
मोटरसाइकिल की पिछली सीट से सीखा पितृत्व: बदलती दुनिया की अनकही कहानियाँ
दुनिया भर के पिताओं की चुप्पी, त्याग और अब धीमी आवाज़—एक बांग्लादेशी बेटे की याद से लेकर मैक्सिकन पिता की भावनात्मक तलाश तक, पितृत्व के नए रंग उभर रहे हैं।
करीब तीन दशक पहले, बांग्लादेश के राजशाही विश्वविद्यालय के हरे-भरे परिसर में, एक बच्चा अपने पिता की मोटरसाइकिल की पिछली सीट से दुनिया देखता था। पिता, जो कभी खुद इसी विश्वविद्यालय के प्रबंधन विभाग के छात्र रहे थे, अपने बेटे को वहाँ की हर गली, हर इमारत दिखाते: यह माँ का विभाग, यह शहीद मीनार, यहाँ पेरिस रोड पर साथियों के साथ चाय पीते थे। उन बातचीत में एक सपना पनप रहा था—एक दिन यह बच्चा भी इसी कैंपस का छात्र बनेगा। आज वह बेटा सचमुच वहाँ भूविज्ञान का छात्र है, और उसी छात्रावास में रहता है जहाँ कभी उसके पिता रहा करते थे। गलियारों में चलते हुए उसे लगता है, मानों दशकों पहले उसके पिता भी इन्हीं पत्थरों पर अपने दोस्तों के साथ हँसते-बतियाते गुज़रे होंगे।
यह कोई अकेली कहानी नहीं। पितृत्व का यह धागा अर्जेंटीना से लेकर इंडोनेशिया तक फैला है—एक ऐसा प्यार जो लंबे समय तक चुप्पी में लिपटा रहा, और अब कहीं-कहीं शब्द पा रहा है। ला नासियोन अख़बार के अनुसार, बुएनोस आयर्स में पिता अब बच्चों को रोज़ ‘आई लव यू’ कहते हैं, अपनी थकान और भावनाएँ दिखाने से नहीं हिचकते। अमेरिका में, फॉक्स न्यूज़ एक राष्ट्रीय उत्सव के संदर्भ में इस बात को रेखांकित करता है कि मज़बूत राष्ट्र मज़बूत पिताओं पर टिके हैं। लेकिन इसी धरातल पर एक खामोश संकट भी है: इंडोनेशिया में चार में से एक बच्चा ऐसे पिता के साथ बड़ा होता है जो भावनात्मक रूप से अनुपस्थित है (एएनटीएआरए)। मेक्सिको के आँकड़े बताते हैं कि 63.7% पिता परिवारिक कलह के कारण भावनात्मक सहारा ढूँढने आते हैं (इन्फोबाए)।
इन आँकड़ों के पीछे उँगलियाँ छूट जाने की टीस है। मलेशिया में एक लेखक याद करता है (फ्री मलेशिया टुडे) कि पिता के निधन से एक सप्ताह पहले वह घर लौटा था—बिना किसी बड़ी बात के, बस रोज़मर्रा की खामोशी। पिता चले गए, और बेटे को कभी मौका नहीं मिला अपनी पहली कमाई के सौ-दो सौ रुपए भी उन्हें देने का। बांग्लादेश की एक बेटी लिखती है (प्रथम आलो) कि पिता ने उसकी कोई इच्छा अधूरी नहीं छोड़ी, अपना गंजा गंजी भी नहीं बदला, बस यही कहा कि ‘चलता है’। यह त्याग की वह भाषा है जिसे बिली ग्राहम (मिंट) ‘अनसुना, अप्रशंसित, अनदेखा’ कहते हैं। लेकिन अब कई पिता इस चुप्पी को तोड़ रहे हैं। अर्जेंटीना के मनोवैज्ञानिक मातियास मुनोज़ कहते हैं, ‘हम खामोश परिवारों में पले-बढ़े, लेकिन अब कोशिश है कि बच्चों से भावनात्मक बातचीत हो।’
यह बदलाव महज़ सांस्कृतिक फ़ैशन नहीं—अब न्यूरोसाइंस भी गवाह है। जर्मनी के एक अध्ययन (जवा पोस के हवाले से) में पाया गया कि पिता बनने पर पुरुषों के दिमाग़ की संरचना बदल जाती है: शुरुआती हफ़्तों में कुछ हिस्से सिकुड़ते हैं, फिर नए संपर्क बनते हैं ताकि देखभाल और ध्यान की क्षमता बढ़े। लेकिन यह राह आसान नहीं। इटली की एक रिपोर्ट (इल पोस्ट) बताती है कि नए पिता में भी प्रसवोत्तर अवसाद उतना ही वास्तविक है जितना माँ में, बस पहचान कम होती है। मेक्सिको का ‘भावनात्मक अनपढ़ता’ शब्द इस हाल को बयान करता है—पुरुषों को कभी सिखाया ही नहीं गया कि दुख या डर को कैसे ज़ाहिर करें। इंडोनेशिया के मनोवैज्ञानिक कहते हैं (जवा पोस) कि बिना मज़बूत पुरुष आदर्श के बड़े हुए पुरुष अक्सर हद से ज़्यादा आत्मनिर्भर हो जाते हैं और मदद माँगने को कमज़ोरी मानते हैं।
इन सबके बीच, एक और बांग्लादेशी बेटी शाम को आसमान के शुक्रतारे को देख अपने गुज़रे हुए पिता से बातें करती है: ‘आपने जो सिखाया, वह आज भी काम आता है।’ (प्रथम आलो) यह शायद पितृत्व का सबसे सच्चा चेहरा है—ना दिखावे की मोहताज, ना किसी ख़ास दिन की। क्लैरेंस केलैंड (मिंट) का वाक्य याद आता है: ‘मेरे पिता ने मुझे जीना नहीं सिखाया; वह जिए, और मुझे देखने दिया।’ यही वह अनकही दौलत है जो एक पीढ़ी से दूसरी तक सफ़र करती है, चाहे पीछे की सीट पर हो या किसी मेडिकल कॉलेज के दाख़िले के फ़ॉर्म पर।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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The Atlantic perspective highlights the tension between celebrating fatherhood and the reality of estranged relationships, with some commentary criticizing the politicization of the holiday. Articles blend personal stories of reconnection with political attacks on those who supposedly undermine traditional father roles. Overall, the coverage is skeptical of easy narratives about Father's Day.
The Levant-Maghreb coverage focuses on the sociological transformation of fatherhood, portraying the modern father as emotionally engaged and present. The holiday is seen as an opportunity to reflect on shifting family dynamics rather than a simple celebration. The tone is analytical and forward-looking, emphasizing long-term cultural change.
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