
ईरान के सर्वोच्च नेता ने अमेरिका-इज़राइल के ख़िलाफ़ युद्ध अपराधों पर कानूनी कार्रवाई का आदेश दिया
मोजतबा ख़ामेनेई ने न्यायपालिका सप्ताह पर मिनाब स्कूल हमले समेत नागरिक मौतों को लेकर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय अदालतों में मुक़दमे चलाने का आह्वान किया, वहीं हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर ईरान का एकतरफ़ा नियंत्रण जारी रहा।
ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह मोजतबा हुसैनी ख़ामेनेई ने रविवार को न्यायपालिका को आदेश दिया कि वह 2025 और 2026 के अमेरिकी-इज़राइली सैन्य अभियानों के दौरान ईरानी नागरिकों की मौतों और बुनियादी ढाँचे पर हमलों को लेकर अमेरिकी और इज़राइली नेताओं के ख़िलाफ़ घरेलू और अंतरराष्ट्रीय अदालतों में कानूनी कार्रवाई शुरू करे। यह घोषणा ईरान में न्यायपालिका सप्ताह के अवसर पर की गई, जो 1981 में एक बम विस्फोट में शहीद हुए पूर्व प्रधान न्यायाधीश आयतुल्लाह मोहम्मद बेहिश्ती और उनके 72 साथियों की स्मृति में मनाया जाता है।
तेहरान के आधिकारिक बयानों के अनुसार, ख़ामेनेई ने विशेष रूप से 28 फरवरी 2026 को मिनाब शहर के शजारेह तैय्यबेह प्राथमिक विद्यालय पर हुए मिसाइल हमले का उल्लेख किया, जिसमें 120 से अधिक स्कूली बच्चों और 26 शिक्षिकाओं समेत कम से कम 156 नागरिक मारे गए थे। उन्होंने लामेर्द में हमलों, चिकित्सा केंद्रों को निशाना बनाने और नवजात शिशुओं से लेकर बुज़ुर्गों तक की मौतों को “सैकड़ों नहीं, बल्कि हज़ारों बड़े कानूनी मामलों” की फ़ाइलें बताया। ईरानी नेता ने इस संदर्भ में पूर्व सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह सैयद अली ख़ामेनेई की शहादत को भी सबसे ऊपर रखा, जो इन्हीं संघर्षों के दौरान मारे गए थे।
तेहरान के रुख़ के मुताबिक, अमेरिकी और इज़राइली नेताओं के सार्वजनिक बयान, जिनमें उन्होंने सैन्य कार्रवाइयों को स्वीकार किया या उन पर गर्व जताया, अपराध स्वीकारोक्ति के समान हैं और यह ईरानी राष्ट्र के उल्लंघित अधिकारों की बहाली का कानूनी आधार मज़बूत करते हैं। इसी सप्ताह ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने भी न्यायपालिका को जनता के अधिकारों का संरक्षक बताते हुए कहा कि निष्पक्ष सुनवाई और भ्रष्टाचार से लड़ाई ही शासन में जनता का भरोसा बहाल कर सकती है।
इस कानूनी पहल के समानांतर, फ़ारस की खाड़ी में सैन्य तनाव बना हुआ है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराक़ची ने इराक़ यात्रा के दौरान कहा कि अगले 30 दिनों तक हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य का प्रबंधन और निगरानी पूरी तरह ईरान के पास रहेगी, और किसी भी एकतरफ़ा हस्तक्षेप से तनाव बढ़ेगा। वहीं, अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने राष्ट्रपति ट्रंप के निर्देश पर ईरान के दक्षिणी तट पर निगरानी ठिकानों पर अतिरिक्त हवाई हमले किए जाने की पुष्टि की, जिसके जवाब में ईरान के इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने कुवैत और बहरीन में आठ अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों को नष्ट करने का दावा किया।
दक्षिण एशिया के लिए यह घटनाक्रम ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा से जुड़ा है, क्योंकि हॉर्मुज़ से होकर वैश्विक तेल का बड़ा हिस्सा गुज़रता है। ईरानी न्यायपालिका से अपेक्षा की जा रही है कि वह शहीद नेता की पिछले वर्ष की बैठक में दिए गए निर्देशों के तहत 2025 के युद्ध अपराधों की जाँच को अब 2026 के ताज़ा संघर्ष तक विस्तारित करेगी और दोषियों के ख़िलाफ़ सज़ा सुनिश्चित होने तक प्रक्रिया जारी रखेगी।
| ईरानी और संबद्ध प्रेस | +0.70 | aligned |
|---|---|---|
| अरब लेवांत-मगरिब प्रेस | +0.50 | aligned |
| भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रेस | −0.30 | critical |
Iran demands justice for US and Israeli war crimes, standing as a champion of trampled human rights.
It uses the technique of 'sovereign victimization': the narrative reverses the accusation, turning the Iranian regime into a legitimate accuser, while omitting the context of its own violations.
There is no mention of Iran's role in supporting groups accused of war crimes, nor its own human rights violations.
The resistance supports the demand to prosecute American and Israeli war criminals, seeing it as a step towards justice for the Arab world.
It employs the technique of 'hierarchy of threats': the accusation is placed in a framework of ongoing oppression, where the common enemy is identified and a collective moral condemnation is sought.
The complexity of regional alliances and the fact that some Arab countries have normalized relations with Israel are omitted.
India observes the Iranian demand with detachment, considering it a political maneuver not worthy of serious consideration, prioritizing regional stability.
It employs the technique of 'detached pragmatism': the news is framed as irrelevant to Indian interests, downplaying the importance of the demand through a neutral and skeptical tone.
The validity of the war crimes accusations is not discussed, nor the historical context of US and Israeli actions in the Middle East.
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