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अमेरिका ने 60 देशों पर लगाए नए शुल्क, भारत भी प्रभावित; चीन ने व्यापार युद्ध की दी चेतावनी

जबरन श्रम से उत्पादित वस्तुओं के आयात पर रोक के नाम पर लगाए गए इन शुल्कों से वैश्विक व्यापार वार्ताओं पर ख़तरा मंडराने लगा है।

अमेरिका ने 24 जुलाई से 60 व्यापारिक साझेदारों पर नए आयात शुल्क लगा दिए हैं, जो जबरन श्रम के माध्यम से उत्पादित वस्तुओं पर अंकुश लगाने के नाम पर 10 से 12.5 प्रतिशत तक निर्धारित किए गए हैं। यह कदम फरवरी में सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति ट्रंप की पूर्व टैरिफ दीवार को खारिज किए जाने के बाद उठाया गया है। भारत और जापान जैसे प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं पर 12.5% की ऊंची दर लागू हुई है, जबकि कनाडा, यूरोपीय संघ और ब्रिटेन जैसे देशों को 10% की कम दर दी गई है, क्योंकि इन्होंने जबरन श्रम निषेध पर कानूनी उपाय किए हैं।

इस निर्णय का आधार अमेरिकी व्यापार कानून की धारा 301 के तहत जांच है, जिसमें वाशिंगटन ने माना कि अधिकतर साझेदार देशों ने बंधुआ मजदूरी से बने माल को रोकने के पर्याप्त कदम नहीं उठाए। दिलचस्प है कि पहले से ऑटोमोबाइल और इस्पात जैसे क्षेत्रों पर लगे शुल्क अलग रहेंगे। चीन इस सूची में सबसे ऊपर है और उस पर पहले से मौजूद शुल्कों के अतिरिक्त 12.5% लगाया गया है। हालांकि, कुछ एशियाई देश जैसे इंडोनेशिया, मलेशिया और मेक्सिको 10% के दायरे में आए हैं।

प्रतिक्रियाओं की बात करें तो चीन ने इस कदम की तीखी निंदा की और कहा कि 'सभी प्रकार के एकतरफा शुल्क उपायों का हम विरोध करते हैं, टैरिफ और व्यापार युद्ध किसी के हित में नहीं।' यूरोपीय संघ ने इसे टर्नबेरी संयुक्त घोषणा के अनुरूप बताते हुए स्वीकार किया है जबकि ब्रिटेन ने स्थिति को यह कहकर टाल दिया कि उसके कारोबार पर 10% की सीमा पिछले समझौते के तहत बनी रहेगी। ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया ने इन शुल्कों को मनमाना और निराधार बताया। भारत ने अभी औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारतीय निर्यात पर प्रतिस्पर्धा का दबाव बढ़ सकता है।

यह विकास ऐसे समय में हुआ है जब पिछले वर्ष भीषण व्यापार युद्ध के बाद अमेरिका और चीन के बीच तनाव कम करने की दिशा में कदम उठ रहे थे। ट्रंप की मई में बीजिंग यात्रा के बाद दोनों पक्षों ने 30-30 अरब डॉलर के पारस्परिक टैरिफ में कटौती पर चर्चा शुरू की थी और एक नई द्विपक्षीय व्यापार परिषद बनाने की तैयारी थी। लेकिन नए शुल्कों ने इन वार्ताओं पर ग्रहण लगा दिया है। फिलहाल न तो बीजिंग ने जवाबी कार्रवाई का संकेत दिया है और न ही वाशिंगटन पीछे हटता दिख रहा है। आगे की राह इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों पक्ष बातचीत की मेज पर कितनी जल्दी लौटते हैं।

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अमेरिका ने 60 देशों पर लगाए नए शुल्क, भारत भी प्रभावित; चीन ने व्यापार युद्ध की दी चेतावनी

जबरन श्रम से उत्पादित वस्तुओं के आयात पर रोक के नाम पर लगाए गए इन शुल्कों से वैश्विक व्यापार वार्ताओं पर ख़तरा मंडराने लगा है।

अमेरिका ने 24 जुलाई से 60 व्यापारिक साझेदारों पर नए आयात शुल्क लगा दिए हैं, जो जबरन श्रम के माध्यम से उत्पादित वस्तुओं पर अंकुश लगाने के नाम पर 10 से 12.5 प्रतिशत तक निर्धारित किए गए हैं। यह कदम फरवरी में सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति ट्रंप की पूर्व टैरिफ दीवार को खारिज किए जाने के बाद उठाया गया है। भारत और जापान जैसे प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं पर 12.5% की ऊंची दर लागू हुई है, जबकि कनाडा, यूरोपीय संघ और ब्रिटेन जैसे देशों को 10% की कम दर दी गई है, क्योंकि इन्होंने जबरन श्रम निषेध पर कानूनी उपाय किए हैं।

इस निर्णय का आधार अमेरिकी व्यापार कानून की धारा 301 के तहत जांच है, जिसमें वाशिंगटन ने माना कि अधिकतर साझेदार देशों ने बंधुआ मजदूरी से बने माल को रोकने के पर्याप्त कदम नहीं उठाए। दिलचस्प है कि पहले से ऑटोमोबाइल और इस्पात जैसे क्षेत्रों पर लगे शुल्क अलग रहेंगे। चीन इस सूची में सबसे ऊपर है और उस पर पहले से मौजूद शुल्कों के अतिरिक्त 12.5% लगाया गया है। हालांकि, कुछ एशियाई देश जैसे इंडोनेशिया, मलेशिया और मेक्सिको 10% के दायरे में आए हैं।

प्रतिक्रियाओं की बात करें तो चीन ने इस कदम की तीखी निंदा की और कहा कि 'सभी प्रकार के एकतरफा शुल्क उपायों का हम विरोध करते हैं, टैरिफ और व्यापार युद्ध किसी के हित में नहीं।' यूरोपीय संघ ने इसे टर्नबेरी संयुक्त घोषणा के अनुरूप बताते हुए स्वीकार किया है जबकि ब्रिटेन ने स्थिति को यह कहकर टाल दिया कि उसके कारोबार पर 10% की सीमा पिछले समझौते के तहत बनी रहेगी। ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया ने इन शुल्कों को मनमाना और निराधार बताया। भारत ने अभी औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारतीय निर्यात पर प्रतिस्पर्धा का दबाव बढ़ सकता है।

यह विकास ऐसे समय में हुआ है जब पिछले वर्ष भीषण व्यापार युद्ध के बाद अमेरिका और चीन के बीच तनाव कम करने की दिशा में कदम उठ रहे थे। ट्रंप की मई में बीजिंग यात्रा के बाद दोनों पक्षों ने 30-30 अरब डॉलर के पारस्परिक टैरिफ में कटौती पर चर्चा शुरू की थी और एक नई द्विपक्षीय व्यापार परिषद बनाने की तैयारी थी। लेकिन नए शुल्कों ने इन वार्ताओं पर ग्रहण लगा दिया है। फिलहाल न तो बीजिंग ने जवाबी कार्रवाई का संकेत दिया है और न ही वाशिंगटन पीछे हटता दिख रहा है। आगे की राह इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों पक्ष बातचीत की मेज पर कितनी जल्दी लौटते हैं।

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