
दौड़ते बुज़ुर्ग, सिमटता दिमाग और एक कप कॉफ़ी: सेहत की नई इबारत
जकार्ता की एक दौड़ से लेकर भारतीय वैज्ञानिकों के त्रिआयामी ब्रेन मैप तक, उम्र और तकनीक के संगम की कहानियाँ बता रही हैं कि सेहतमंद जीवन अब किसी एक उम्र का मोहताज नहीं।
जकार्ता के केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय के प्रांगण में रविवार की सुबह क़रीब 900 लोग दौड़ने के लिए जुटे। उनकी उम्र 50 से पार थी, अधिकतर 60-70 के बीच। सीनियर हैप्पी रन 5K नाम की इस दौड़ में पूर्वी जावा के 59 वर्षीय पेंशनभोगी बंबांग सुहरमांतो ने महज़ 17 मिनट में फ़िनिश लाइन छू ली। वे रोज़ाना सुबह आठ से दस बजे तक अभ्यास करते हैं—इंटरवल, टेम्पो रन, फार्टलेक और भारोत्तोलन। उनका कहना है, “शुरुआत अपनी क्षमता के मुताबिक करें। अगर दूर तक नहीं दौड़ सकते, तो बिना रुके तीन किलोमीटर से शुरुआत करें, फिर धीरे-धीरे बढ़ाएं।”
यह दौड़ महज़ एक खेल आयोजन नहीं थी; यह उस सोच का चलता-फिरता नमूना थी जिसे अर्थशास्त्री ‘सिल्वर इकॉनमी’ कहते हैं। इंडोनेशिया में 60 साल से ऊपर की आबादी 11.97 प्रतिशत पार कर चुकी है और 2045 तक यह 6.5 करोड़ को छू लेगी। नीति-निर्माता अब बुज़ुर्गों को सिर्फ आश्रित नहीं, बल्कि सक्रिय उपभोक्ता, सलाहकार और उद्यमी मान रहे हैं। इसी सोच के तहत पर्यटन मंत्रालय ने दौड़ को पाँच प्राथमिकता वाले पर्यटन स्थलों—दानाउ तोबा, बोरोबुदुर, मंडलिका, लिकुपांग और लाबुआन बाजो—से जोड़ा, ताकि वरिष्ठ नागरिक भी घरेलू पर्यटन के संवाहक बनें।
इस बदलाव के पीछे दिमाग़ी सेहत को लेकर बढ़ती जागरूकता भी है। लैटिन अमेरिका के 12 देशों में हुए एक अध्ययन ने दिखाया कि नियमित व्यायाम, हरी पत्तेदार सब्ज़ियों, साबुत अनाज और जामुन से भरपूर खानपान, तथा सामाजिक मेलजोल से 60 से 77 साल के लोगों की याददाश्त और निर्णय-क्षमता बेहतर हुई। एक अन्य शोध में चाल की गति और संज्ञानात्मक गिरावट के बीच सीधा संबंध पाया गया—जो लोग धीमे चलते हैं, उनमें डिमेंशिया का ख़तरा तेज़ी से बढ़ता है। यही वजह है कि बंबांग जैसे धावकों की नियमितता दरअसल दिमाग़ के ‘ग्रे मैटर’ को बचाने का एक सहज उपाय है।
इसी कड़ी में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास के सुधा गोपालकृष्णन ब्रेन सेंटर ने एक ऐसा त्रिआयामी डिजिटल एटलस तैयार किया है जो मानव ब्रेनस्टेम की सूक्ष्मतम संरचना को उजागर करता है। ‘एंकर’ नाम का यह नक्शा एमआरआई स्कैन और सेलुलर पैथोलॉजी को पहली बार एकीकृत करता है, जिससे अल्ज़ाइमर, पार्किंसंस और स्ट्रोक जैसी बीमारियों की समझ गहरी हो सकती है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल से जुड़ी न्यूरोपैथोलॉजिस्ट रेबेका फोल्कर्थ इसे अपना “पुराना सपना” बताती हैं, जहाँ पूरे मस्तिष्क को एक साथ देखने और फिर एक न्यूरॉन तक ज़ूम करने की सुविधा मिलती है। यह एटलस मुफ़्त ऑनलाइन उपलब्ध है, जिससे दक्षिण एशियाई शोधकर्ताओं को भी सीधा लाभ मिलेगा।
सेहत की यह नई इबारत सिर्फ बुज़ुर्गों तक सीमित नहीं। जकार्ता में ही नेत्र रोग विशेषज्ञों ने चेताया कि सात साल से कम उम्र के बच्चों में मायोपिया तेज़ी से बढ़ रहा है, जिसकी मुख्य वजह स्क्रीन टाइम और बाहर कम खेलना है। वहीं पेकनबारू में बैडमिंटन ऑडिशन में 15 युवा खिलाड़ियों ने ‘सुपर टिकट’ हासिल किया, और कुदुस में महिला फ़ुटबॉल लीग के फ़ाइनल ने राष्ट्रीय टीम के लिए प्रतिभा खोजने का रास्ता खोला। इन सबके बीच, एक कप कॉफ़ी पीने की आदत भी चुपचाप लीवर को सिरोसिस और कैंसर से बचा रही है—यह बात 3.5 लाख से अधिक लोगों पर हुए अध्ययनों में सामने आई, जहाँ दिन में तीन-चार कप पीने वालों में लीवर संबंधी मृत्यु का जोखिम 41 प्रतिशत तक कम पाया गया।
इन तमाम घटनाओं के बीच एक साझा सूत्र है: शरीर और दिमाग़ को गतिमान रखने की ज़िद। चाहे वह 59 साल के बंबांग की सुबह की दौड़ हो, या भारतीय वैज्ञानिकों का वह डिजिटल नक्शा जिसमें एक क्लिक पर पूरा ब्रेनस्टेम आँखों के सामने खुल जाता है—दोनों ही यह याद दिलाते हैं कि सेहत अब अस्पताल की चारदीवारी से निकलकर फुटपाथ, प्रयोगशाला और रसोई तक फैल चुकी है।
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| लैटिन अमेरिकी प्रेस | 0.00 | neutral |
| अरब खाड़ी प्रेस | 0.00 | neutral |
हम सबूत पेश करते हैं: व्यायाम और आहार मस्तिष्क की रक्षा के लिए सिद्ध हैं। विज्ञान स्पष्ट है, और आगे का रास्ता कार्रवाई योग्य है।
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