
ईरानी वार्ताकार का कड़ा रुख़: अमेरिका से बातचीत केवल युद्ध की तैयारी के साथ संभव
तेहरान के शीर्ष वार्ताकार मोहम्मद बाक़र क़ालिबाफ़ ने कहा कि संघर्ष विराम के बावजूद ईरान आत्मसमर्पण नहीं करेगा और वाशिंगटन के साथ कोई भी समझौता सैन्य तैयारियों पर निर्भर करेगा।
ईरान के मुख्य वार्ताकार और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाक़र क़ालिबाफ़ ने शुक्रवार को कहा कि अमेरिका के साथ युद्ध कभी भी ईरान के आत्मसमर्पण के साथ समाप्त नहीं होगा। इंडोनेशियाई संसद अध्यक्ष अहमद मुज़ानी के साथ तेहरान में एक बैठक के दौरान दिए गए इस बयान ने मध्य जून में पाकिस्तान और क़तर की मध्यस्थता से हस्ताक्षरित युद्धविराम ज्ञापन के बाद उपजी नाज़ुक शांति प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। क़ालिबाफ़ ने स्पष्ट किया कि उन्होंने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वांस को वार्ता के दौरान बता दिया था कि तेहरान को वाशिंगटन पर कोई भरोसा नहीं है, और उनके अनुसार, 'केवल वे लोग अमेरिका से बातचीत कर सकते हैं जो युद्ध के लिए तैयार हों।'
तेहरान के रुख़ के अनुसार, ईरान ने कभी युद्ध नहीं चाहा लेकिन क़ुरआन का तर्क उसे अत्याचार के सामने प्रतिरोध और आत्मसमर्पण न करने का आदेश देता है। ईरानी पक्ष का मानना है कि अमेरिका, इज़राइल और नाटो को यह भ्रम था कि वे कुछ ही दिनों में ईरान को घुटने टेकने पर मजबूर कर देंगे, लेकिन उन्हें शीघ्र ही अपनी विफलता का अहसास हो गया। इसी दौरान, पिछले सप्ताह हुए घटनाक्रमों—होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाज़ों पर ईरान को जिम्मेदार ठहराए गए हमले, अमेरिकी सेना द्वारा ईरानी क्षेत्र में जवाबी हमले, और कुवैत, बहरीन, क़तर व जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ईरानी मिसाइल व ड्रोन हमलों—ने युद्धविराम ज्ञापन के बाद शुरू हुई सीधी और अप्रत्यक्ष वार्ताओं को पटरी से उतार दिया।
क्षेत्रीय मध्यस्थों के अनुसार, पाकिस्तान के नेतृत्व और क़तर की मुख्य भूमिका में हुए इस ज्ञापन का उद्देश्य साठ दिनों की विस्तार योग्य अवधि में अंतिम समझौते के लिए बातचीत शुरू करना था। स्विट्ज़रलैंड में एक दौर की सीधी बातचीत और दोहा में तकनीकी अप्रत्यक्ष बैठकों के बाद यह प्रक्रिया अब ठप पड़ गई है। इंडोनेशियाई संसद अध्यक्ष ने तेहरान में ईरानी जनता के प्रति एकजुटता व्यक्त करते हुए कहा कि उनका देश मानता है कि ईरान शांति चाहता है और क़ालिबाफ़ के प्रयासों से शांति स्थापित हो सकती है। यह बयान दक्षिण-पूर्व एशिया के एक बड़े मुस्लिम देश द्वारा ईरान के रुख़ को मिल रहे कूटनीतिक समर्थन को दर्शाता है।
वैश्विक स्तर पर, युद्ध की समाप्ति को प्राथमिकता बताए जाने के बावजूद, तेहरान और वाशिंगटन के बीच विश्वास की खाई गहरी बनी हुई है। ईरानी पक्ष का कहना है कि आर्थिक, राजनीतिक और मीडिया दबाव ने अमेरिका और इज़राइल को युद्धविराम की मांग करने पर मजबूर किया, लेकिन साथ ही वह पूर्ण सैन्य तैयारी बनाए रखने की बात दोहराता है। क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय पक्ष युद्धविराम को फिर से पटरी पर लाने और स्थायी समझौते की ओर बढ़ने के प्रयासों में जुटे हैं, हालांकि अभी तक किसी ठोस अगले कदम की घोषणा नहीं हुई है।
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