
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: स्वतंत्र एजेंसियों पर राष्ट्रपति की पकड़ मजबूत, लेकिन फेडरल रिजर्व को राहत
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप को स्वतंत्र एजेंसियों के प्रमुखों को बर्खास्त करने का व्यापक अधिकार दिया, परंतु फेडरल रिजर्व की गवर्नर लिसा कुक को तत्काल हटाने पर रोक लगाकर केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता को संवैधानिक संरक्षण प्रदान किया।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दो अहम फैसलों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कार्यकारी शक्तियों का एक साथ विस्तार और सीमांकन किया। पहले निर्णय में 6-3 के बहुमत से 1935 के ‘हम्फ्रीज एक्जीक्यूटर’ प्रिसिडेंट को पलटते हुए यह व्यवस्था दी गई कि राष्ट्रपति फेडरल ट्रेड कमीशन (FTC) जैसी स्वतंत्र नियामक एजेंसियों के सदस्यों को बिना कारण बर्खास्त कर सकता है। दूसरे निर्णय में 5-4 के बहुमत से फेडरल रिजर्व की गवर्नर लिसा कुक को तत्काल पद से हटाने के ट्रंप के प्रयास को अवरुद्ध कर दिया गया, जिससे केंद्रीय बैंक की ऐतिहासिक स्वतंत्रता को अस्थायी रूप से संरक्षण मिला।
न्यायालय के बहुमत ने ‘ट्रंप बनाम स्लॉटर’ मामले में मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स के माध्यम से तर्क दिया कि संविधान का अनुच्छेद-2 राष्ट्रपति को कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग करने वाले सभी अधीनस्थों को हटाने का अधिकार देता है। इसके विपरीत, न्यायमूर्ति सोनिया सोटोमायर के नेतृत्व में असहमति रखने वाले तीन उदारवादी न्यायाधीशों ने इसे ‘अप्रतिबंधित कार्यकारी नियंत्रण’ का सिद्धांत बताया, जो न तो संविधान निर्माताओं की कल्पना में था और न ही कांग्रेस द्वारा प्रदत्त। ‘ट्रंप बनाम कुक’ में न्यायालय ने फेडरल रिजर्व को एक विशिष्ट संस्था माना, जिसकी स्वतंत्रता अमेरिकी आर्थिक इतिहास में गहराई से निहित है। न्यायालय ने कहा कि कुक को आरोपों की सूचना और जवाब देने का अवसर दिए बिना हटाना उचित प्रक्रिया का उल्लंघन है।
इन फैसलों के दूरगामी संस्थागत प्रभाव होंगे। FTC, राष्ट्रीय श्रम संबंध बोर्ड और प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग सहित दो दर्जन से अधिक स्वतंत्र एजेंसियों के प्रमुख अब राष्ट्रपति की इच्छा पर पद पर बने रहेंगे, जिससे नियामक नीतियों में राजनीतिक हस्तक्षेप की आशंका बढ़ गई है। दूसरी ओर, फेडरल रिजर्व के मामले में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मौद्रिक नीति को प्रत्यक्ष राजनीतिक दबाव से मुक्त रखने की परंपरा संवैधानिक महत्व रखती है। पूर्व फेड चेयरमैन एलन ग्रीनस्पैन, बेन बर्नान्के और जेनेट येलेन सहित प्रमुख अर्थशास्त्रियों ने एक असाधारण एमिकस ब्रीफ में चेतावनी दी थी कि केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता कमजोर होने से मुद्रास्फीति और आर्थिक अस्थिरता का जोखिम बढ़ेगा।
दक्षिण एशिया और भारत के लिए फेडरल रिजर्व की स्वतंत्रता का वैश्विक वित्तीय स्थिरता से सीधा संबंध है। अमेरिकी मौद्रिक नीति में राजनीतिक हस्तक्षेप से ब्याज दरों में अनिश्चितता पैदा हो सकती है, जिसका प्रभाव उभरती अर्थव्यवस्थाओं में पूंजी प्रवाह, विनिमय दर और विदेशी निवेश पर पड़ता है। भारतीय रिजर्व बैंक और अन्य केंद्रीय बैंकों के लिए यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कार्यपालिका और नियामक संस्थाओं के बीच शक्ति संतुलन का एक वैश्विक परीक्षण बन गया है।
कुक का मामला अब निचली अदालतों में ‘कारण-सहित’ बर्खास्तगी की योग्यता पर आगे बढ़ेगा, जबकि ट्रंप ने ‘उचित कार्रवाई’ की धमकी दी है। स्लॉटर मामले का निर्णय तत्काल प्रभावी है और इसी सत्र में न्यायालय ने ट्रंप की ई. जीन कैरोल मानहानि मामले की अपील खारिज कर 5 मिलियन डॉलर का हर्जाना बरकरार रखा तथा डाक मतपत्रों की गणना को चुनाव दिवस के बाद भी जारी रखने की राज्यों की शक्ति को मान्यता दी। ये सभी निर्णय नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले कार्यकारी शक्ति की सीमाओं पर एक स्थायी संवैधानिक बहस को आकार दे रहे हैं।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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सुप्रीम कोर्ट ने 5-4 के फैसले में राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा फेड गवर्नर लिसा कुक को बर्खास्त करने के प्रयास को रोक दिया, जिससे केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता मजबूत हुई। यह निर्णय उचित प्रक्रिया की मांग करता है और मामले को निचली अदालतों में वापस भेजता है, कार्यकारी अतिक्रमण के खिलाफ संस्थागत मानदंडों की रक्षा करता है।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प को फटकार लगाई, फेड गवर्नर लिसा कुक की बर्खास्तगी को अस्वीकार्य और केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता के लिए खतरा बताया। इस फैसले को राष्ट्रपति की शक्ति पर आवश्यक अंकुश के रूप में सराहा गया, साथ ही ट्रम्प की अन्य कानूनी उलझनों को देखते हुए इसमें विडंबना का पुट भी है।
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