
एलिसी पैलेस में धूप के चश्मे और सुल्तान: मैक्रों की आँखों के पीछे छिपी कहानी
फ्रांस के राष्ट्रपति के एविएटर सनग्लासेज़ एक बार फिर कूटनीतिक मुलाकात के केंद्र में आ गए, जहाँ शिष्टाचार, स्वास्थ्य और सोशल मीडिया की तीखी नज़रें एक साथ मिल गईं।
पेरिस के एलिसी पैलेस के प्रांगण में ओमान के सुल्तान हैथम बिन तारिक के स्वागत की तस्वीरों में एक चमकीला विवरण बार-बार आँखों को अपनी ओर खींच रहा था। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, एक सधे हुए गहरे सूट में, अपनी आँखों पर वही गहरे रंग का एविएटर चश्मा लगाए खड़े थे जो पिछले कुछ महीनों में फ्रांसीसी राजनीति का एक अनपेक्षित प्रतीक बन चुका है। दोनों नेताओं के बीच ओरमुज जलडमरूमध्य में नौवहन सुरक्षा और मध्य-पूर्व में तनाव कम करने जैसे गंभीर मुद्दों पर बातचीत होनी थी, लेकिन कैमरों की निगाहें बार-बार उन दो शीशों पर टिक जाती थीं जिनके पीछे राष्ट्रपति की आँखें छिपी थीं।
यह पहली बार नहीं था जब मैक्रों के चश्मे ने कूटनीतिक प्रोटोकॉल को पीछे छोड़ दिया हो। जनवरी में दावोस के विश्व आर्थिक मंच पर भी वे इसी तरह नज़र आए थे, और तब उनके कार्यालय ने स्पष्टीकरण दिया था कि आँख की एक रक्त-वाहिका फटने के कारण हुए धब्बे को छिपाने के लिए ऐसा किया गया। इस बार भी ले फिगारो के अनुसार राष्ट्रपति के करीबी सूत्रों ने 'आँख की समस्या' का हवाला दिया, बिना कोई और विस्तार दिए। लेकिन सोशल मीडिया पर यह स्पष्टीकरण एक हाशिये की कहानी बनकर रह गया, क्योंकि वहाँ एक पुरानी और कहीं अधिक रोचक अटकलें पहले से हवा में तैर रही थीं।
यह अटकलें एक टेलीविज़न क्लिप से जन्मी थीं जिसमें प्रथम महिला ब्रिजिट मैक्रों को राष्ट्रपति विमान से उतरते समय अपने पति को थप्पड़ मारते देखा गया था। तब से हर बार जब मैक्रों चश्मा लगाकर सार्वजनिक रूप से आते हैं, सोशल मीडिया पर एक ही सवाल गूँजने लगता है: 'क्या उन्हें फिर से ब्रिजिट से मार पड़ी?' फ्रांसीसी दक्षिणपंथी दल 'पैट्रियट्स' के नेता फ्लोरियन फिलिप्पो ने इस बार भी एक्स पर लिखकर इस भावना को धार दी: 'मैक्रों ने फिर से अपना धूप का चश्मा निकाल लिया! ब्रिजिट की ओर से एक और सज़ा या फिर से बिंदास दिखने की कोशिश?' फिलिप्पो ने यह भी याद दिलाया कि जनवरी में मैक्रों ने जिस फ्रांसीसी कंपनी के चश्मे पहने थे, वह तब से दिवालिया हो चुकी है।
यह पूरा प्रकरण एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ जहाँ शिष्टाचार विशेषज्ञों ने भी अपनी राय देना आवश्यक समझा। रूसी बिज़नेस प्रोटोकॉल विशेषज्ञ तात्याना निकोलायेवा ने लेंटा.रू से बातचीत में स्पष्ट किया कि धूप के चश्मे को आमने-सामने की बातचीत के दौरान उतार देना चाहिए, सिवाय इसके कि आँखों की कोई गंभीर चिकित्सीय स्थिति हो। उन्होंने टिप्पणी की, 'जहाँ तक हमें जानकारी है, मैक्रों इस तरह की बीमारियों से पीड़ित नहीं हैं।' यह दृष्टिकोण उन अनगिनत ऑनलाइन टिप्पणियों से मेल खाता है जो इस कृत्य को राजनैतिक जिम्मेदारी के स्तर के अनुरूप नहीं मानतीं। एक इज़राइली यूज़र ने किकर हशब्बात पर लिखा, 'मैक्रों के यहाँ सब झूठ है। इतनी बड़ी राजनैतिक जिम्मेदारी के स्तर पर आमने-सामने बात करने के लिए धूप का चश्मा नहीं पहना जाता। नज़रें मिलाना एक आधारभूत चीज़ है।'
इस सबके बीच, मैक्रों ने अपना चश्मा पूरे आयोजन के दौरान नहीं उतारा—न तो एलिसी में समझौतों पर हस्ताक्षर के समय, और न ही बाद में एक पेरिस के होटल में आयोजित फ्रांस-ओमान व्यापार मंच पर। यह दृश्य अब एक स्थायी छवि बन चुका है: एक राष्ट्रपति जो अपनी आँखों को एक गहरे शीशे के पीछे छिपाए हुए है, जबकि दुनिया उस पारदर्शिता को टटोल रही है जो कूटनीति की बुनियाद मानी जाती है। और शायद यही वह बिंदु है जहाँ एक व्यक्तिगत सहायक वस्तु सामूहिक कल्पना में एक ऐसे प्रश्न-चिह्न में बदल जाती है जिसका उत्तर न तो प्रेस विज्ञप्ति दे पाती है और न ही कोई आधिकारिक बयान।
| रूसी और सीआईएस प्रेस | −0.40 | critical |
|---|---|---|
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | −0.30 | critical |
| इज़राइली प्रेस | 0.00 | neutral |
Russia points to yet another scandal distracting Macron from real issues, while the West loses itself in trivial image matters.
It projects onto the French leader the typical critique of Western elites, turning a personal detail into a symbol of a corrupt and detached system.
Continental Europe sees in this scandal further proof of Macron's detachment from reality, a leader more concerned with appearance than substance.
It universalizes a personal episode into an indicator of the overall failure of presidential communication and lack of empathy toward citizens.
Israel records the incident as a normal lifestyle news item, without attributing strategic or symbolic relevance to it.
It reduces the scandal to a light news item, avoiding any connection to French domestic politics or criticism of the leader.
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