
दक्षिण चीन सागर पर 14 देशों का चीन को झटका, बीजिंग ने जापानी दूत को तलब किया
2016 की मध्यस्थता अदालत की ऐतिहासिक सुनवाई की दसवीं वर्षगांठ पर अमेरिका, जापान समेत 14 देशों ने चीन के समुद्री दावों को कानूनी आधारहीन करार दिया, जिस पर चीन ने तीखी प्रतिक्रिया दी।
अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, फिलीपींस और नौ अन्य देशों ने रविवार को एक संयुक्त वक्तव्य जारी कर कहा कि दक्षिण चीन सागर में चीन के व्यापक समुद्री दावों का अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत कोई कानूनी आधार नहीं है। 2016 में स्थायी मध्यस्थता अदालत द्वारा दिए गए फैसले की दसवीं वर्षगांठ पर जारी इस बयान में उसे “एक महत्वपूर्ण उपलब्धि” बताया गया और सभी पक्षों से विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का आह्वान किया गया। 27 सदस्यीय यूरोपीय संघ ने भी अलग से इस फैसले को “विवादों के शांतिपूर्ण निपटारे में एक ऐतिहासिक निर्णय” करार दिया।
चीन ने इस कूटनीतिक पहल पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। चीनी विदेश मंत्रालय ने जापानी राजदूत के उप-प्रमुख को तलब कर औपचारिक विरोध दर्ज कराया और जापान पर क्षेत्रीय शांति को कमजोर करने का आरोप लगाया। बीजिंग ने 2016 के फैसले को “अवैध, अमान्य और बेकार कागज का टुकड़ा” बताते हुए दोहराया कि भू-क्षेत्रीय संप्रभुता के मुद्दे समुद्री कानून संधि (यूएनसीएलओएस) के दायरे से बाहर हैं। चीनी प्रवक्ता ने जापान पर ऐतिहासिक विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं को पुनर्जीवित करने का भी आरोप लगाया और कहा कि टोक्यो दक्षिण चीन सागर में हस्तक्षेप करने की स्थिति में नहीं है।
ताइवान के विदेश मंत्रालय ने भी इस अवसर पर अपने “चार सिद्धांतों” को दोहराया, जिसमें अंतरराष्ट्रीय कानून के समर्थन और नौवहन व उड़ान की स्वतंत्रता की रक्षा की बात कही गई। फिलीपींस ने इस फैसले को अपने समुद्री दावों का कानूनी आधार बनाया है और मनीला के अनुसार इसने बीजिंग की नौ-डैश रेखा पर आधारित ऐतिहासिक दावों को अमान्य कर दिया। इस बीच, ग्वांगझू में एक शैक्षणिक संगोष्ठी में फिलीपींस के बातानेस द्वीपसमूह को “ताइवान का प्राकृतिक भौगोलिक विस्तार” बताकर चीन का हिस्सा होने का दावा किए जाने से मनीला में चिंता बढ़ गई है, हालांकि बीजिंग ने औपचारिक रूप से इस रुख को नहीं अपनाया है।
दक्षिण चीन सागर में तनाव पिछले एक दशक में लगातार बढ़ा है। चीन ने विवादित चट्टानों पर कृत्रिम द्वीप बनाकर उनका सैन्यीकरण किया है, जिसे आलोचक फैसले की सीमित प्रभावशीलता का प्रमाण मानते हैं। फिलीपींस के अधिकारियों और विश्लेषकों का कहना है कि मनीला ने अपनी प्रतिरोधक क्षमता इस स्तर तक बढ़ा ली है कि अब चीन को “कम से कम हिचकिचाना” पड़ता है। फिलहाल, कूटनीतिक गतिरोध जारी है और किसी ठोस समाधान के संकेत नहीं हैं। अगले कदम के रूप में, संयुक्त वक्तव्य में शामिल देशों द्वारा आगे भी इस मुद्दे को बहुपक्षीय मंचों पर उठाए जाने की संभावना है, जबकि चीन ने अपनी स्थिति पर कायम रहने का संकेत दिया है।
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | +0.80 | aligned |
|---|---|---|
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | +0.60 | aligned |
| जापानी-कोरियाई प्रेस | +0.70 | aligned |
The rules-based order defends itself against unilateral violations. The arbitration is final and binding, and destabilizing actions must cease.
The narrative universalizes the arbitration ruling as an unquestionable legal fact, framing non-compliance as a threat to regional stability, thereby delegitimizing any Chinese counter-narrative.
Omits the call for peaceful dialogue present in other blocs, which would soften the confrontational tone.
International law is clear: the ruling is final and binding, and all parties must respect it.
The emphasis on 'final, legally binding, and definitive' presents the ruling as an indisputable judicial fact, depoliticising the issue and making China's non-compliance appear as a legal violation.
Omits the explicit characterization of China's claims as 'illegal' and the term 'destabilising actions', present in the Atlantic bloc, which would strengthen the legal condemnation.
Japan and its partners defend the international maritime order, reminding China that the arbitration ruling is a matter of law, not negotiation.
The use of the 10-year anniversary frames the ruling as a historical milestone that cannot be ignored, thereby moralising the call for compliance.
Omits the reference to 'destabilising actions' and the regional security dimension present in the Atlantic bloc, focusing solely on the legal aspect.
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