
24 साल बाद विश्व कप में तुर्की का सपना टूटा: दो मैच, शून्य गोल, और मोंटेला की हैरत
गोल्डन जनरेशन की तमाम उम्मीदों के बावजूद तुर्की बिना गोल किए ग्रुप चरण से बाहर; मोंटेला और खिलाड़ियों ने माफ़ी माँगी।
सांता क्लारा में 20 जून 2026 को तुर्की का 24 साल बाद विश्व कप में वापसी का सपना महज़ दो मैचों में ही बिखर गया। पैराग्वे के ख़िलाफ़ 0-1 की हार ने विन्सेन्ज़ो मोंटेला की टीम को ग्रुप डी से बाहर कर दिया। मैच के दूसरे ही मिनट में मातियास गालार्सा के 25 मीटर से किए गए ज़ोरदार शॉट ने तुर्की को चौंका दिया, और फिर आधे घंटे बाद पैराग्वे के एक खिलाड़ी को लाल कार्ड मिलने के बावजूद तुर्की 52 मिनट तक एक खिलाड़ी अधिक होने का फ़ायदा नहीं उठा सकी। यह लगातार दूसरी हार थी; इससे पहले ऑस्ट्रेलिया ने 2-0 से हराकर तुर्की की मुश्किलें बढ़ा दी थीं।
आँकड़े तुर्की के दबदबे की कहानी कहते हैं—79 प्रतिशत बॉल पज़ेशन और दोनों मैचों में कुल 65 शॉट, लेकिन यह दबदबा बेअसर रहा। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण के अनुसार, इन 65 प्रयासों से मात्र 3.5 अपेक्षित गोल (xG) बने, जो दर्शाता है कि ज़्यादातर शॉट कमज़ोर कोणों से और बिना स्पष्ट योजना के लिए गए। पैराग्वे के ख़िलाफ़ मार्ट मुल्दुर का हेडर क्रॉसबार और पोस्ट दोनों से टकराकर बाहर गया, और कई मौक़ों पर गोलकीपर ने बचाव किया। मोंटेला ने बाद में कहा, “65 शॉट और एक भी गोल नहीं, मैंने अपने 35 साल के करियर में ऐसा कभी नहीं देखा। क़िस्मत हमारे साथ नहीं थी।”
यह नाकामी तब आई जब तुर्की फ़ुटबॉल एक ‘सुनहरी पीढ़ी’ के साथ 2002 के बाद पहली बार विश्व कप में उतरा था। रियाल मैड्रिड के अरदा गूलर, इंटर मिलान के हाकान चलहानोग्लू और युवेंटस के केनान येल्दिज़ जैसे सितारों से क्वार्टर फ़ाइनल तक की उम्मीदें थीं। लेकिन तैयारी की कमियाँ उजागर हुईं: टीम देर से अमेरिका पहुँची, एरिज़ोना के 35-40 डिग्री तापमान में अभ्यास किया, और वैंकूवर तथा सैन फ़्रांसिस्को के बीच हज़ारों किलोमीटर की यात्रा की। साथ ही, फ़ेडरेशन अध्यक्ष इब्राहीम हाजियोसमानोग्लू के विवादित बयानों और खिलाड़ियों पर सोशल मीडिया आलोचना के दबाव से माहौल ख़राब हुआ; टीम के साथ कोई खेल मनोवैज्ञानिक भी नहीं था।
प्रतिक्रियाएँ तीखी थीं। तुर्की मीडिया ने इसे राष्ट्रीय आपदा बताया: हुर्रियत ने लिखा “कड़वी विदाई, शून्य गोल, शून्य अंक”, सोज़्जू ने टीम को “टूर्नामेंट की सबसे ख़राब टीम” कहा। टीवी विशेषज्ञ निहात कहवेची ने कहा कि यह एक “बुरा सपना” है, और अहमत चाकार ने मोंटेला को पहली फ़्लाइट से घर भेजने की सलाह दी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, इतालवी गज़ेटा ने इसे “प्रतिभा की बर्बादी” करार दिया, फ्रांसीसी लइकिप ने “क्रूर निराशा” बताया, और ब्रिटिश गार्जियन ने हैरानी जताई कि कैसे तुर्की इतने मौकों को गोल में नहीं बदल सका। पैराग्वे की मीडिया ने अपनी टीम की ऐतिहासिक बचाव क्षमता की तारीफ़ की।
अब तुर्की का सामना अमेरिका से होगा, जो महज़ औपचारिकता होगी क्योंकि उसका बाहर होना पहले ही तय है। हार के बाद अरदा गूलर ने कहा, “हम शर्मिंदा हैं, हम सब बड़े क्लबों में खेलते हैं और हमें बेहतर प्रदर्शन करना चाहिए था। मैं अपने देश से माफ़ी माँगता हूँ, और इस टूर्नामेंट को भुलाने के लिए सब कुछ करूँगा।” तुर्की फ़ुटबॉल अब एक अहम मोड़ पर खड़ा है, जहाँ संरचनात्मक बदलाव की माँग उठना तय है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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तुर्की, ग्रुप डी का प्रबल दावेदार, बिना गोल किए दो हार के साथ बाहर हो गया। कोच मोंटेला ने 65 शॉट के बावजूद गोल न कर पाने पर अफसोस जताया। यूरोपीय प्रेस इसे एक सुनहरी पीढ़ी की बर्बादी मानती है।
एक तुर्की विश्लेषक का कोच मोंटेला के खिलाफ लाइव प्रसारण में गुस्सैल विस्फोट वायरल हो गया, जो राष्ट्रीय निराशा का प्रतीक है। लैटिन अमेरिकी मीडिया ने सामरिक बाँझपन और बाहर होने के बाद भावनात्मक पतन पर प्रकाश डाला।
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