
चेन्नई में एक फोन कॉल और 28 साल बाद ममूटी का चौथा राष्ट्रीय पुरस्कार
72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में ममूटी, कार्तिक आर्यन और यामी गौतम को शीर्ष अभिनय सम्मान मिले, जबकि 'आर्टिकल 370' सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म बनी।
चेन्नई में एक साधारण दोपहर थी जब 74 वर्षीय ममूटी के पास खबर पहुंची। चार सौ से अधिक फिल्मों का सफर तय कर चुके इस अभिनेता ने फोन रखा और एक लम्बी चुप्पी के बाद मुस्कुराए—यह उनका चौथा राष्ट्रीय पुरस्कार था, 28 साल का अंतराल तोड़ता हुआ। 'ब्रह्मायुगम' में कोडुमोन पोट्टी के उनके भयावह किरदार ने जूरी को इस कदर प्रभावित किया कि उन्हें कार्तिक आर्यन के साथ संयुक्त रूप से सर्वश्रेष्ठ अभिनेता घोषित किया गया। यह वही फिल्म है जो केरल की लोककथाओं की काली-सफेद दुनिया में रची गई और जिसकी छायांकन के लिए शहनाद जलाल को भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
नई दिल्ली के राष्ट्रीय मीडिया केंद्र से जब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने विजेताओं की घोषणा की, तो भारतीय सिनेमा की विविधता एक बार फिर सामने आई। 'आर्टिकल 370' को सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का सम्मान मिला—यह वही राजनीतिक थ्रिलर है जो जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने की पृष्ठभूमि पर बनी है। इसी फिल्म के लिए यामी गौतम को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री चुना गया, जिन्होंने बाद में सोशल मीडिया पर लिखा, “हर सफर में एक पल ऐसा आता है जो याद दिलाता है कि आपने हार क्यों नहीं मानी।” तमिल फिल्म 'अमरन' के लिए राजकुमार पेरियासामी को सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का पुरस्कार मिला, वहीं तेलुगु की 'कल्कि 2898 एडी' सर्वश्रेष्ठ मनोरंजक फिल्म बनी।
इस वर्ष के पुरस्कारों ने एक ऐसे दौर को चिह्नित किया जहां क्षेत्रीय सिनेमा ने राष्ट्रीय मंच पर अपनी गहरी छाप छोड़ी। मलयालम फिल्म 'फेमिनिची फातिमा' को सर्वश्रेष्ठ मलयालम फिल्म का पुरस्कार मिला, जो लैंगिक समानता की कहानी कहती है। कन्नड़ की 'मिथ्या' ने सर्वश्रेष्ठ कन्नड़ फिल्म के साथ बाल कलाकार और सहायक अभिनेत्री के पुरस्कार जीते—इसके निर्माता रक्षित शेट्टी ने लिखा, “ईमानदारी से कही गई कहानियां कभी अनदेखी नहीं रहतीं।” तेलुगु की 'पुष्पा 2' ने पटकथा और वेशभूषा के लिए दो पुरस्कार झटके, जबकि तमिल की 'कैप्टन मिलर' को राष्ट्रीय, सामाजिक और पर्यावरणीय मूल्यों को बढ़ावा देने वाली फिल्म का सम्मान मिला।
दर्शकों और आलोचकों की प्रतिक्रियाएं इस बात की गवाह रहीं कि ये पुरस्कार केवल व्यावसायिक सफलता के नहीं, बल्कि कहानी कहने की ईमानदार कोशिशों के सम्मान थे। रणदीप हुडा ने 'स्वातंत्र्य वीर सावरकर' से सर्वश्रेष्ठ नवोदित निर्देशक का पुरस्कार जीतने पर कहा, “इस फिल्म ने मुझसे वह सब मांगा जो मैंने पहले कभी नहीं किया।” वहीं संजय मिश्रा को 'भक्षक' के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता चुना गया, और धनुष को 'कैप्टन मिलर' के लिए विशेष उल्लेख मिला। गैर-फीचर श्रेणी में 'भांगार' सर्वश्रेष्ठ गैर-फीचर फिल्म बनी, और सर्वश्रेष्ठ फिल्म समीक्षक का पुरस्कार संजीव श्रीवास्तव को दिया गया।
इस पूरे आयोजन की एक स्थायी छवि रह गई—केरल की लोककथाओं से निकला कोडुमोन पोट्टी का वह किरदार, जो अब अकादमी संग्रहालय की स्क्रीन से लेकर राष्ट्रीय पुरस्कार के मंच तक गूंज रहा है। ममूटी के लिए यह सम्मान महज एक ट्रॉफी नहीं, बल्कि पांच दशकों के अनुशासन और निरंतर पुनर्आविष्कार की कहानी है, जो 74 की उम्र में भी किसी परिचय की मोहताज नहीं।
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| अरब खाड़ी प्रेस | +0.40 | aligned |
भारत अपने राष्ट्रीय पुरस्कारों का जश्न मनाता है, लेकिन आलोचनात्मक आवाज़ें सिनेमा के राजनीतिक उपयोग की निंदा करती हैं।
भारतीय प्रेस आधिकारिक विजय को असहमति के साथ संतुलित करता है, एक दोहरी कथा बनाता है जो देश के राजनीतिक विभाजन को दर्शाती है।
खाड़ी दक्षिण भारतीय सिनेमा के प्रभुत्व का जश्न मनाता है, पुरस्कारों को इसकी सांस्कृतिक आधिपत्य की पुष्टि के रूप में प्रस्तुत करता है।
खाड़ी प्रेस दक्षिणी सफलताओं का चयन और प्रवर्धन करता है, सरकारी फिल्म की आलोचना को छोड़कर क्षेत्रीय उत्थान की कथा बनाता है।
खाड़ी प्रेस 'Article 370' की सरकारी प्रचार के रूप में आलोचना और राजनीतिक विवाद को छोड़ देता है, केवल दक्षिण भारतीय सिनेमा की जीत पर ध्यान केंद्रित करता है।
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