांचेज़ ने अमेरिकी राज्यों के संगठन (ओएएस) सहित अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जाने की चेतावनी दी है, हालांकि ओएएस के चुनाव पर्यवेक्षक मिशन ने स्पष्ट किया कि उसे ऐसी कोई अनियमितता नहीं मिली जो परिणाम बदल सके। पेरू के राष्ट्रीय चुनाव जूरी (जेएनई) ने 3 जुलाई को आधिकारिक घोषणा का कार्यक्रम तय किया है, जिसके बाद 15 जुलाई को प्रमाण-पत्र और 28 जुलाई को शपथ ग्रहण होगा।
यह चुनाव ऐसे समय हुआ जब पेरू एक दशक में आठ राष्ट्रपति देख चुका है और संगठित अपराध, भ्रष्टाचार तथा संस्थागत अस्थिरता से जूझ रहा है। फुजीमोरी ने सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को प्राथमिकता देने का वादा किया है, जबकि उनकी पार्टी के पास नवगठित द्विसदनीय कांग्रेस में स्पष्ट बहुमत नहीं है। भारतीय विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि पेरू की राजनीतिक स्थिरता प्रशांत गठबंधन के माध्यम से भारत के साथ बढ़ते व्यापार और खनिज आपूर्ति श्रृंखला के लिए महत्वपूर्ण है, हालांकि इस चुनाव का दक्षिण एशिया पर प्रत्यक्ष प्रभाव सीमित रहेगा।
केइको फुजीमोरी पूर्व राष्ट्रपति अल्बर्टो फुजीमोरी की बेटी हैं, जिन्होंने 1990 के दशक में माओवादी विद्रोहियों को कुचला और अर्थव्यवस्था को स्थिर किया, लेकिन बाद में भ्रष्टाचार और मानवता विरोधी अपराधों के लिए जेल गए। इस विरासत ने केइको को एक वफादार मतदाता आधार तो दिया, परंतु एक मजबूत ‘एंटी-फुजीमोरी’ भावना भी पैदा की, जिसके चलते वे 2011, 2016 और 2021 के चुनाव हार गई थीं। इस बार उन्होंने अपनी छवि नरम करने और अपराध पर सख्त रुख अपनाने पर जोर दिया, जो बढ़ती असुरक्षा से त्रस्त मतदाताओं को आकर्षित कर सका।
आगामी कदमों में जेएनई द्वारा 3 जुलाई को आधिकारिक उद्घोषणा, 15 जुलाई को प्रमाण-पत्र वितरण और 28 जुलाई को संसद में शपथ ग्रहण शामिल है। सांचेज़ ने न्यायिक अपील और सड़क विरोध जारी रखने की घोषणा की है, जिससे सत्ता हस्तांतरण तनावपूर्ण रहने की संभावना है। फुजीमोरी को ऐसे देश की कमान संभालनी होगी जो लगभग बराबर दो खेमों में बंटा है, और जहां विधायी समर्थन जुटाना उनकी सरकार की पहली बड़ी परीक्षा होगी।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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Keiko Fujimori's victory by such a narrow margin raises doubts about the legitimacy of the result and rekindles divisions among Peruvians. Many see in her the return of an authoritarian past, while others celebrate continuity.
The election of Keiko Fujimori by fewer than 50,000 votes highlights the deep polarization in Peru. International observers note the narrow margin and potential for political instability, focusing on the democratic process and the need for unity.
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