
इराक ने ईरान समर्थित सशस्त्र गुटों को 30 सितंबर तक हथियार सौंपने की समय-सीमा दी
अमेरिकी दबाव और प्रधानमंत्री की वाशिंगटन यात्रा से पहले बगदाद ने सभी गैर-राजकीय हथियारों को कानूनी दायरे में लाने की नीति को सख्ती से लागू करने की घोषणा की।
इराकी सरकार ने सोमवार को घोषणा की कि देश में सक्रिय सभी सशस्त्र समूहों को 30 सितंबर 2026 तक अपने हथियार राज्य को सौंपने होंगे। सरकारी प्रवक्ता हैदर अल-अबूदी के अनुसार, यह तिथि अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के सैन्य मिशन की समाप्ति के साथ मेल खाती है, जिसके बाद किसी भी गैर-सरकारी हथियार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। प्रधानमंत्री अली अल-जैदी ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि ‘हथियारों को राज्य तक सीमित करना केवल नारा नहीं, बल्कि लागू की जा रही नीति है’ और सितंबर में गठबंधन सेना की पूर्ण वापसी होगी।
इस निर्णय के केंद्र में ईरान समर्थित दर्जनों शिया गुट हैं, जो मुख्यतः हश्द अल-शाबी (पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज) के अंतर्गत संगठित हैं। इराकी सरकार के अनुसार, कताइब इमाम अली, असाइब अहल अल-हक और सराया अल-सलाम जैसे कुछ गुटों ने पहले ही अपने हथियार सेना को सौंप दिए हैं, जबकि कताइब हिजबुल्लाह, कताइब सैय्यद अल-शुहदा और हरकत अल-नुजबा जैसे तेहरान के करीबी संगठनों ने गठबंधन बलों की मौजूदगी का हवाला देकर अब तक इनकार किया है। अमेरिकी प्रशासन इनमें से कई गुटों को आतंकवादी सूची में रखता है और बगदाद पर इनके पूर्ण निरस्त्रीकरण के लिए लगातार दबाव बना रहा है।
वाशिंगटन के रुख से जुड़े सूत्रों के अनुसार, अमेरिका ने इराकी तेल राजस्व के भुगतान और सुरक्षा सहायता को इन गुटों के खिलाफ ठोस कदमों से जोड़ रखा था। मई 2026 की शुरुआत में जब बगदाद ने कुछ समूहों के हथियारों का ब्योरा सौंपना शुरू किया, तब वित्तीय हस्तांतरण फिर से बहाल करने का आश्वासन मिला। यह कदम प्रधानमंत्री अल-जैदी की पहली अमेरिकी यात्रा से ठीक पहले उठाया गया है, जो संकेत देता है कि वाशिंगटन इराक को ईरानी प्रभाव कम करने के लिए एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखता है। दूसरी ओर, ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराकची की हालिया बगदाद यात्रा और ग्रीन जोन में भ्रष्टाचार विरोधी छापे के दौरान तेहरान समर्थक माने जाने वाले कुछ अधिकारियों की गिरफ्तारी से संकेत मिलता है कि इराकी धरती पर प्रभाव की यह जंग तेज हो गई है।
दक्षिण एशियाई परिप्रेक्ष्य से, इराक का स्थिरीकरण और ईरान समर्थित मिलिशिया का निरस्त्रीकरण क्षेत्रीय ऊर्जा बाजारों के लिए सकारात्मक संकेत है। भारत इराक से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है और खाड़ी क्षेत्र में उसके लाखों प्रवासी कामगार कार्यरत हैं। पिछले वर्षों में इन गुटों द्वारा अमेरिकी ठिकानों और यहां तक कि संयुक्त अरब अमीरात के परमाणु संयंत्र पर ड्रोन हमलों ने पूरे पश्चिम एशिया में असुरक्षा बढ़ाई थी। विश्लेषकों के अनुसार, यदि बगदाद वास्तव में हथियारों पर राजकीय एकाधिकार स्थापित कर पाता है, तो इससे न केवल इराक की संप्रभुता मजबूत होगी, बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा भी बेहतर होगी।
फिलहाल, 30 सितंबर की समय-सीमा के बाद कानूनी कार्रवाई की चेतावनी के साथ, इराकी सरकार ने सभी पक्षों को स्पष्ट संदेश दे दिया है। प्रधानमंत्री अल-जैदी की अमेरिका यात्रा के बाद तुर्की, सऊदी अरब और ईरान की कूटनीतिक यात्राएं प्रस्तावित हैं, जो इस मुद्दे पर क्षेत्रीय संतुलन साधने की बगदाद की रणनीति को दर्शाती हैं। अगले तीन महीनों में यह देखना अहम होगा कि कितने गुट स्वेच्छा से हथियार सौंपते हैं और किन पर बल प्रयोग की नौबत आती है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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इराकी सरकार ने सशस्त्र समूहों को हथियार सौंपने की समय-सीमा 30 सितंबर तय की है, यह तारीख अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बलों की पूर्ण वापसी का भी प्रतीक है। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि हथियारों को राज्य तक सीमित करना कोई नारा नहीं बल्कि पहले से शुरू की गई नीति है। यह समय-सीमा गठबंधन मिशन के अंत से जुड़ी है, जिसे पूर्ण संप्रभुता की ओर एक कदम माना जा रहा है।
इराकी सरकार ने ईरान की प्रॉक्सी मिलिशिया को हथियार सौंपने के लिए तीन महीने का अल्टीमेटम दिया है, जिसकी अंतिम तिथि 30 सितंबर है। यह तारीख गठबंधन मिशन की समाप्ति के साथ मेल खाती है, जिसे ये सशस्त्र समूह अपने शस्त्रागार बनाए रखने का बहाना बनाते रहे हैं। समय-सीमा के बाद, राज्य के नियंत्रण से बाहर सभी हथियारों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होगी।
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