
ईरान ने बहरीन और जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल-ड्रोन हमलों का दावा किया
आईआरजीसी ने अमेरिकी हमलों के जवाब में 'ऑपरेशन नस्र 2' के तहत बहरीन और जॉर्डन में हमलों की घोषणा की, जबकि जॉर्डन ने मिसाइलों को मार गिराने और किसी बड़े नुकसान से इनकार किया।
ईरान के इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने मंगलवार को दावा किया कि उसने बहरीन में अमेरिकी पांचवें बेड़े के मुख्यालय और जॉर्डन के प्रिंस हसन एयरबेस पर बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोनों से हमला किया है। आईआरजीसी के अनुसार, ये हमले अमेरिकी सेना द्वारा ईरान के तटीय और सैन्य केंद्रों पर लगातार तीसरी रात किए गए हवाई हमलों के प्रत्युत्तर में थे। जॉर्डन की सशस्त्र सेना ने बताया कि उसकी वायु रक्षा प्रणाली ने चार मिसाइलों को सफलतापूर्वक इंटरसेप्ट किया, जिससे कोई जनहानि या बड़ा ढांचागत नुकसान नहीं हुआ।
तेहरान के सैन्य प्रतिष्ठान ने तीन क्रमिक बयानों में ऑपरेशन का ब्योरा देते हुए कहा कि नौसेना ने बहरीन के जुफैर बेस पर हथियार डिपो, उपग्रह संचार केंद्र और सैनिक आवासों को निशाना बनाया, जबकि एयरोस्पेस फोर्स ने पांचवें बेड़े के मुख्यालय पर सीधे हमले कर ईंधन भंडारण और वायु रक्षा रडार प्रणालियों को नष्ट कर दिया। आईआरजीसी ने जॉर्डन के ठिकाने को फरवरी में दक्षिणी ईरान के एक स्कूल पर हुए हमले का जिम्मेदार बताया, लेकिन साथ ही जॉर्डन की जनता के नाम एक संदेश में स्पष्ट किया कि यह कार्रवाई जॉर्डन की संप्रभुता के विरुद्ध नहीं है।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने पुष्टि की कि उसने ईरान के बुशहर, चाबहार, जास्क, कोनारक, अबू मूसा और बंदर अब्बास सहित कई स्थानों पर सैन्य लक्ष्यों पर हमले किए हैं। क्षेत्रीय स्रोतों के अनुसार, यह तनाव अप्रैल में अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा घोषित एकतरफा युद्धविराम और पाकिस्तान की मध्यस्थता में हस्ताक्षरित एक ज्ञापन के बावजूद जारी है, जिसकी पहली धारा सभी मोर्चों पर शत्रुता समाप्त करने का आदेश देती है। ईरानी पक्ष का आरोप है कि वाशिंगटन ने होर्मुज जलडमरूमध्य में अवैध नौवहन को संरक्षण देकर समझौते का उल्लंघन किया, जिसके बाद तेहरान ने 'दो-के-बदले-एक' की प्रतिशोध नीति अपनाई।
दक्षिण एशिया के लिए इस संकट के दोहरे आयाम हैं। पाकिस्तान की मध्यस्थता वाला ज्ञापन अब प्रभावी नहीं दिखता, जिससे इस्लामाबाद की कूटनीतिक भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगता है। वहीं, होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाला भारत का ऊर्जा आयात किसी भी लंबे सैन्य टकराव से प्रभावित हो सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि टकराव बढ़ता है तो कच्चे तेल की कीमतों और आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव पड़ सकता है।
फिलहाल, आईआरजीसी ने 'ऑपरेशन नस्र 2' को जारी रहने की घोषणा की है, जबकि अमेरिकी सेना ने ईरानी तटीय ठिकानों पर नए हमलों की पुष्टि की है। जॉर्डन और बहरीन की सरकारों ने अभी तक हमलों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की है, और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। अगले कूटनीतिक कदम के रूप में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इस मुद्दे पर चर्चा की संभावना है, लेकिन अभी तक कोई ठोस पहल सामने नहीं आई है।
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