
यूरोप से अमेरिका तक प्रचंड गर्मी, सार्डिनिया में 45 डिग्री; उत्तर भारत में भी तापमान बढ़ने की आशंका
उत्तरी गोलार्ध के कई देश भीषण ताप लहरों की चपेट में हैं, जिससे सैकड़ों मौतें और हजारों अस्पताल में भर्ती हुए हैं, जबकि वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन को मुख्य कारण बता रहे हैं।
उत्तरी गोलार्ध के बड़े हिस्से में इस सप्ताह भीषण गर्मी का प्रकोप जारी है। इटली के सार्डिनिया द्वीप पर तापमान 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जबकि अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में आपातकाल घोषित कर दिया गया। स्वीडन से लेकर मोरक्को तक मौसम विभागों ने चेतावनी जारी की है।
इंग्लैंड और वेल्स में मई-जून की गर्मी से 2,700 से अधिक लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, जिनमें से लगभग 1,100 मौतों के लिए जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहराया गया है। जापान में एक सप्ताह में 4,500 से अधिक लोग हीटस्ट्रोक के कारण अस्पताल में भर्ती हुए। इटली के एमिलिया-रोमाग्ना क्षेत्र में भीषण बारिश और तूफान से एक व्यक्ति की मौत हो गई।
हालांकि, गर्मी से होने वाली मौतों के आंकड़ों पर विशेषज्ञों में मतभेद है। यूरोपीय निगरानी नेटवर्क यूरोमोमो के अनुसार, जून के अंतिम सप्ताह में पूरे यूरोप में 10,000 से अधिक अतिरिक्त मौतें दर्ज की गईं, लेकिन इनमें से कितनी सीधे गर्मी से जुड़ी हैं, यह स्पष्ट नहीं है। वहीं, ईरानी विशेषज्ञों का कहना है कि यूरोप में गर्मी अधिक घातक इसलिए है क्योंकि वहां की इमारतें ठंडे मौसम के लिए बनी हैं और एयर कंडीशनिंग का प्रचलन कम है।
भारत में भी मौसम विभाग ने आने वाले दिनों में उत्तर और मध्य भागों में तापमान बढ़ने की संभावना जताई है, हालांकि अभी कोई आपात चेतावनी जारी नहीं की गई है। दक्षिण एशिया में इस वर्ष मानसून की अनियमितता के कारण कृषि और जल आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जीवाश्म ईंधन के उपयोग से उत्पन्न जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसी ताप लहरें अधिक तीव्र और लगातार हो रही हैं।
फिलहाल, प्रभावित देशों में आपातकालीन उपाय लागू हैं। इटली और अमेरिका में शीतलन केंद्र खोले गए हैं, जबकि स्वीडन और मोरक्को में जंगल की आग का खतरा बढ़ गया है। मौसम एजेंसियों का कहना है कि सप्ताहांत तक कुछ क्षेत्रों में राहत मिल सकती है, लेकिन स्थिति पर नजर रखी जा रही है।
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | −0.10 | neutral |
|---|---|---|
| ईरानी और संबद्ध प्रेस | −0.30 | critical |
| रूसी और सीआईएस प्रेस | 0.00 | neutral |
Europe faces the climate crisis with data and alerts, but without losing composure: the priority is to inform and protect citizens.
Official bulletins and reports of extreme events alternate to create a picture of normalcy within the emergency, making the crisis manageable through transparency.
The role of European energy policies in worsening global warming is not discussed, nor are the data compared with other world regions.
Iran watches Europe succumb to heat and draws a lesson: preparedness matters more than absolute temperature.
European mortality rates are compared with Iranian ones to establish a hierarchy of vulnerability, attributing the difference to cultural and infrastructural factors.
It does not mention that Iran has recorded thousands of heat deaths in recent years, nor does it cite victims from neighboring Arab countries.
Russia looks elsewhere: heat kills in Japan, not in Europe.
A single event in Japan is selected to shift attention away from the European continent, implicitly downplaying the severity of the main story.
No mention is made of the 10,000 deaths in Europe, nor of the heatwaves in Italy or elsewhere.
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