
अमेरिकी न्यायाधीश ने ट्रंप के चुनाव कार्यकारी आदेश पर रोक लगाई, राज्यों के अधिकार बरकरार
संघीय अदालत ने मेल-इन मतदान को सीमित करने और राष्ट्रीय मतदाता सूची बनाने के प्रावधानों को असंवैधानिक ठहराते हुए कार्यान्वयन पर रोक लगा दी।
अमेरिका के मैसाचुसेट्स जिला न्यायालय की न्यायाधीश इंदिरा तलवानी ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मार्च 2025 के कार्यकारी आदेश के केंद्रीय प्रावधानों पर रोक लगा दी है, जिसके तहत एक संघीय मतदाता पात्रता सूची बनाने और डाक सेवा (यूएसपीएस) को केवल उस सूची में शामिल लोगों को मेल-इन मतपत्र भेजने का निर्देश दिया गया था। न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा कि अमेरिकी संविधान चुनावों के संचालन का अधिकार राज्यों और कांग्रेस को देता है, राष्ट्रपति को नहीं। इस निर्णय के तत्काल प्रभाव से प्रशासन नवंबर 2026 के मध्यावधि चुनावों से पहले इन प्रावधानों को लागू नहीं कर सकेगा।
डेमोक्रेटिक नेतृत्व वाले 23 राज्यों और कोलंबिया जिले ने इस आदेश को चुनौती देते हुए तर्क दिया था कि राष्ट्रपति कार्यकारी आदेश के माध्यम से चुनावी नियम नहीं बदल सकते और यह राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण है। दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन का पक्ष है कि यह आदेश चुनावी धोखाधड़ी रोकने और मतदाता विश्वास बहाल करने के लिए आवश्यक है। व्हाइट हाउस की प्रवक्ता ने निर्णय पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि राष्ट्रपति चुनावों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं और प्रशासन को अपील में जीत का भरोसा है।
इस निर्णय का सीधा असर यूएसपीएस के प्रस्तावित नियम पर पड़ा है, जिसके तहत डाक सेवा ने कहा था कि यदि राज्य संघीय सरकार को अनुपस्थित मतदाताओं की सूची नहीं सौंपते तो वह मतपत्र वितरित नहीं करेगी। पोस्टमास्टर जनरल डेविड स्टाइनर ने सीनेट की सुनवाई में इस बात की पुष्टि की थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि न तो कांग्रेस ने यूएसपीएस को मेल-इन मतदान नियंत्रित करने का अधिकार दिया है और न ही राष्ट्रपति को राज्यों के लिए मतदाता सूची तैयार करने का संवैधानिक अधिकार है। यह लगातार तीसरा अवसर है जब एक सप्ताह के भीतर संघीय अदालतों ने ट्रंप प्रशासन के चुनाव-संबंधी कदमों पर रोक लगाई है—इससे पहले नागरिकता प्रमाण की अनिवार्यता और मतदाता स्क्रीनिंग डेटाबेस पर भी रोक लग चुकी है।
अमेरिकी संवैधानिक ढांचे में चुनाव प्रबंधन की जिम्मेदारी मुख्यतः राज्यों के पास है, और संघीय हस्तक्षेप को लेकर ऐतिहासिक रूप से संवेदनशीलता रही है। ट्रंप 2020 के चुनाव में हार के बाद से लगातार मेल-इन मतदान को धोखाधड़ी का स्रोत बताते रहे हैं, हालांकि कई जांचों में व्यापक धोखाधड़ी के प्रमाण नहीं मिले। भारत जैसे संघीय लोकतंत्रों के लिए यह प्रकरण राज्य बनाम केंद्र के अधिकार क्षेत्र के संतुलन की याद दिलाता है, जहां चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और राज्य सरकारों की भूमिका संवैधानिक रूप से परिभाषित है। फिलहाल यह मामला अपीलीय अदालतों और संभवतः सर्वोच्च न्यायालय तक जा सकता है, जबकि यूएसपीएस के प्रस्तावित नियम पर सार्वजनिक टिप्पणी की अंतिम तिथि 2 जुलाई निर्धारित है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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एक संघीय न्यायाधीश ने ट्रंप प्रशासन की मेल-इन वोटिंग नियमों को सख्त करने की कोशिश को बड़ा झटका देते हुए उस कार्यकारी आदेश को रोक दिया, जिसके तहत डाक सेवा उन राज्यों में मतपत्र नहीं पहुंचा सकती थी जो मतदाता सूची साझा करने से इनकार करते। इस फैसले को लोकतांत्रिक भागीदारी की अहम रक्षा के रूप में सराहा जा रहा है, जबकि प्रस्तावित नीति की असंवैधानिक चाल के रूप में निंदा की गई। नवंबर के चुनाव नजदीक होने के साथ, यह निर्णय उस खतरे को टालता है जिसे आलोचक चुनावी प्रक्रिया की अखंडता के लिए सीधा खतरा बता रहे थे।
बोस्टन के एक संघीय न्यायाधीश ने राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा हस्ताक्षरित उस कार्यकारी आदेश के मुख्य भागों को निलंबित कर दिया, जो मेल-इन वोटिंग पर नए प्रतिबंध लगाने का प्रयास करता था। न्यायाधीश ने तर्क दिया कि राष्ट्रपति एकतरफा राष्ट्रीय चुनाव नियम नहीं बना सकते, क्योंकि यह अधिकार कांग्रेस और राज्यों के पास है। यह फैसला नागरिकता सत्यापन के लिए संघीय सूची के निर्माण और अन्य उपायों पर अस्थायी रोक लगाता है, जबकि कानूनी लड़ाई जारी है।
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