
प्रोस्टेट और स्तन कैंसर की जांच में नए रक्त परीक्षणों से बेहतर पहचान, अनावश्यक उपचार से बचाव
स्टॉकहोम3 और प्रोसाइना जैसे जोखिम-आधारित परीक्षण पारंपरिक पीएसए की तुलना में आक्रामक कैंसरों की कहीं अधिक सटीक पहचान कर रहे हैं, जबकि दो-तिहाई स्तन कैंसर रोगी कीमोथेरेपी से बच सकती हैं।
कैंसर जांच का परिदृश्य अब केवल एकल बायोमार्कर से आगे बढ़कर बहु-आयामी जोखिम आकलन की ओर बढ़ रहा है। स्वीडन के कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट के नेतृत्व में 12,600 पुरुषों पर किए गए एक अध्ययन में स्टॉकहोम3 रक्त परीक्षण ने चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण प्रोस्टेट कैंसर के 90 प्रतिशत मामलों की पहचान की, जबकि मानक पीएसए परीक्षण केवल 74 प्रतिशत ही पकड़ सका। गलत-सकारात्मक दर दोनों में लगभग समान रही। यह अध्ययन ‘एनल्स ऑफ इंटरनल मेडिसिन’ में प्रकाशित हुआ है और यह दर्शाता है कि पीएसए की 4 नैनोग्राम प्रति मिलीलीटर की सामान्य सीमा तो केवल 52 प्रतिशत आक्रामक कैंसरों को ही पकड़ पाई।
इस परीक्षण की क्षमता पीएसए माप के साथ आनुवंशिक मार्करों, रक्त प्रोटीन बायोमार्करों और आयु-पारिवारिक इतिहास जैसी नैदानिक सूचनाओं को जोड़ने में निहित है। ठीक इसी सिद्धांत पर स्तन कैंसर में प्रोसाइना परीक्षण ने भी उपचार के निर्णयों को बदल दिया है। अमेरिकन सोसायटी ऑफ क्लिनिकल ऑन्कोलॉजी (एएससीओ) सम्मेलन में प्रस्तुत ऑप्टिमा अंतरराष्ट्रीय परीक्षण ने छह देशों की 4,400 रोगियों पर दिखाया कि ट्यूमर के 50 जीनों की गतिविधि का विश्लेषण करने वाला यह परीक्षण सुरक्षित रूप से उन दो-तिहाई मरीजों की पहचान कर लेता है जिन्हें कीमोथेरेपी से कोई सार्थक लाभ नहीं मिलता। चार वर्षों के औसत अनुवर्तन में निम्न-जोखिम स्कोर वाले समूह में केवल हार्मोन थेरेपी से आक्रामक कैंसर-मुक्त जीविता लगभग 94 प्रतिशत रही, जो कीमोथेरेपी कराने वाले समूह के बराबर थी।
यह बदलाव केवल कैंसर तक सीमित नहीं है। हृदय रोग विशेषज्ञ अब पारंपरिक कोलेस्ट्रॉल जांच से आगे बढ़कर एपोलिपोप्रोटीन बी (एपोबी) और लिपोप्रोटीन(ए) जैसे आनुवंशिक रूप से निर्धारित जोखिम कारकों की निगरानी पर जोर दे रहे हैं। एलपी(ए) का स्तर आहार या व्यायाम से प्रभावित नहीं होता और यह दिल के दौरे व स्ट्रोक के लिए एलडीएल से छह गुना अधिक खतरनाक हो सकता है। इंडोनेशिया जैसे विकासशील देशों में, जहां 2022 में कैंसर के 4 लाख से अधिक नए मामले सामने आए, परमाणु चिकित्सा और उन्नत जांच की सीमित पहुंच एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। वहां रेडियोथेरेपी सेवाएं केवल 17 प्रांतों और न्यूक्लियर मेडिसिन महज 10 प्रांतों तक सीमित हैं।
इन परीक्षणों का वास्तविक प्रभाव तब दिखेगा जब ये विविध आबादी पर मान्य होकर सार्वजनिक स्वास्थ्य दिशानिर्देशों में शामिल होंगे। अगला मील का पत्थर विभिन्न जातीय समूहों में इनके प्रदर्शन का मूल्यांकन और नियामक मंजूरी की प्रक्रिया होगी, ताकि अनावश्यक बायोप्सी और कीमोथेरेपी से बचाते हुए आक्रामक कैंसरों की जल्द पहचान को वैश्विक स्तर पर सुलभ बनाया जा सके।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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