
दक्षिण लेबनान में संघर्षविराम के बीच इजरायली हमले, हिजबुल्लाह ने दी कड़ी चेतावनी
इजरायली सेना के एक जवान की मौत और लेबनानी नागरिकों पर हमलों के बाद हिजबुल्लाह ने युद्धविराम उल्लंघन की चेतावनी देते हुए पूर्ण इजरायली वापसी की मांग दोहराई।
दक्षिण लेबनान में अमेरिकी-ईरानी समझौता ज्ञापन के बाद लागू हुए संघर्षविराम के बावजूद हिंसा थम नहीं रही है। इजरायली सेना ने बताया कि बुधवार को एक ‘सक्रिय अभियान’ के दौरान उसका एक 32 वर्षीय सार्जेंट मारा गया, जबकि लेबनानी सरकारी मीडिया के अनुसार, कफ़र रुम्मान और ज़वतर-मेफ़दून के पास वाहनों पर ड्रोन हमलों में कम से कम पाँच लोगों की मौत हुई। ये घटनाएँ ऐसे समय हुई हैं जब लेबनान और इज़रायल के बीच वाशिंगटन में सीधी बातचीत का पाँचवाँ दौर जारी है, और मध्यस्थ पाकिस्तान व कतर ने तनाव कम करने के लिए एक ‘डी-कॉन्फ्लिक्शन सेल’ गठित करने की घोषणा की है।
इजरायली सेना के अनुसार, ये हमले ‘सुरक्षा क्षेत्र’ में घुसपैठ कर रहे संदिग्ध हिजबुल्लाह लड़ाकों को निशाना बनाकर किए गए, जो सैनिकों के लिए ख़तरा थे। सेना ने दावा किया कि अली अल-ताहेर रिज के पास एक वाहन और ज़वतर अल-शर्किया में पाँच सशस्त्र लोगों को मार गिराया गया। इसके विपरीत, हिजबुल्लाह ने इसे ‘जानबूझकर नागरिकों को निशाना बनाने’ वाला ‘घोर युद्धविराम उल्लंघन’ बताया। समूह के सैन्य मीडिया ने कहा कि मारे गए लोग अपने घरों का जायज़ा लेने गए थे, और चेतावनी दी कि ये उल्लंघन ‘वास्तविक समय में दर्ज और निगरानी में हैं।’
हिजबुल्लाह के सांसद हसन फदलल्लाह ने राजनीतिक रुख़ स्पष्ट करते हुए कहा कि पूर्ण इजरायली वापसी के बिना कोई अंतिम समझौता नहीं होगा। उन्होंने ईरान-अमेरिका समझौता ज्ञापन को ‘ईरान के लिए बड़ी उपलब्धि’ बताते हुए दावा किया कि इसने लेबनान को भी सुरक्षित किया है और ईरान का परमाणु कार्यक्रम अब लेबनान के हितों से जुड़ गया है। दूसरी ओर, इजरायली रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज़ ने कहा कि सेना दक्षिण लेबनान से पीछे नहीं हटेगी, भले ही अमेरिका वापसी की माँग करे। यह बयान ऐसे समय आया जब इजरायली सेना ने अली अल-ताहेर क्षेत्र में एक बड़ी सुरंग में लगभग 30 हिजबुल्लाह सदस्यों की मौजूदगी की भी पुष्टि की।
यह ताज़ा हिंसा फरवरी 2026 में शुरू हुए युद्ध की पृष्ठभूमि में है, जिसमें लेबनानी सरकार के आँकड़ों के अनुसार अब तक लगभग 4,200 लोग मारे जा चुके हैं और दस लाख से अधिक विस्थापित हुए हैं। इजरायली सेना ने 37 सैनिकों और एक नागरिक ठेकेदार के मारे जाने की पुष्टि की है। संघर्षविराम के बाद से हालाँकि बड़े पैमाने की लड़ाई थमी है, लेकिन छिटपुट हमले और जवाबी आरोप जारी हैं। पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता वाली यह प्रक्रिया दक्षिण एशिया की कूटनीतिक भूमिका को भी रेखांकित करती है, जहाँ क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़े आर्थिक और सामरिक हित दाँव पर हैं। फ़िलहाल, वाशिंगटन वार्ता और डी-कॉन्फ्लिक्शन सेल के ज़रिए स्थिति को नियंत्रित करने के प्रयास जारी हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर पूर्ण शांति की संभावना अनिश्चित बनी हुई है।
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | −0.30 | critical |
|---|---|---|
| ईरानी और संबद्ध प्रेस | +0.20 | neutral |
| इज़राइली प्रेस | −0.50 | critical |
| अरब लेवांत-मगरिब प्रेस | −0.80 | critical |
Washington insists that the deal with Tehran is only a first step, subject to stringent verification, and that the clashes in Lebanon prove Iranian unreliability.
The bloc builds plausibility by constantly invoking the need for verification and conditionality, presenting the agreement as reversible and contingent on concrete evidence.
It omits Hezbollah's perspective and the Israeli provocations that triggered the clashes, as well as Iran's willingness to negotiate.
Tehran claims the deal's success and accuses Israel of sabotaging it through aggression, while the Lebanese resistance stands as a bulwark of sovereignty.
The bloc uses sacralization of resistance and victimhood, portraying Israel as the eternal aggressor and the agreement as a tool of liberation.
It omits American skepticism about the non-binding nature of the deal and Hezbollah's ceasefire violations.
Jerusalem rejects any diplomatic constraints and asserts its right to strike Hezbollah, while denouncing the deal as a capitulation.
The bloc adopts unilateral securitization, presenting any concession as an existential danger and legitimizing preemptive action.
It omits the context of Israeli violations of international law and international calls for withdrawal.
The Lebanese resistance proclaims that the Israeli occupier must be forced out, and that the deal with Iran will not stop the struggle until every inch of land is liberated.
The bloc uses sacralization of resistance and moral indignation, presenting every Israeli action as a desecration and the struggle as a religious duty.
It omits Hezbollah's role in triggering the clashes and the fragile nature of the US-Iran deal, as well as international criticism of the militia.
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