
टीकाकरण अभियान में सुधार के बावजूद 1.35 करोड़ बच्चे एक भी खुराक से वंचित, संघर्ष और वित्तीय कटौती बनी बाधा
वैश्विक टीकाकरण दरों में मामूली वृद्धि के बीच संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि मौजूदा रफ्तार 2030 के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अपर्याप्त है और सहायता राशि में कटौती से स्थिति और बिगड़ सकती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और यूनिसेफ के ताजा अनुमानों के अनुसार, 2025 में वैश्विक स्तर पर लगभग 1.35 करोड़ शिशुओं को नियमित टीकों की एक भी खुराक नहीं मिली। यह आँकड़ा 2024 के 1.42 करोड़ से कम है, लेकिन महामारी-पूर्व स्तर से अब भी अधिक है और 2030 तक असंरक्षित बच्चों की संख्या आधी करने के वैश्विक लक्ष्य के लिए ज़रूरी मील के पत्थर से लगभग 40 लाख ऊपर बना हुआ है। डिप्थीरिया, टिटनेस और काली खाँसी (डीटीपी) की पहली खुराह पाने वाले शिशुओं का अनुपात 90 प्रतिशत तक पहुँच गया, जो 2024 से एक अंक की बढ़त है, लेकिन 2019 के स्तर से अभी भी एक प्रतिशत नीचे है।
इस ठहराव के पीछे कई परस्पर जुड़े कारक हैं। आधे से अधिक 'ज़ीरो-डोज़' बच्चे उप-सहारा अफ़्रीका में रहते हैं, जहाँ नाइजीरिया, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और अंगोला जैसे देशों में जन्मदर ऊँची और स्वास्थ्य प्रणालियाँ कमज़ोर हैं। सीरिया, यमन, सूडान और फ़लस्तीन जैसे संघर्षग्रस्त इलाकों में रहने वाले बच्चों तक टीकों की पहुँच सबसे सीमित है, जबकि इन देशों में वैश्विक जन्मों का केवल एक-तिहाई हिस्सा होता है। साथ ही, कुछ मध्यम और उच्च-आय वाले देशों में राजनीतिक प्रतिबद्धता में कमी और टीकों को लेकर गलत सूचनाओं के प्रसार के कारण कवरेज दरें गिर रही हैं। यूरोपीय क्षेत्र में 5.66 लाख से अधिक बच्चे पूरी तरह असंरक्षित हैं, जिनमें से आधे कज़ाकिस्तान, तुर्की, ब्रिटेन और अज़रबैजान में केंद्रित हैं।
रिपोर्ट में एक चिंताजनक प्रवृत्ति टीकाकरण शुरू करने के बाद बीच में ही छोड़ देने वाले बच्चों की बढ़ती संख्या है। डीटीपी की पहली और तीसरी खुराक के बीच छोड़ने की दर 2024 के 4 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 12 प्रतिशत हो गई। लगभग 73 लाख शिशुओं ने डीटीपी की पहली खुराक तो ली, लेकिन खसरे का पहला टीका नहीं लगवाया। इसका सीधा असर खसरे के प्रकोप के रूप में सामने आया: 2025 में 57 देशों ने बड़े या विघटनकारी खसरे के प्रकोप की सूचना दी, जबकि वैश्विक स्तर पर खसरे की पहली खुराक का कवरेज 84 प्रतिशत और दूसरी खुराक का मात्र 77 प्रतिशत रहा, जो सामूहिक प्रतिरक्षा के लिए ज़रूरी 95 प्रतिशत से काफ़ी कम है।
सकारात्मक पक्ष यह है कि गावी गठबंधन द्वारा समर्थित 57 निम्न-आय वाले देशों में टीकाकरण कवरेज रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया और सूडान जैसे संघर्षग्रस्त देश ने डीटीपी कवरेज में 35 प्रतिशत अंकों की असाधारण वृद्धि दर्ज की। ब्राज़ील ने भी 'ज़ीरो-डोज़' बच्चों की संख्या में 2.04 लाख की कमी करते हुए उल्लेखनीय सुधार किया। हालाँकि, ये उपलब्धियाँ वित्तीय अनिश्चितता के साये में हैं। अमेरिकी सहायता में भारी कटौती का असर 2025 के आँकड़ों में अभी पूरी तरह नहीं दिखा है, क्योंकि अधिकांश कार्यक्रमों को वर्ष की शुरुआत में ही धनराशि मिल चुकी थी। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, 2026 के कार्यक्रमों पर इस कटौती का गंभीर प्रभाव पड़ने की आशंका है, और निगरानी प्रणालियाँ पहले ही कमज़ोर पड़ चुकी हैं—2025 में मात्र 18 राष्ट्रीय सर्वेक्षण ही प्रस्तुत किए जा सके, जो एक वर्ष पहले 50 थे। अगला महत्वपूर्ण पड़ाव 2026 के आँकड़े होंगे, जो बताएँगे कि वित्तीय संकुचन के बीच टीकाकरण अभियान कितना लचीलापन दिखा पाते हैं।
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | −0.40 | critical |
|---|---|---|
| उप-सहारा अफ़्रीकी प्रेस | −0.60 | critical |
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | 0.00 | neutral |
Latin America mobilizes to recover lost vaccinations, with governments and health authorities calling on families to complete the cycles.
The mechanism localizes the global problem into specific national contexts, turning the alarm into a call for immediate and concrete action, reinforcing the credibility of local institutions.
The global report shows that dropout increased worldwide, but Latin American coverage is among the lowest; the frame omits comparison with improving regions like Asia.
Sub-Saharan Africa denounces the failure of the global immunization system, pointing to inequalities and structural barriers that leave children behind.
The mechanism amplifies the scale of the problem through dramatic numbers and crisis language, creating a moral urgency that demands international action.
The frame does not mention progress in some African countries thanks to new vaccines, such as the malaria vaccine, which could mitigate the negative picture.
The Atlantic world tells the story of a mother overcoming obstacles to vaccinate her child, celebrating the progress of the malaria vaccine but warning about adherence difficulties.
The mechanism uses a personal story to humanize the problem, making the challenge of completing the vaccination cycle tangible, without alarmism but with realism.
The frame omits the global 12% dropout rate for DTP, focusing only on the malaria vaccine, which may obscure the broader vaccination crisis.
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