
अमेरिकी हमलों के बाद ट्रंप ने युद्धविराम को 'खत्म' बताया, कच्चा तेल 5% उछलकर 80 डॉलर के पार
होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ने और ईरान पर नए अमेरिकी हमलों के बाद वैश्विक तेल कीमतों में बुधवार को जोरदार तेजी आई, जिससे आपूर्ति बाधा की आशंकाएँ फिर गहरा गईं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ अंतरिम युद्धविराम समझौते को 'खत्म' घोषित करने और अमेरिकी सेना द्वारा ईरानी सैन्य ठिकानों पर नए हमले शुरू करने के बाद बुधवार को वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में 5% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई। ब्रेंट क्रूड का वायदा भाव 78.02 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ, जबकि सत्र के दौरान यह 80 डॉलर के स्तर को पार कर गया था; वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) 4.37% बढ़कर 73.52 डॉलर पर पहुँच गया। यह तेजी अमेरिकी सेंट्रल कमांड द्वारा ईरान के तटीय क्षेत्रों में वायु रक्षा प्रणालियों, मिसाइल भंडारण स्थलों और नौसैनिक क्षमताओं सहित लगभग 90 लक्ष्यों पर हमले की पुष्टि के तुरंत बाद आई।
तेल बाजारों में यह उथल-पुथल मुख्य रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े जोखिमों से प्रेरित है, जो वैश्विक तेल और एलएनजी आपूर्ति के लगभग पाँचवें हिस्से का पारगमन मार्ग है। रिस्टाड एनर्जी के विश्लेषकों के अनुसार, ताजा सैन्य कार्रवाइयों के बाद जलडमरूमध्य से टैंकर यातायात 'व्यावहारिक रूप से रुक गया' है, क्योंकि जहाज मालिक और बीमाकर्ता जोखिम को अस्वीकार्य स्तर पर आंक रहे हैं। ईरान ने जवाबी कार्रवाई में बहरीन और कुवैत में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले का दावा किया और होर्मुज को बंद करने की धमकी दी, जबकि अमेरिका ने ईरानी कच्चे तेल की बिक्री पर लगे प्रतिबंधों में दी गई छूट को वापस ले लिया।
वैश्विक वित्तीय बाजारों पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ा। यूरोपीय शेयर बाजारों में गिरावट दर्ज की गई—फ्रैंकफर्ट का डैक्स 2.23% और पेरिस का सीएसी 2.18% टूटा—जबकि वॉल स्ट्रीट पर डाओ जोन्स 1.09% नीचे आया। ऊर्जा लागत बढ़ने की आशंका से मुद्रास्फीति के दबाव के चलते सरकारी बॉन्ड यील्ड में इजाफा हुआ; फ्रांस का 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड 3.92% पर पहुँच गया, जो 2009 के बाद का उच्चतम स्तर है। भारत जैसे प्रमुख तेल आयातक देशों के लिए कीमतों में यह उछाल चालू खाते के घाटे और घरेलू ईंधन मूल्यों पर दबाव डाल सकता है, हालाँकि सरकारी तेल कंपनियों ने अभी तक खुदरा मूल्यों में संशोधन नहीं किया है।
डीबीएस बैंक के ऊर्जा शोध प्रमुख सुवरो सरकार का मानना है कि ईरान के पास बातचीत को लंबा खींचने का हर प्रोत्साहन है, जिससे आने वाले महीनों में तेल की कीमतों में अस्थिरता बनी रहेगी। वहीं, कैपिटल इकोनॉमिक्स के विश्लेषकों का आकलन है कि यदि कोई नया युद्धविराम स्थापित होता है और निर्यात प्रवाह सुचारू होता है, तो ब्रेंट 2026 के अंत तक मौजूदा स्तरों के आसपास स्थिर हो सकता है। बाजार की निगाहें अब 9 जुलाई के बाद की स्थिति पर टिकी हैं, जब ईरान में सर्वोच्च नेता के शोक की अवधि समाप्त होगी और यह स्पष्ट होगा कि दोनों पक्ष कूटनीतिक रास्ते पर लौटने के इच्छुक हैं या नहीं।
| ईरानी और संबद्ध प्रेस | −0.70 | critical |
|---|---|---|
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | −0.30 | critical |
| अरब खाड़ी प्रेस | 0.00 | neutral |
Iran denounces American aggression and emphasizes the ceasefire violation, attributing the oil surge to Washington's threats.
It builds a narrative of innocent victim, emphasizing Trump's statements and US military actions, while downplaying Iran's role in attacks on ships.
Omits the Iranian attacks on commercial vessels that triggered the US response, and the reimposed sanctions.
The West warns against global instability and inflation, highlighting market uncertainty and the fragility of the ceasefire.
It adopts an economic news tone with emphasis on systemic consequences, presenting the escalation as a threat to all markets.
Does not delve into Iranian motivations or Tehran's claims, focusing solely on economic impact.
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It prioritizes market data and technical analysis, avoiding political judgments and maintaining a focus on practical energy implications.
Does not discuss political responsibilities for the ceasefire breakdown, nor Iranian or American positions, limiting to price effects.
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