
सुप्रीम कोर्ट के मिले-जुले फैसले: ट्रंप को कैरोल केस में झटका, राष्ट्रपति शक्तियों में ऐतिहासिक विस्तार
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ई. जीन कैरोल मामले में ट्रंप की अपील खारिज कर दी, जबकि स्वतंत्र एजेंसियों के अधिकारियों को बर्खास्त करने की राष्ट्रपति की शक्ति को व्यापक बना दिया।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया, जिसमें उन्होंने लेखिका ई. जीन कैरोल के यौन शोषण और मानहानि के मामले में 2023 के जूरी फैसले को चुनौती दी थी। बिना कोई कारण बताए दिए गए इस निर्णय के साथ ही ट्रंप पर 5 मिलियन डॉलर का हर्जाना अंतिम रूप से लागू हो गया। इसी दिन अदालत ने तीन अन्य अहम फैसलों में राष्ट्रपति की शक्तियों का दायरा बढ़ाते हुए स्वतंत्र नियामक आयोगों के आयुक्तों को मनमाने ढंग से हटाने की अनुमति दे दी, फेडरल रिजर्व के एक गवर्नर को पद से हटाने के प्रयास को प्रक्रियागत आधार पर रोक दिया, और चुनाव के बाद डाक मतपत्रों की गिनती की अनुमति देने वाले मिसिसिपी कानून को बरकरार रखा।
ट्रंप ने कैरोल मामले को ‘फर्जी केस’ और ‘न्यायपालिका का हथियारीकरण’ करार देते हुए लड़ाई जारी रखने की घोषणा की। वहीं, संघीय व्यापार आयोग (एफटीसी) से जुड़े फैसले को उन्होंने ‘पिछले 100 वर्षों में राष्ट्रपति शक्ति में सबसे बड़ी वृद्धि’ बताया। कैरोल की वकील रोबर्टा कापलान ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने जूरी के सर्वसम्मत फैसले को हमेशा के लिए पुष्ट कर दिया है और ट्रंप की जवाबदेही से बचने की कोशिशें विफल हो गई हैं। कानूनी विशेषेषज्ञों के अनुसार, एफटीसी मामले में 1935 की ऐतिहासिक मिसाल को पलटते हुए अदालत ने कार्यपालिका और स्वतंत्र संस्थाओं के बीच शक्ति संतुलन को महत्वपूर्ण रूप से बदल दिया है।
कैरोल मामले में सिविल दायित्व तय हो जाने के बावजूद, एक अलग मानहानि मुकदमे में ट्रंप पर 83.3 मिलियन डॉलर का हर्जाना अभी अपील के अधीन है। एफटीसी फैसले का तात्कालिक प्रभाव दर्जनों स्वतंत्र एजेंसियों के नेतृत्व पर पड़ेगा, जिससे प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता संरक्षण जैसे क्षेत्रों में नियामक नीतियां सीधे राष्ट्रपति के नियंत्रण में आ सकती हैं। फेडरल रिजर्व से जुड़े फैसले ने फिलहाल केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता को बचाए रखा है, जो वैश्विक वित्तीय बाजारों के लिए संवेदनशील मुद्दा है। डाक मतपत्रों पर निर्णय ने रिपब्लिकन पार्टी की उस कोशिश को विफल कर दिया, जिसके तहत चुनाव के बाद प्राप्त मतपत्रों की गिनती रोककर मतदान पहुंच को सीमित करने का प्रयास किया जा रहा था।
यह मामला 1990 के दशक की एक घटना से जुड़ा है, जिसमें ट्रंप लगातार आरोपों से इनकार करते रहे हैं। हाल ही में अमेरिकी न्याय विभाग ने कैरोल के खिलाफ एक आपराधिक जांच शुरू की है, जिसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या उन्होंने मुकदमे के दौरान धन प्राप्ति को लेकर झूठी गवाही दी थी—आलोचक इसे ट्रंप प्रशासन द्वारा राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने की रणनीति के रूप में देखते हैं। ट्रंप ने कांग्रेस से मतदाता पहचान पत्र अनिवार्य करने और डाक मतपत्रों पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून पारित करने का आह्वान किया है। 83.3 मिलियन डॉलर वाले मानहानि मामले की अपील भविष्य में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकती है, जबकि एफटीसी फैसले के दूरगामी प्रभाव आने वाले दिनों में नियामक ढांचे पर स्पष्ट होने की उम्मीद है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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सुप्रीम कोर्ट ने कैरोल मामले में ट्रंप की अपील खारिज कर उन्हें व्यक्तिगत रूप से बड़ी हार दी, जबकि साथ ही राष्ट्रपति शक्तियों का विस्तार कर उन्हें 'ऐतिहासिक' जीत दी। यह विरोधाभासी दिन दिखाता है कि कैसे यह कारोबारी अदालत में हार सकता है लेकिन कार्यपालिका को नया आकार देने में जीत सकता है। विडंबना यह है कि राष्ट्रपति को यौन उत्पीड़न के लिए लाखों का भुगतान करते हुए भी संस्थागत रूप से मजबूत होकर उभरता है।
एक ही दिन में सुप्रीम कोर्ट ने अमेरिकी लोकतंत्र के संतुलन को फिर से लिख दिया: ट्रंप के लिए तीन प्रतिकूल फैसले, लेकिन नियंत्रण और संतुलन से मुक्त कार्यपालिका की उनकी दृष्टि के लिए एक ऐतिहासिक जीत। कैरोल मामला स्वतंत्र नियामकों को बर्खास्त करने की शक्तियों के विस्तार की तुलना में पीछे छूट जाता है। एक मिसाल जो राष्ट्रपति पर संवैधानिक निगरानी की सीमाओं को फिर से परिभाषित करती है।
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