
सेनेगल और कांगो में संवैधानिक संशोधनों से राजनीतिक तनाव बढ़ा
सेनेगल में संसदीय सुधार पारित, कांगो में राष्ट्रपति के तीसरे कार्यकाल का रास्ता साफ; दोनों देशों में सत्ता संघर्ष गहराया।
सेनेगल की नेशनल असेंबली ने सोमवार को एक विवादास्पद संवैधानिक संशोधन पारित किया, जिसके तहत विधायिका की जांच शक्तियों का विस्तार हुआ और राष्ट्रपति के अधिकार सीमित किए गए। सदन के भीतर तीखी बहस के दौरान विपक्षी सांसद अब्दू म्बो को सुरक्षा बलों ने बलपूर्वक बाहर निकाला, जबकि बाहर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस छोड़ी। यह सुधार राष्ट्रपति बासीरू डियोमाये फेय और पूर्व प्रधानमंत्री व वर्तमान संसद अध्यक्ष उस्मान सोंको के बीच बढ़ते सत्ता संघर्ष की पृष्ठभूमि में आया है, जिनकी पास्तेफ पार्टी के पास 165 में से 130 सीटें हैं।
कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में भी संवैधानिक ढांचे को लेकर तनाव गहराया है। 15 जून को सीनेट ने एक ऐसा संशोधन विधेयक अपनाया जो राष्ट्रपति फेलिक्स शिसेकेदी के पिछले कार्यकालों को शून्य मानते हुए तीसरे कार्यकाल का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। विपक्षी दलों और कैथोलिक चर्च की राष्ट्रीय धर्माध्यक्षीय समिति ने इसे ‘संवैधानिक तख्तापलट’ करार दिया है, जबकि शिसेकेदी के गठबंधन के संसद पर नियंत्रण के चलते प्रक्रिया तेज़ी से आगे बढ़ रही है। शिसेकेदी ने मई में कहा था कि पूर्वी कांगो में संघर्ष समाप्त हुए बिना 2028 के चुनाव नहीं हो सकते और यदि जनता चाहे तो वे तीसरे कार्यकाल के लिए तैयार हैं।
दोनों देशों में संवैधानिक बदलावों के पीछे अलग-अलग घरेलू समीकरण काम कर रहे हैं। सेनेगल में न्याय मंत्री ने सुधारों को जनमत संग्रह में भेजने की राष्ट्रपति की मंशा की घोषणा की, लेकिन सोंको ने इस अधिकार पर ही प्रश्न उठा दिया। विपक्ष इसे पूर्व प्रधानमंत्री की राजनीतिक प्रतिशोध की कार्रवाई मानता है, जबकि पास्तेफ का कहना है कि इससे कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का संतुलन मज़बूत होगा। कांगो में सरकार सुरक्षा चुनौतियों का हवाला देकर चुनावी प्रक्रिया को स्थगित करने का औचित्य प्रस्तुत कर रही है, लेकिन विश्लेषकों के अनुसार इससे पहले से कमज़ोर राज्य संस्थाओं में जनता का भरोसा और घटेगा—पहले ही केवल 12 प्रतिशत आबादी चुनावी प्रक्रियाओं पर विश्वास करती है।
सेनेगल में सरकार ने जनमत संग्रह की कोई तिथि घोषित नहीं की है, जबकि कांगो में संशोधन विधेयक के संसदीय प्रक्रिया पूरी करने के बाद जनमत संग्रह का रास्ता खुलने की संभावना है। दोनों ही मामलों में क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक प्रतिक्रियाएं अभी सीमित हैं—संयुक्त अरब अमीरात और मोरक्को ने कांगो को स्वतंत्रता दिवस की बधाई देते हुए द्विपक्षीय संबंधों पर ज़ोर दिया, लेकिन आंतरिक राजनीतिक घटनाक्रम पर टिप्पणी नहीं की। विपक्षी गठबंधन और नागरिक समाज दोनों जगह विधेयकों की वापसी की मांग कर रहे हैं, जिससे आने वाले सप्ताहों में सड़क और संसद दोनों स्तरों पर टकराव बढ़ने के आसार हैं।
| उप-सहारा अफ़्रीकी प्रेस | −0.20 | neutral |
|---|---|---|
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | 0.00 | neutral |
Sub-Saharan Africa watches with realism: Senegal corrects an imbalance, Congo risks breaking democratic equilibrium. The narrative relies on regional precedents and institutional fragility.
Plausibility is built by anchoring both events to a regional framework of democratization and risk of backsliding, using similar examples already familiar to African audiences.
International pressures or the role of external powers in both processes are not mentioned.
The West evaluates both cases with a universal yardstick: Senegal follows the rules, Congo breaks them. The narrative assumes liberal democratic principles as the natural benchmark.
Western democratic criteria are universalized, presented as an objective standard, and both countries are judged by their compliance.
Historical specificities or local reasons that might justify a third term in Congo are not explored.
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