
होर्मुज में बहुराष्ट्रीय सैन्य मिशन की योजना, ओमान ने दी सहमति; ईरान ने जताई आपत्ति
ब्रिटेन और फ्रांस ने जलडमरूमध्य में नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए व्यापक सैन्य तैनाती की तैयारी की घोषणा की, जबकि फ्रांस ने अपने माइन-क्लियरेंस बेड़े को क्षेत्र में बनाए रखने का निर्णय लिया।
ब्रिटेन और फ्रांस ने शुक्रवार को एक संयुक्त बयान में होर्मुज जलडमरूमध्य में नौवहन की स्वतंत्रता के समर्थन में एक बहुराष्ट्रीय सैन्य मिशन तैनात करने की तैयारी की घोषणा की। दोनों देशों ने इस जलमार्ग को वैश्विक अर्थव्यवस्था की 'महत्वपूर्ण धमनी' बताते हुए कहा कि सभी देशों के जहाजों के लिए सुरक्षित आवागमन बहाल करना अंतरराष्ट्रीय महत्व का विषय है। बयान के अनुसार, ओमान ने अपने संप्रभु जलक्षेत्र में नौवहन सुरक्षा को मजबूत करने के लिए ब्रिटेन और फ्रांस के साथ सहयोग करने पर सहमति दे दी है।
यूरोपीय पक्ष के अनुसार, यह कदम 17 अप्रैल को 50 से अधिक देशों की भागीदारी वाली एक अंतरराष्ट्रीय बैठक में शुरू की गई पहल का विस्तार है, जिसका उद्देश्य समुद्री सुरक्षा, माइन-क्लियरेंस और नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना था। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने घोषणा की कि विमानवाहक पोत शार्ल द गॉल अपने बेस टूलॉन लौट रहा है, लेकिन दो माइन-क्लियरेंस पोत, दो फ्रिगेट और एक समुद्री गश्ती विमान क्षेत्र में बने रहेंगे। मैक्रों ने इसे अमेरिका-ईरान के बीच हुए अस्थायी समझौते के बाद तनाव में कमी के अनुरूप उपस्थिति को समायोजित करने वाला कदम बताया।
ईरान ने इस पहल पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। विदेश मंत्रालय के कानूनी और अंतरराष्ट्रीय मामलों के उप मंत्री काज़िम ग़रीबाबादी ने कहा कि 'होर्मुज जलडमरूमध्य अतिरिक्त-क्षेत्रीय शक्तियों का सैन्य खेल का मैदान नहीं है' और तेहरान किसी भी बहाने से विदेशी सैन्य उपस्थिति के विस्तार की अनुमति नहीं देगा। ईरानी विदेश मंत्रालय ने पहले भी अमेरिका, इज़राइल और उनके सहयोगियों को क्षेत्र में असुरक्षा के लिए जिम्मेदार ठहराया था और इस बात पर जोर दिया था कि जलडमरूमध्य का प्रबंधन तटीय राज्यों की जिम्मेदारी और युद्धविराम समझौते की धारा पांच के आधार पर होना चाहिए।
भारत जैसे दक्षिण एशियाई देशों के लिए यह घटनाक्रम ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, क्योंकि होर्मुज से होकर ही खाड़ी क्षेत्र के तेल और गैस का बड़ा हिस्सा एशियाई बाजारों तक पहुंचता है। हाल के युद्ध काल में नौवहन में आई रुकावटों के कारण वैश्विक ईंधन कीमतों पर दबाव देखा गया था। पश्चिमी विश्लेषकों के अनुसार, माइन-क्लियरेंस क्षमताओं की स्थायी तैनाती इस आकलन को दर्शाती है कि जलडमरूमध्य में अस्थिरता का खतरा अभी टला नहीं है, भले ही सैन्य तनाव में कमी आई हो।
फिलहाल बहुराष्ट्रीय मिशन की तैनाती की कोई निश्चित तारीख घोषित नहीं की गई है, लेकिन ब्रिटेन और फ्रांस ने भागीदार देशों के साथ समन्वय जारी रखने की बात कही है। ओमान की सहमति से इस मिशन को कानूनी आधार मिलने की संभावना है, जबकि ईरान की कड़ी आपत्ति से क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर असर पड़ सकता है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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The joint statement by London and Paris is presented as a unilateral move that ignores the real cause of instability: US and Israeli aggression against Iran. The mission is framed as a Western military intervention in Gulf affairs, legitimized only by Oman's compliance. The real goal is to encircle Iran, not to ensure maritime security.
The Anglo-French mission is described as a necessary security measure to ensure freedom of navigation in a vital waterway. Oman is praised for its responsible cooperation. The focus is on the threat posed by Iranian attacks on merchant vessels, without delving into the broader geopolitical context.
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