
अमेरिका ने ICC को 'ईंट-ईंट तोड़ने' का अभियान छेड़ा, सहयोगी देशों पर दबाव
विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय को अमेरिकी संप्रभुता के लिए खतरा बताते हुए कूटनीतिक, वित्तीय और कानूनी कार्रवाई की घोषणा की।
अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने सोमवार को अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) को व्यवस्थित रूप से निष्क्रिय करने के लिए एक व्यापक कूटनीतिक अभियान की शुरुआत की। विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने एक वीडियो संदेश और वॉल स्ट्रीट जर्नल में प्रकाशित लेख में कहा कि आईसीसी अमेरिकी सैनिकों और अधिकारियों पर मुकदमा चलाने का अधिकार जताकर ‘अमेरिकी संप्रभुता के लिए असहनीय खतरा’ पैदा कर रही है। इस अभियान के तहत आईसीसी के कर्मचारियों के वीजा रद्द करने, यात्रा प्रतिबंध लगाने, प्रतिबंधों का विस्तार करने और सहयोगी देशों पर अदालत से हटने का दबाव बनाने जैसे कदम शामिल हैं। रुबियो ने चेतावनी दी कि यदि आवश्यक हुआ तो अमेरिका इस संस्था को ‘ईंट-ईंट तोड़कर’ ध्वस्त कर देगा।
वाशिंगटन के अनुसार, आईसीसी ने रोम संविधि की सीमाओं को पार करते हुए स्वयं को एक अप्राप्य वैश्विक मध्यस्थ में बदल लिया है, जो वामपंथी गैर-सरकारी संगठनों, अहंकारी वैश्विकवादियों और अमेरिका विरोधी तीसरी दुनिया की सरकारों के नेटवर्क द्वारा संचालित है। अमेरिकी पक्ष ने अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों के विरुद्ध 2020 में शुरू हुई जांच और इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट को इस अभियान का प्रमुख कारण बताया। दूसरी ओर, आईसीसी और उसके समर्थक 123 सदस्य देशों का तर्क है कि अदालत केवल तभी हस्तक्षेप करती है जब कोई राष्ट्र स्वयं गंभीर अपराधों की जांच करने में असमर्थ या अनिच्छुक हो, और सदस्य देशों की धरती पर घटित अपराधों पर उसका क्षेत्राधिकार अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप है। तीन प्रतिबंधित आईसीसी न्यायाधीशों ने जून में अमेरिकी अदालत में याचिका दायर कर इन कदमों को अवैध और न्यायेतर दबाव बताया है।
इस अभियान के ठोस प्रभाव कई स्तरों पर दिख सकते हैं। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि वे देश जो अमेरिकी सैन्य उपस्थिति की मेजबानी करते हैं या अमेरिकी सुरक्षा सहायता पर निर्भर हैं, उनसे आईसीसी के अधिकार को अस्वीकार करने की अपेक्षा की जाएगी; इनकार करने पर उनकी सहायता की समीक्षा हो सकती है। दक्षिण एशिया के संदर्भ में, अफगानिस्तान आईसीसी का सदस्य है और वहां अमेरिकी बलों की जांच पहले ही विवाद का कारण बन चुकी है। भारत, जो अमेरिका और रूस की तरह आईसीसी का सदस्य नहीं है, पर अप्रत्यक्ष दबाव पड़ सकता है क्योंकि वाशिंगटन गैर-सदस्य देशों को भी अपने राजनयिक नेटवर्क के जरिये इसी प्रकार के कदम उठाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।
अमेरिका ने कभी भी रोम संविधि का अनुमोदन नहीं किया और पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से लेकर अब तक सभी प्रशासन आईसीसी के अधिकार क्षेत्र को खारिज करते रहे हैं। हालांकि, ट्रंप प्रशासन का वर्तमान अभियान पैमाने और भाषा में अभूतपूर्व है। 2002 में स्थापित आईसीसी अब तक 11 दोषसिद्धियां दे चुकी है और मुख्य रूप से अफ्रीकी मामलों में सक्रिय रही है, लेकिन हाल के वर्षों में इसने अफगानिस्तान, फिलिस्तीन और यूक्रेन जैसे संघर्ष क्षेत्रों में जांच शुरू की है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि इस मुहिम में ‘कोई भी कूटनीतिक विकल्प सीमा से बाहर नहीं’ होगा। आगामी कदमों में रुबियो और उप-विदेश मंत्री की विदेशी सरकारों से सीधी बातचीत, वीजा प्रतिबंधों का विस्तार और आईसीसी से जुड़े संगठनों पर नए प्रतिबंध शामिल हैं। न्यूयॉर्क में न्यायाधीशों का मुकदमा लंबित है और अमेरिकी कांग्रेस में आईसीसी पर और कड़े प्रतिबंध लगाने वाले विधेयकों पर चर्चा जारी है।
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | −0.20 | neutral |
|---|---|---|
| ईरानी और संबद्ध प्रेस | −0.80 | critical |
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | −0.60 | critical |
| चीनी प्रेस | −0.30 | critical |
The Atlantic press acknowledges the legitimacy of American concerns over sovereignty, but does not hide that the ICC has long been opposed by Washington.
Factual reporting mixed with editorial cues like 'bête noire' suggests that US hostility toward the ICC is long-standing, framing the campaign as part of a pattern.
Voices supporting the ICC and the context of the court's investigations into US war crimes in Afghanistan are absent.
Iran denounces the US campaign as an act of aggression against international justice, siding with the ICC as a victim of US bullying.
The language of threat and war frames the US as a hostile power attacking international law, mobilizing sympathy for the ICC and opposition to US hegemony.
Justifications for US actions, such as the ICC's investigations of US personnel or the sovereignty argument, are omitted.
Europe denounces the US escalation against the ICC, defending international law and warning of the consequences of a systematic attack on the court.
Direct quotes of Rubio's war language highlight the aggressive stance, and US actions are framed as a threat to the rule of law, positioning Europe as a defender of international institutions.
The US perspective on sovereignty and the ICC's investigations of US officials, as well as the fact that the US has not ratified the Rome Statute, are omitted.
China observes the US campaign with detachment, noting the accusation of threat to sovereignty, but implicitly criticizes Washington's unilateralism.
The neutral reporting style highlights the US's own language of 'intolerable threat', allowing readers to infer US aggression without direct editorializing.
Discussions of the ICC's legitimacy or the US's historical opposition, as well as the perspective of ICC supporters, are absent.
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