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मीडिया और मनोरंजनशुक्रवार, 26 जून 2026

रुपहले पर्दे की चकाचौंध से दूर, जब सितारे चुनते हैं कोई और राह

एक अभिनेत्री का पोल्ट्री कारोबार, एक सुपरस्टार का अंडरवर्ल्ड से सामना और नई पीढ़ी की झिझक—ये कहानियाँ बताती हैं कि फ़िल्मी दुनिया की चमक के पीछे कितने अलग-अलग सच छिपे हैं।

मुंबई की एक पारिवारिक महफ़िल में मॉडल कोऑर्डिनेटर की नज़र एक युवा पारसी लड़की पर पड़ी। वह लड़की थी पेरिज़ाद ज़ोराबियन, जो अभी-अभी न्यूयॉर्क से एमबीए करके लौटी थी और पिता के चिकन कारोबार में हाथ बँटा रही थी। उस एक नज़र ने उसे फ़ेयर एंड लवली के विज्ञापन तक पहुँचाया, और फिर नागेश कुकुनूर की ‘बॉलीवुड कॉलिंग’ में ओम पुरी के साथ मुख्य भूमिका तक। पेरिज़ाद ख़ुद इसे ‘अनियोजित’ प्रवेश कहती हैं—एक ऐसी अभिनेत्री जिसका पहला सपना आठ साल की उम्र से व्यवसाय था, अभिनय नहीं।

यह सिलसिला आगे बढ़ा और पेरिज़ाद ने ‘जॉगर्स पार्क’, ‘मॉर्निंग रागा’ और अमिताभ बच्चन के साथ ‘एक अजनबी’ जैसी फ़िल्मों में काम किया। लेकिन 33 साल की उम्र में बोमन ईरानी (अभिनेता नहीं, बल्कि एक व्यवसायी) से शादी के बाद उन्होंने फ़िल्मी दुनिया से दूरी बना ली। पति की यह इच्छा कि पत्नी लंबे समय तक शूटिंग पर बाहर न रहे, और ख़ुद पेरिज़ाद की माँ बनने की चाहत ने उन्हें सुभाष घई की ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ और निखिल आडवाणी की ‘सलाम-ए-इश्क़’ जैसी फ़िल्मों के प्रस्ताव ठुकराने पर मजबूर कर दिया। आज वह 120 करोड़ रुपये के ज़ोराबियन चिकन साम्राज्य की कमान संभाल रही हैं—वही पारिवारिक व्यवसाय जिसके लिए उन्होंने कभी पिता से फ़िल्मों के लिए एक महीने की छुट्टी माँगी थी।

पेरिज़ाद का यह फ़ैसला भारतीय सिनेमा के उस बड़े सच की ओर इशारा करता है जहाँ चमक के पीछे निजी मूल्य और संरचनात्मक असहजताएँ काम करती हैं। कमल हासन ने अस्सी के दशक में बॉलीवुड छोड़ने का जो कारण बताया, वह इसी असहजता का दूसरा चेहरा था। ‘एक दूजे के लिए’ और ‘सागर’ जैसी हिट फ़िल्मों के बाद भी वे ख़ुद को हिंदी सिनेमा का ‘ग़रीब रिश्तेदार’ महसूस करते थे। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि उस दौर में अंडरवर्ल्ड का प्रभाव और काले धन का चलन इतना गहरा था कि वे न तो उसके ख़िलाफ़ लड़ना चाहते थे, न ही उसके आगे झुकना। इसलिए उन्होंने बीच का रास्ता चुना—ख़ामोशी से हट जाना।

यह सिर्फ़ बड़े सितारों की कहानी नहीं है। तमन्ना भाटिया ने हाल ही में दक्षिण भारतीय फ़िल्म उद्योग में अभिनेत्रियों के साथ होने वाले व्यवहार पर खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि किस तरह लोग ‘अजीब निगाहों’ से देखते हैं, जो अक्सर असहज कर देने वाली होती हैं। तमन्ना इसे किसी एक व्यक्ति का दोष न मानकर सदियों पुरानी पितृसत्तात्मक मानसिकता का नतीजा बताती हैं, लेकिन साथ ही यह भी स्वीकार करती हैं कि इसी इंडस्ट्री ने उन्हें पहचान और सम्मान दिया। उनका मानना है कि नई पीढ़ी के निर्माता और कलाकार पहले से कहीं अधिक संवेदनशील हैं, और खुलकर बातचीत से ही बदलाव संभव है।

दर्शकों की नज़र भी उतनी ही जटिल है। बेंगलुरु में एक सोमवार दोपहर को समांथा रुथ प्रभु की तेलुगु फ़िल्म ‘माँ इंटी बंगारम’ के शो तेज़ी से भर रहे थे, जबकि उसी दिन रिलीज़ हुई कन्नड़ फ़िल्म ‘मैंगो पच्चा’—जो किच्चा सुदीप के भतीजे संचित संजीव की पहली फ़िल्म थी—को सकारात्मक समीक्षाओं के बावजूद ख़ाली सीटों का सामना करना पड़ा। निर्देशक तरुण सुधीर इसे तेनालीराम और बिल्ली की कहानी से समझाते हैं: सालों तक घटिया कंटेंट परोसने के बाद अब कन्नड़ दर्शक अपनी ही फ़िल्मों पर भरोसा करने से कतराते हैं। दूसरी ओर, इंडोनेशिया में थाईलैंड के कलाकार जिरायुत अपनी पहली फ़िल्म ‘चेक खोदाम’ में मुख्य भूमिका निभाने से हिचकिचा रहे थे, लेकिन माँ की वह सरल इच्छा—‘बेटा, बड़े पर्दे पर तुम्हारा चेहरा देखना चाहती हूँ’—उनके भीतर हिम्मत भर गई।

ये तमाम कहानियाँ एक ही सिल्वर स्क्रीन के इर्द-गिर्द बुनी गई हैं, लेकिन इनके धागे अलग-अलग दिशाओं में खिंचते हैं—कोई परिवार की ओर, कोई आत्मसम्मान की ओर, कोई एक माँ की आँखों में बसी उम्मीद की ओर। पेरिज़ाद ज़ोराबियन आज जब अपने पोल्ट्री फ़ार्म के आँकड़े देखती होंगी, तो शायद उन्हें कभी-कभी वह पारिवारिक महफ़िल याद आती होगी जहाँ एक अनजानी नज़र ने उनकी ज़िंदगी को कुछ सालों के लिए रुपहले पर्दे पर रोशन कर दिया था।

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

2 संपादकीय समूह · 1 भाषाएँ

62%
लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रेसअरब खाड़ी प्रेस
भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रेस
व्यावहारिकताआक्रोशसंदेह

भारतीय मीडिया अभिनेताओं के पर्दे से दूर जाने के विविध कारणों को उजागर करता है: पेरिज़ाद ज़ोराबियन का पोल्ट्री साम्राज्य के साथ उद्यमशील सफलता, कमल हासन का अंडरवर्ल्ड की धमकियों से पलायन, और अभिनेत्रियों की यौनवादी निगाहों की शिकायतें। कन्नड़ सिनेमा में महिला-प्रधान परियोजनाओं की कमी सहित उद्योग की संरचनात्मक समस्याएं जांच के दायरे में हैं।

अरब खाड़ी प्रेस
विजयव्यावहारिकता

खाड़ी प्रेस पेरिज़ाद ज़ोराबियन के क्षणभंगुर बॉलीवुड प्रसिद्धि से 1.2 अरब रुपये के पोल्ट्री व्यवसाय में परिवर्तन का जश्न मनाती है, उनके प्रस्थान को उद्यमिता में एक स्मार्ट, अनियोजित कदम के रूप में पेश करती है। कहानी वित्तीय पैमाने और पारिवारिक व्यवसाय की विरासत पर जोर देती है।

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अमेरिकी हिरासत में मौतों पर संयुक्त राष्ट्र की जांच की मांग, टीपीएस समाप्ति से निर्वासन का रास्ता साफ·विंबलडन में सिनर का खून-पसीने वाला संघर्ष: पहले दौर में पांच सेटों की जंग जीतकर बचाई प्रतिष्ठा·खाद्य भंडारण और पकाने की नई समझ: पोषक तत्वों की जैवउपलब्धता पर असर·अमेरिका में भीषण ताप लहर, विश्व कप 2026 के नॉकआउट मैच और फाइनल पर संकट·EU-चीन व्यापार वार्ता: अक्टूबर तक ठोस नतीजों की समयसीमा तय·रूसी गैस टैंकर पर पहली बार भारी हथियार, बाल्टिक में बढ़ा तनाव·इज़राइल ने लेबनान से वापसी को शर्तों से जोड़ा, हिज़्बुल्लाह ने समझौता खारिज किया; ईरान-अमेरिका वार्ता पर टिकी निगाहें·तेहरान-दुबई के बीच चार महीने बाद पहली सीधी उड़ान, क्षेत्रीय विमानन में आंशिक बहाली·अमेरिकी हिरासत में मौतों पर संयुक्त राष्ट्र की जांच की मांग, टीपीएस समाप्ति से निर्वासन का रास्ता साफ·विंबलडन में सिनर का खून-पसीने वाला संघर्ष: पहले दौर में पांच सेटों की जंग जीतकर बचाई प्रतिष्ठा·खाद्य भंडारण और पकाने की नई समझ: पोषक तत्वों की जैवउपलब्धता पर असर·अमेरिका में भीषण ताप लहर, विश्व कप 2026 के नॉकआउट मैच और फाइनल पर संकट·EU-चीन व्यापार वार्ता: अक्टूबर तक ठोस नतीजों की समयसीमा तय·रूसी गैस टैंकर पर पहली बार भारी हथियार, बाल्टिक में बढ़ा तनाव·इज़राइल ने लेबनान से वापसी को शर्तों से जोड़ा, हिज़्बुल्लाह ने समझौता खारिज किया; ईरान-अमेरिका वार्ता पर टिकी निगाहें·तेहरान-दुबई के बीच चार महीने बाद पहली सीधी उड़ान, क्षेत्रीय विमानन में आंशिक बहाली·
अपडेट 03:39 pm1 भाषा · 1 स्रोत
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शुक्रवार, 26 जून 2026

रुपहले पर्दे की चकाचौंध से दूर, जब सितारे चुनते हैं कोई और राह

एक अभिनेत्री का पोल्ट्री कारोबार, एक सुपरस्टार का अंडरवर्ल्ड से सामना और नई पीढ़ी की झिझक—ये कहानियाँ बताती हैं कि फ़िल्मी दुनिया की चमक के पीछे कितने अलग-अलग सच छिपे हैं।

मुंबई की एक पारिवारिक महफ़िल में मॉडल कोऑर्डिनेटर की नज़र एक युवा पारसी लड़की पर पड़ी। वह लड़की थी पेरिज़ाद ज़ोराबियन, जो अभी-अभी न्यूयॉर्क से एमबीए करके लौटी थी और पिता के चिकन कारोबार में हाथ बँटा रही थी। उस एक नज़र ने उसे फ़ेयर एंड लवली के विज्ञापन तक पहुँचाया, और फिर नागेश कुकुनूर की ‘बॉलीवुड कॉलिंग’ में ओम पुरी के साथ मुख्य भूमिका तक। पेरिज़ाद ख़ुद इसे ‘अनियोजित’ प्रवेश कहती हैं—एक ऐसी अभिनेत्री जिसका पहला सपना आठ साल की उम्र से व्यवसाय था, अभिनय नहीं।

यह सिलसिला आगे बढ़ा और पेरिज़ाद ने ‘जॉगर्स पार्क’, ‘मॉर्निंग रागा’ और अमिताभ बच्चन के साथ ‘एक अजनबी’ जैसी फ़िल्मों में काम किया। लेकिन 33 साल की उम्र में बोमन ईरानी (अभिनेता नहीं, बल्कि एक व्यवसायी) से शादी के बाद उन्होंने फ़िल्मी दुनिया से दूरी बना ली। पति की यह इच्छा कि पत्नी लंबे समय तक शूटिंग पर बाहर न रहे, और ख़ुद पेरिज़ाद की माँ बनने की चाहत ने उन्हें सुभाष घई की ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ और निखिल आडवाणी की ‘सलाम-ए-इश्क़’ जैसी फ़िल्मों के प्रस्ताव ठुकराने पर मजबूर कर दिया। आज वह 120 करोड़ रुपये के ज़ोराबियन चिकन साम्राज्य की कमान संभाल रही हैं—वही पारिवारिक व्यवसाय जिसके लिए उन्होंने कभी पिता से फ़िल्मों के लिए एक महीने की छुट्टी माँगी थी।

पेरिज़ाद का यह फ़ैसला भारतीय सिनेमा के उस बड़े सच की ओर इशारा करता है जहाँ चमक के पीछे निजी मूल्य और संरचनात्मक असहजताएँ काम करती हैं। कमल हासन ने अस्सी के दशक में बॉलीवुड छोड़ने का जो कारण बताया, वह इसी असहजता का दूसरा चेहरा था। ‘एक दूजे के लिए’ और ‘सागर’ जैसी हिट फ़िल्मों के बाद भी वे ख़ुद को हिंदी सिनेमा का ‘ग़रीब रिश्तेदार’ महसूस करते थे। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि उस दौर में अंडरवर्ल्ड का प्रभाव और काले धन का चलन इतना गहरा था कि वे न तो उसके ख़िलाफ़ लड़ना चाहते थे, न ही उसके आगे झुकना। इसलिए उन्होंने बीच का रास्ता चुना—ख़ामोशी से हट जाना।

यह सिर्फ़ बड़े सितारों की कहानी नहीं है। तमन्ना भाटिया ने हाल ही में दक्षिण भारतीय फ़िल्म उद्योग में अभिनेत्रियों के साथ होने वाले व्यवहार पर खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि किस तरह लोग ‘अजीब निगाहों’ से देखते हैं, जो अक्सर असहज कर देने वाली होती हैं। तमन्ना इसे किसी एक व्यक्ति का दोष न मानकर सदियों पुरानी पितृसत्तात्मक मानसिकता का नतीजा बताती हैं, लेकिन साथ ही यह भी स्वीकार करती हैं कि इसी इंडस्ट्री ने उन्हें पहचान और सम्मान दिया। उनका मानना है कि नई पीढ़ी के निर्माता और कलाकार पहले से कहीं अधिक संवेदनशील हैं, और खुलकर बातचीत से ही बदलाव संभव है।

दर्शकों की नज़र भी उतनी ही जटिल है। बेंगलुरु में एक सोमवार दोपहर को समांथा रुथ प्रभु की तेलुगु फ़िल्म ‘माँ इंटी बंगारम’ के शो तेज़ी से भर रहे थे, जबकि उसी दिन रिलीज़ हुई कन्नड़ फ़िल्म ‘मैंगो पच्चा’—जो किच्चा सुदीप के भतीजे संचित संजीव की पहली फ़िल्म थी—को सकारात्मक समीक्षाओं के बावजूद ख़ाली सीटों का सामना करना पड़ा। निर्देशक तरुण सुधीर इसे तेनालीराम और बिल्ली की कहानी से समझाते हैं: सालों तक घटिया कंटेंट परोसने के बाद अब कन्नड़ दर्शक अपनी ही फ़िल्मों पर भरोसा करने से कतराते हैं। दूसरी ओर, इंडोनेशिया में थाईलैंड के कलाकार जिरायुत अपनी पहली फ़िल्म ‘चेक खोदाम’ में मुख्य भूमिका निभाने से हिचकिचा रहे थे, लेकिन माँ की वह सरल इच्छा—‘बेटा, बड़े पर्दे पर तुम्हारा चेहरा देखना चाहती हूँ’—उनके भीतर हिम्मत भर गई।

ये तमाम कहानियाँ एक ही सिल्वर स्क्रीन के इर्द-गिर्द बुनी गई हैं, लेकिन इनके धागे अलग-अलग दिशाओं में खिंचते हैं—कोई परिवार की ओर, कोई आत्मसम्मान की ओर, कोई एक माँ की आँखों में बसी उम्मीद की ओर। पेरिज़ाद ज़ोराबियन आज जब अपने पोल्ट्री फ़ार्म के आँकड़े देखती होंगी, तो शायद उन्हें कभी-कभी वह पारिवारिक महफ़िल याद आती होगी जहाँ एक अनजानी नज़र ने उनकी ज़िंदगी को कुछ सालों के लिए रुपहले पर्दे पर रोशन कर दिया था।

स्रोतों में मतभेद

मीडिया और मनोरंजन · 1 स्रोत · 1 भाषा

62%उच्च

स्रोत कैसे एक ही तथ्यों को अलग-अलग तरीके से बयाँ करते हैं।

विभाजन कैसे है

समर्थक25%
न्यूनत्र25%
निंदक50%

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

2 संपादकीय समूह · 1 भाषाएँ

लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रेसअरब खाड़ी प्रेस
भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रेस
व्यावहारिकताआक्रोशसंदेह

भारतीय मीडिया अभिनेताओं के पर्दे से दूर जाने के विविध कारणों को उजागर करता है: पेरिज़ाद ज़ोराबियन का पोल्ट्री साम्राज्य के साथ उद्यमशील सफलता, कमल हासन का अंडरवर्ल्ड की धमकियों से पलायन, और अभिनेत्रियों की यौनवादी निगाहों की शिकायतें। कन्नड़ सिनेमा में महिला-प्रधान परियोजनाओं की कमी सहित उद्योग की संरचनात्मक समस्याएं जांच के दायरे में हैं।

अरब खाड़ी प्रेस
विजयव्यावहारिकता

खाड़ी प्रेस पेरिज़ाद ज़ोराबियन के क्षणभंगुर बॉलीवुड प्रसिद्धि से 1.2 अरब रुपये के पोल्ट्री व्यवसाय में परिवर्तन का जश्न मनाती है, उनके प्रस्थान को उद्यमिता में एक स्मार्ट, अनियोजित कदम के रूप में पेश करती है। कहानी वित्तीय पैमाने और पारिवारिक व्यवसाय की विरासत पर जोर देती है।

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