
हिप्पोकैम्पस की वृद्धि से लेकर मृत्यु जोखिम में कमी तक: व्यायाम के नए वैज्ञानिक प्रमाण
एरोबिक और शक्ति प्रशिक्षण मस्तिष्क की आयु पीछे लौटा सकते हैं और दीर्घायु बढ़ा सकते हैं, और इसके लिए घंटों जिम में बिताने की ज़रूरत नहीं है।
एक यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षण में 120 वृद्ध वयस्कों ने एक वर्ष तक सप्ताह में तीन बार मध्यम एरोबिक व्यायाम किया, जिसके बाद उनके हिप्पोकैम्पस का आयतन लगभग 2% बढ़ गया—यह आयु-संबंधी सिकुड़न के एक से दो वर्ष की भरपाई के बराबर है। PNAS में प्रकाशित इस अध्ययन में स्थानिक स्मृति में सुधार और मस्तिष्क-व्युत्पन्न न्यूरोट्रॉफिक कारक (BDNF) के स्तर में वृद्धि भी दर्ज की गई, जो न्यूरॉन अस्तित्व और नए तंत्रिका संयोजनों को बढ़ावा देता है। इसके विपरीत, केवल स्ट्रेचिंग करने वाले समूह में हिप्पोकैम्पस का आयतन घटता रहा।
यह प्रभाव केवल मस्तिष्क तक सीमित नहीं है। अमेरिका में लगभग 1.5 लाख स्वास्थ्य पेशेवरों पर 30 वर्षों तक चले अवलोकन अध्ययन के अनुसार, प्रति सप्ताह 90 से 120 मिनट का शक्ति प्रशिक्षण किसी भी कारण से मृत्यु के जोखिम में 13% की कमी से जुड़ा था—हृदय रोगों से मृत्यु में 19% और तंत्रिका-संबंधी स्थितियों, मुख्यतः डिमेंशिया, में 27% की गिरावट। नॉर्वेजियन स्कूल ऑफ स्पोर्ट साइंसेज के 44,370 लोगों पर किए गए विश्लेषण ने दिखाया कि रोज़ाना 30-40 मिनट की मध्यम शारीरिक गतिविधि 9-10 घंटे बैठे रहने से होने वाले नुकसान की भरपाई कर सकती है। जब एरोबिक और शक्ति प्रशिक्षण को संयोजित किया गया, तो मृत्यु जोखिम में कमी 45% तक पहुँच गई।
मस्तिष्क की ऊर्जा पर एक अलग लेकिन जुड़ा हुआ आयाम सामने आता है। मनोवैज्ञानिक रॉय बॉमिस्टर के ‘निर्णय थकान’ मॉडल के अनुसार, एक वयस्क प्रतिदिन औसतन 35,000 निर्णय लेता है, जिससे संज्ञानात्मक संसाधन क्षीण होते जाते हैं। इज़राइल में पैरोल बोर्ड के 1,100 से अधिक निर्णयों के विश्लेषण में पाया गया कि सुबह के समय अनुकूल निर्णयों की दर 65% थी, जो भोजन अवकाश से ठीक पहले गिरकर 10% से नीचे आ गई और विराम के बाद पुनः 65% पर लौट आई। यह संज्ञानात्मक थकावट शारीरिक थकान से भिन्न है और अक्सर आलस्य समझ ली जाती है। नियमित व्यायाम, विशेषकर एरोबिक गतिविधि, BDNF और मायोकाइन्स के माध्यम से मस्तिष्क की इस ऊर्जा प्रणाली को सुरक्षित रखने में सहायक हो सकता है।
भारत जैसे देश के लिए, जहाँ बुजुर्ग आबादी तेज़ी से बढ़ रही है और गतिहीन जीवनशैली आम है, ये निष्कर्ष व्यावहारिक रास्ते सुझाते हैं। पेन स्टेट यूनिवर्सिटी के एक परीक्षण में 65 वर्ष से अधिक आयु के 97 वयस्कों ने 12 सप्ताह तक प्रतिदिन केवल चार मिनट का शक्ति अभ्यास (फ्लेक्सन, कुर्सी से उठना, बैंड रोइंग, स्टेप-अप) किया, जिससे 30 सेकंड में उठने-बैठने की संख्या में 4.2 की वृद्धि, एक पैर पर संतुलन में 3.6 सेकंड का इज़ाफ़ा और बैठने-उठने के समय में 2.3 सेकंड की कमी आई। चलने की गति के लिए आयु-वार संदर्भ (60-69 वर्ष में 5.3-5.9 किमी/घंटा) और ‘टॉक टेस्ट’ जैसे सरल मानदंड स्वास्थ्य की निगरानी का सुलभ ज़रिया बन सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही 150-300 मिनट मध्यम एरोबिक और दो शक्ति सत्रों की साप्ताहिक सिफ़ारिश करता है; अब कई भारतीय राज्य गैर-संचारी रोग रोकथाम के लिए ‘व्यायाम नुस्खे’ का परीक्षण कर रहे हैं, जो इन प्रमाणों को नीतिगत स्तर पर अपनाने की दिशा में अगला ठोस कदम है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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तेज चलना या नियमित एरोबिक गतिविधि मस्तिष्क को फिर से युवा बना सकती है, हिप्पोकैम्पस का आयतन बढ़ा सकती है जो स्मृति के लिए महत्वपूर्ण है। PNAS में एक अध्ययन से पता चलता है कि शारीरिक व्यायाम न केवल शरीर को फिट रखता है बल्कि सचमुच मस्तिष्क को युवा बनाता है।
शक्ति प्रशिक्षण केवल मांसपेशियाँ बनाने के लिए नहीं है; लगभग 150,000 लोगों के दशकों के डेटा पर आधारित एक नया अध्ययन दिखाता है कि यह आपको लंबे समय तक जीने में मदद कर सकता है। जिम में घंटों बिताए बिना, मामूली मात्रा में वजन उठाना भी बढ़ी हुई दीर्घायु से जुड़ा है।
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