
ईरान में रहबर-ए-शहीद की अंत्येष्टि: 20 मिलियन श्रद्धालुओं की उम्मीद, भारत का प्रतिनिधित्व स्तर विवाद में
चार जुलाई से शुरू हो रहे इस बहु-दिवसीय समारोह में तेहरान, क़ुम, मशहद और इराक़ में श्रद्धांजलि दी जाएगी; भारत ने विदेश राज्य मंत्री और बिहार के राज्यपाल को भेजने का निर्णय लिया है।
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई की अंत्येष्टि 4 से 9 जुलाई 2026 तक तेहरान, क़ुम, मशहद और इराक़ के नजफ़-करबला में आयोजित होगी। ईरानी गृह मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, फ़रवरी में अमेरिकी-इज़राइली हमले में मारे गए नेता के पार्थिव शरीर को सैन्य कार्रवाई के दौरान सुरक्षा कारणों से दफ़नाया नहीं जा सका था, लेकिन अब युद्धविराम की रिपोर्टों के बीच शासन इस आयोजन को अंजाम देने में सक्षम महसूस कर रहा है। तेहरान के महापौर ने अनुमान लगाया है कि राजधानी में लगभग 20 मिलियन लोग जुट सकते हैं, जबकि कुछ ईरानी सुरक्षा अनुमानों में पूरे देश से 35 मिलियन तक श्रद्धालुओं के शामिल होने की बात कही गई है।
तेहरान यातायात पुलिस प्रमुख के अनुसार, 1.2 मिलियन वाहनों के लिए पार्किंग की व्यवस्था की गई है और 14 प्रवेश मार्गों पर विशेष निगरानी रखी जाएगी। मेट्रो के तीन प्रमुख स्टेशन शुक्रवार से रविवार तक बंद रहेंगे, जबकि 41 प्रतिशत श्रद्धालुओं के मेट्रो से आने का अनुमान है। सेना के प्रवक्ता ने बताया कि थल, वायु और समुद्री बलों को हाई अलर्ट पर रखा गया है, सीमाओं पर सुरक्षा बढ़ाई गई है और तेहरान के आसपास चार ‘ज़ाएर शहर’ स्थापित किए गए हैं। इज़राइली मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, नए सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह सैयद मुज्तबा ख़ामेनेई ने अंत्येष्टि की रूपरेखा को मंज़ूरी दी है, लेकिन उनकी सार्वजनिक उपस्थिति अब भी अत्यंत सीमित है, जिससे उत्तराधिकार के बाद शासन की स्थिरता पर सवाल उठ रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, ईरानी विदेश मंत्रालय के अनुसार 30 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों और 90 देशों के धार्मिक नेताओं व विद्वानों ने भाग लेने की इच्छा जताई है। इराक़ के ‘चारचौब-ए-हमाहंगी’ गठबंधन ने प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय समिति बनाई है और नजफ़-करबला में समारोह आयोजित करने की तैयारी की है। भारत ने प्रधानमंत्री मोदी को व्यक्तिगत निमंत्रण मिलने के बावजूद विदेश राज्य मंत्री पबित्र मार्गेरिटा और बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन को भेजने का निर्णय लिया है। भारतीय रणनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह क़दम 2024 में राष्ट्रपति इब्राहीम रईसी के निधन पर उपराष्ट्रपति के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल से भिन्न है, जिसे कुछ लोग अमेरिका और इज़राइल के साथ संबंधों को संतुलित करने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं, जबकि अन्य इसे 1989 में ख़ुमैनी की अंत्येष्टि में तत्कालीन विदेश मंत्री के भेजे जाने की ऐतिहासिक मिसाल से जोड़कर निरंतरता का संकेत मानते हैं।
दक्षिण एशियाई मामलों के जानकारों के अनुसार, भारत, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश की बड़ी शिया आबादी से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के ईरान पहुंचने की संभावना है, जिससे क्षेत्रीय स्तर पर ईरान का धार्मिक-सांस्कृतिक प्रभाव रेखांकित होगा। ईरानी मीडिया के अनुसार, अंत्येष्टि का समापन 9 जुलाई को मशहद में इमाम रज़ा के मक़बरे में दफ़न के साथ होगा, जहाँ महिला-पुरुष दोनों के लिए सुगम ज़ियारत सुनिश्चित करने हेतु एक विशेष स्थान चुना गया है। यह आयोजन नए नेतृत्व के लिए पहली बड़ी सार्वजनिक परीक्षा होगी, जिस पर क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों की निगाहें टिकी रहेंगी।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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ईरान अपने शहीद सर्वोच्च नेता के लिए बहु-दिवसीय अंतिम संस्कार की तैयारी कर रहा है, जिसमें 3.5 करोड़ प्रतिभागियों की उम्मीद है। राज्य मीडिया इसे राष्ट्रीय एकता और क्रांति के प्रति समर्पण का ऐतिहासिक प्रदर्शन बताता है, साथ ही समझौतों को लागू करने के राजनयिक प्रयासों पर भी प्रकाश डालता है। कथा शहीद नेता और इस्लामी गणराज्य की लचीलापन पर जोर देती है।
लेख में पूछा गया है कि क्या मोजतबा खामेनेई अपने पिता के अंतिम संस्कार में पहली बार सार्वजनिक रूप से दिखाई देंगे, उनकी लंबी अनुपस्थिति और उनके स्वास्थ्य और अधिकार के बारे में अटकलों पर प्रकाश डाला गया है। ध्यान नेतृत्व परिवर्तन और नए सर्वोच्च नेता की शासन करने की क्षमता के बारे में अनिश्चितता पर है। कथा विश्लेषणात्मक और संशयपूर्ण है, अंतिम संस्कार को शासन की स्थिरता के संभावित खुलासे के रूप में देखती है।
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