
चीन का नया जातीय एकता कानून लागू, विदेशी सक्रियताओं पर नकेल की तैयारी
चीन ने बुधवार से जातीय एकता कानून प्रभावी किया, जिसमें विदेशों में भी ‘एकता विरोधी’ कार्यों पर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है, ताइवान और ऑस्ट्रेलियाई समूहों ने चिंता जताई।
चीन का नया जातीय एकता संवर्धन कानून 1 जुलाई से प्रभावी हो गया, जो हांगकांग के ब्रिटिश शासन से बीजिंग को हस्तांतरण की 29वीं वर्षगांठ का दिन है। इस कानून की धारा 63 में चीन के बाहर किसी संगठन या व्यक्ति द्वारा “जातीय एकता को कमजोर करने” या “जातीय विभाजन” पैदा करने वाले कार्यों पर कानूनी दायित्व तय करने का प्रावधान है। ताइवान के अधिकारियों और ऑस्ट्रेलिया में प्रवासी उइग़ुर-तिब्बती समूहों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक तटस्थता के लिए खतरा बताया है।
ताइवान के एक अधिकारी, जो सीमापार मामलों के जानकार हैं, के अनुसार यह कानून उन ताइवानियों और ताइवान में रहने वाले हांगकांगवासियों पर कार्रवाई का आधार बन सकता है जो एकीकरण का विरोध करते हैं या यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं। अधिकारी ने कहा कि बीजिंग के लिए “चीनी राष्ट्र का महान पुनरुत्थान” और “राष्ट्रीय एकीकरण” एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, और तटस्थता का कोई स्थान नहीं है। ऑस्ट्रेलिया तिब्बत परिषद और ऑस्ट्रेलियाई उइग़ुर तांगरीताग महिला संघ ने आशंका जताई कि इस कानून का इस्तेमाल प्रवासी समुदायों को डराने और उनकी पहचान मिटाने के लिए किया जाएगा। ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने बताया कि उसने बीजिंग और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में सीधे चिंताएँ उठाई हैं, जबकि यूरोपीय संसद ने अप्रैल में इस कानून को वापस लेने का प्रस्ताव पारित करते हुए इसे अल्पसंख्यक पहचान के लिए घातक बताया।
बीजिंग ने इस आलोचना को खारिज किया है। चीन के उप-न्याय मंत्री हू वेइलिए के अनुसार, विदेशों पर लागू प्रावधान एक संप्रभु राष्ट्र की सामान्य विधायी प्रथा है, जो अलगाववादी गतिविधियों का मुकाबला करने के लिए जरूरी है। उन्होंने पश्चिमी मीडिया पर ‘विकृत और भ्रामक’ व्याख्या का आरोप लगाया। इस बीच, चीन ने अपनी उदार छवि पेश करने के लिए समानांतर प्रयास तेज किए हैं। बांग्लादेश समेत 12 देशों के पत्रकारों ने हाल ही में हाइनान प्रांत का दौरा किया, जहाँ मुक्त व्यापार बंदरगाह, डिजिटल प्रौद्योगिकी और पर्यटन विकास की संभावनाएँ तलाशी गईं। वहीं, ताइवानी सूत्रों ने बताया कि बीजिंग गुआंगडोंग में सुन यात-सेन मंच पर युवा ताइवानियों को मुफ्त यात्रा का प्रलोभन देकर अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है, जिसे ‘यूनाइटेड फ्रंट’ रणनीति का हिस्सा बताया गया।
इस कानून के व्यापक प्रभाव पर विचार करते हुए विशेषज्ञों का कहना है कि अस्पष्ट परिभाषाएँ लोगों को आत्म-सेंसरशिप के लिए मजबूर करेंगी। ला ट्रोब विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेम्स लीबोल्ड के अनुसार, यह कानून राष्ट्रपति शी चिनफिंग के तहत क्षेत्रीय जातीय स्वायत्तता के पुराने वादों से पीछे हटने को कानूनी रूप देता है। दक्षिण एशिया में इस मुद्दे की प्रतिध्वनि अलग रूप में सुनाई देती है: भारत के पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी सरकार सोमवार को समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक पेश करने जा रही है, जो धर्म-आधारित व्यक्तिगत कानूनों को एक समान ढाँचे से बदलने का प्रयास है। तृणमूल कांग्रेस इसे राजनीतिक ध्रुवीकरण का हथियार बता रही है, जबकि सरकार का कहना है कि जनजातीय समुदायों को इसके दायरे से बाहर रखा जाएगा। यूसीसी और चीन का जातीय कानून भले ही अलग संदर्भों से उपजे हों, पर दोनों ही बहुलतावादी समाजों में एकरूपता बनाम विविधता की बहस को तेज करते हैं। फिलहाल, चीन का नया कानून बुधवार से लागू हो चुका है और आने वाले दिनों में विदेशों में इसके इस्तेमाल के मामले इसकी असली पहुँच तय करेंगे।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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चीन की नई नीतियाँ अभूतपूर्व अवसरों का युग ला रही हैं, जिसमें हॉन्ग कॉन्ग मुख्यभूमि उद्यमों को वैश्विक स्तर पर जोड़ने के लिए 'चाइना ऑपर्च्युनिटी 2.0' का नेतृत्व कर रहा है। ध्यान आर्थिक एकीकरण और आपसी समृद्धि पर है, जबकि घरेलू कानूनों पर चिंताओं को दरकिनार कर रहा है।
नई जातीय एकता कानून चिंता पैदा करता है क्योंकि यह कथित तौर पर विदेशों में आलोचकों पर मुकदमा चलाने के लिए बीजिंग की पहुंच बढ़ाता है, जिससे ऑस्ट्रेलिया में प्रवासी समुदायों में भय पैदा होता है। सामुदायिक समूह सरकार से आग्रह करते हैं कि जिसे वे अंतरराष्ट्रीय दमन का उपकरण मानते हैं, उसकी निंदा करें।
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