
पेनल्टी चूकने पर बरसी नफरत: जब सोशल मीडिया पर 'यूरोपीय' बन गए 'प्रवासी'
नीदरलैंड्स के तीन खिलाड़ियों पर नस्ली हमलों के बाद फीफा ने बताया कि 2026 विश्व कप के ग्रुप चरण में 89,000 आपत्तिजनक पोस्ट दर्ज की गईं, जो 2022 से 13 गुना अधिक हैं।
मोरक्को के खिलाफ पेनल्टी शूटआउट में गेंद पोस्ट से टकराकर बाहर गई और स्टेडियम में सन्नाटा पसर गया। लेकिन क्रिसेंसियो समरविले, जस्टिन क्लूवर्ट और क्विंटन टिम्बर के फोन पर कुछ ही मिनटों में एक अलग तरह का शोर शुरू हो गया—बंदरों के इमोजी, नस्ली गालियां और जहरीले संदेशों की बाढ़। तीनों ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट के कमेंट सेक्शन बंद कर दिए। यह दृश्य कोई अकेली घटना नहीं थी, बल्कि एक ऐसे पैटर्न की ताजा कड़ी थी जिसे फीफा की सोशल मीडिया प्रोटेक्शन सर्विस (एसएमपीएस) ने बुधवार को आंकड़ों के साथ दुनिया के सामने रखा।
फीफा के अनुसार, 2026 विश्व कप के ग्रुप चरण के दौरान 89,000 आपत्तिजनक पोस्ट की पहचान की गई—यह 2022 कतर विश्व कप की समान अवधि में मिले 6,700 पोस्ट से 13 गुना अधिक है। इनमें से 11 प्रतिशत टिप्पणियां नस्ली प्रकृति की थीं, जो चार साल पहले के मुकाबले तीन प्रतिशत अंकों की वृद्धि दर्शाती हैं। एसएमपीएस ने छह मिलियन से अधिक पोस्ट और कमेंट का विश्लेषण किया, जो 2022 की तुलना में 33 प्रतिशत अधिक है। लगभग 1,000 खातों की गहन जांच शुरू की गई और 181,000 घृणास्पद टिप्पणियों को छिपा दिया गया। फीफा ने यह भी बताया कि 100 से अधिक मामले ऐसे हैं जो कानूनी कार्रवाई की सीमा पार कर चुके हैं।
यह घटनाक्रम यूरोपीय फुटबॉल के एक गहरे सांस्कृतिक तनाव को उजागर करता है। ब्राजील के समाचार पोर्टल जी1 ने रियो डी जनेरियो के संघीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एड्रियानो फ्रेइक्सो के हवाले से इस प्रवृत्ति को 'यूरोपीय जब जीतता है, प्रवासी जब हारता है' का नाम दिया। उनका विश्लेषण है कि जब टीम हारती है, तो अश्वेत और प्रवासी मूल के खिलाड़ी 'बलि का बकरा' बन जाते हैं, क्योंकि वे रूढ़िवादी यूरोपीय छवि से भिन्न दिखते हैं। यह पैटर्न 2021 यूरो फाइनल में इंग्लैंड के साका, रैशफोर्ड और सांचो से लेकर फ्रांस के एम्बाप्पे तक दिखा। इस विश्व कप में फ्रांस की टीम के 75 प्रतिशत से अधिक खिलाड़ी प्रवासी पृष्ठभूमि से हैं, जबकि नीदरलैंड्स की आधी टीम प्रवासी मूल के खिलाड़ियों से बनी है।
इस माहौल में पूर्व डच मिडफील्डर क्लेरेंस सीडॉर्फ का वीडियो संदेश एक व्यक्तिगत गवाही बनकर उभरा। उन्होंने बताया कि कैसे अपने खेल के दिनों में पेनल्टी चूकने पर उन्होंने भी अस्वीकृति और पूर्वाग्रह को महसूस किया, भले ही तब सोशल मीडिया नहीं था। सीडॉर्फ ने कहा, 'इसका मेरे करियर पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा।' उन्होंने चुप्पी साधने वालों को समस्या का हिस्सा बताते हुए कड़ी सजा की मांग की। उनका यह बयान सिर्फ तीन खिलाड़ियों के बचाव में नहीं था, बल्कि एक ऐसे खेल संस्कृति पर सवाल था जो जीत पर तो तालियां बजाती है, लेकिन हार पर पहचान छीन लेती है।
फीफा की एसएमपीएस ने 2022 में अपनी स्थापना के बाद से अब तक 3 करोड़ से अधिक आपत्तिजनक पोस्ट हटाए हैं। ग्रुप चरण के दौरान 2,028,214 कमेंट मॉडरेशन द्वारा छिपाए गए, जो 2022 से 400 प्रतिशत अधिक है। फिर भी, नीदरलैंड्स के तीनों खिलाड़ियों के कमेंट सेक्शन का खालीपन एक स्थायी छवि की तरह है—एक ऐसी चुप्पी जो बताती है कि डिजिटल मैदान पर खेल अभी खत्म नहीं हुआ है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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पेनल्टी चूकने के बाद डच खिलाड़ियों पर हुए नस्लवादी हमले एक गहरे पाखंड को उजागर करते हैं: जीत पर वे यूरोपीय कहलाते हैं, लेकिन हार पर प्रवासी बना दिए जाते हैं। फीफा द्वारा दर्ज ऑनलाइन दुर्व्यवहार में भारी वृद्धि के बीच इस घटना ने जवाबदेही और फुटबॉल में कायम नस्लवाद से निपटने की मांग को जन्म दिया है।
फीफा की सोशल मीडिया सुरक्षा सेवा ने ग्रुप चरण के दौरान 89,000 अपमानजनक पोस्ट दर्ज कीं, जो पिछले टूर्नामेंट की तुलना में तेरह गुना वृद्धि है। ये आंकड़े खिलाड़ियों और टीमों को निशाना बनाने वाले ऑनलाइन उत्पीड़न में तीव्र वृद्धि को रेखांकित करते हैं।
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