
जीन स्थानांतरण से नई प्रजातियों तक: जीव विज्ञान के चौंकाने वाले खुलासे
कॉकरोच के जीनोम में 40,485 जीवाणु डीएनए खंडों की खोज और दक्षिण अमेरिका व एशिया में नई प्रजातियों के मिलने से अनुकूलन और जैव विविधता की समझ बदल रही है।
सिडनी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 18 तिलचट्टा और दीमक प्रजातियों के जीनोम का विश्लेषण कर 40,485 जीवाणु डीएनए खंडों की पहचान की है, जो ब्लैटाबैक्टीरियम क्यूनोटी नामक सहजीवी जीवाणु से क्षैतिज जीन स्थानांतरण (एचजीटी) के जरिए इन कीटों के जीनोम में समाहित हुए। यह संख्या यूकेरियोट्स में अब तक ज्ञात 300 से कम के रिकॉर्ड को कई गुना पार कर जाती है। पीएनएएस में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, कुछ खंड कम से कम 2.87 करोड़ वर्षों से बने हुए हैं, जो संभावित कार्यात्मक भूमिका की ओर इशारा करता है। यह खोज दर्शाती है कि जटिल जीवों में एचजीटी पहले के अनुमान से कहीं अधिक व्यापक है और अनुकूलन व प्रजातीकरण को प्रभावित कर सकता है।
एक अन्य आनुवंशिक अनुकूलन की झलक जर्मनी और ब्राज़ील के वैज्ञानिकों ने स्लॉथ (आलसी) के जीनोम अध्ययन में पाई। बीएमसी बायोलॉजी में प्रकाशित शोध में दो-उँगली वाले स्लॉथ की तुलना दर्जनों स्तनधारियों से करने पर पता चला कि इसमें ट्रांसपोसॉन या 'जंपिंग जीन' की सक्रियता 3 करोड़ वर्षों से अधिक समय से जारी है, जो माइटोकॉन्ड्रिया और चयापचय से जुड़े जीनों से संबंधित हैं। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि ये गतिशील जीन स्लॉथ के धीमे माइटोकॉन्ड्रिया की क्षतिपूर्ति कर एक आनुवंशिक 'बैकअप प्रणाली' बनाते हैं, जिससे यह अत्यंत कम ऊर्जा वाली जीवनशैली जी पाता है। हालाँकि, इस परिकल्पना की पुष्टि के लिए और अध्ययन ज़रूरी है।
इस बीच, दक्षिण अमेरिका के सुदूर क्षेत्रों में नई प्रजातियों की खोज ने जैव विविधता के अधूरे दस्तावेज़ीकरण को रेखांकित किया। अर्जेंटीना के कोनिसेट और राष्ट्रीय उद्यान प्रशासन ने ट्रासलासिएरा राष्ट्रीय उद्यान में चाको सेरानो की राता विज़काचा (एप्नोक्टोमिस कोनिसेटोरम) नामक कृंतक की नई प्रजाति और वंश की सूचना दी। इसी देश के इस्ला दे लॉस एस्तादोस में लाखों वर्षों से अलग-थलग एक 'भूत मकड़ी' (यागानिया चुआनिसिन) का नया वंश मिला। रियो नेग्रो के ला बुइत्रेरा क्षेत्र में 10 करोड़ वर्ष पुराने स्थलीय मगरमच्छ (एंटुसुकस रियोनेग्रिनस) के जीवाश्म ने भी पेइरोसॉरिड समूह की उत्पत्ति पर नई रोशनी डाली। मलेशिया के बोर्नियो वर्षावनों में वैज्ञानिकों ने एक हाइपरपैरासाइट कवक (प्लूरोकॉर्डिसेप्स कॉर्नुसिनेमाटा) की पहचान की, जो 'ज़ोंबी चींटी' कवक पर ही पनपता है और सींग जैसी संरचना रखता है।
इन खोजों का अगला पड़ाव कार्यात्मक विश्लेषण और संरक्षण है। सिडनी की टीम अब यह जाँचेगी कि 40,485 जीवाणु खंडों में से कितने वास्तविक जैविक भूमिका निभाते हैं। स्लॉथ पर शोध मधुमेह, न्यूरोडीजनरेशन और ऊतक संरक्षण जैसी मानव स्वास्थ्य समस्याओं के लिए निम्न-ऊर्जा कोशिकीय मॉडल प्रदान कर सकता है। नई प्रजातियों की खोज पश्चिमी घाट और पूर्वोत्तर भारत जैसे जैव विविधता हॉटस्पॉट में अज्ञात जीवन की संभावना की याद दिलाती है, जहाँ गहन क्षेत्रीय सर्वेक्षणों की आवश्यकता है। हाइपरपैरासाइट कवक जैविक कीट नियंत्रण में संभावित उपयोग का संकेत देता है। सामूहिक रूप से, ये अध्ययन बताते हैं कि विकास के अरबों प्रयोग अब भी अनेक रहस्य समेटे हुए हैं।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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लंबे समय से रहस्यमयी कॉकरोचों की प्रतिरोधक क्षमता को क्षैतिज जीन स्थानांतरण द्वारा समझाया गया है: इन कीटों ने बैक्टीरिया ब्लैटाबैक्टीरियम क्यूनोटी के डीएनए को अपने जीनोम में शामिल कर लिया। ऑस्ट्रेलियाई अध्ययन लाखों वर्षों तक चली एक छिपी हुई विकासवादी रणनीति पर प्रकाश डालता है।
अर्जेंटीना के वैज्ञानिकों ने एक नई भूतिया मकड़ी की वंशावली, कॉनिसेट के सम्मान में नामित एक स्तनपायी, और 100 मिलियन वर्ष पुराना जीवाश्म मगरमच्छ खोज निकाला है। ये खोजें प्रेत प्रजातियों और छिपी हुई विकासवादी रणनीतियों को उजागर करती हैं, जो जैव विविधता ज्ञान में देश के योगदान को मजबूत करती हैं।
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