
तेल की गिरावट से अमेरिकी दर वृद्धि की आशंकाएँ: फेड और ईसीबी में बढ़ता विचलन
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बावजूद अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ रही है, जो मुद्रास्फीति नियंत्रण की चुनौती और फेड की सख्त नीति की संभावना को दर्शाता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज गिरावट ने मौद्रिक नीति की उम्मीदों को अप्रत्याशित मोड़ दे दिया है। परंपरागत रूप से सस्ता तेल मुद्रास्फीति में राहत का संकेत माना जाता है, लेकिन इस बार अमेरिकी दो-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड में तेजी देखी गई। यह विचलन अप्रैल के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आँकड़ों के बाद उभरा और संकेत देता है कि बाजार ने मुद्रास्फीति और ब्याज दरों के परिदृश्य को पुनः आँका है।
इस बदलाव के पीछे तंत्र यह है कि ऊर्जा लागत घटने से उपभोक्ता खर्च बढ़ सकता है और कंपनियों के मार्जिन में सुधार हो सकता है, जिससे मांग गर्म बनी रहती है और मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना कठिन हो जाता है। ब्राज़ील के वित्तीय शिक्षक थियागो गोडॉय के अनुसार, यह ऐसा है जैसे पहले से जलती आग में और ईंधन डाल दिया जाए। इसी धारणा ने अमेरिकी बॉन्ड बाजार में पुनर्मूल्यांकन को जन्म दिया, जहाँ दरों में कटौती की उम्मीद लगाए बैठे निवेशकों को मार्क-टू-मार्केट नुकसान उठाना पड़ा।
फ्रांस के ऐक्स-एन-प्रोवेंस में आयोजित वार्षिक आर्थिक सम्मेलन में यूरोपीय और अमेरिकी केंद्रीय बैंकों के बीच बढ़ते विचलन पर चर्चा हुई। एलियांज के मुख्य आर्थिक अनुसंधान अधिकारी लुडोविक सुब्रान ने कहा कि अमेरिकी श्रम बाजार के कमजोर आँकड़ों (जून में 57,000 गैर-कृषि नियुक्तियाँ) के बावजूद, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, राजकोषीय प्रोत्साहन और ऊर्जा से संचालित अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति 3.7% से ऊपर जा सकती है, जिससे फेड को सितंबर में दर बढ़ानी पड़ सकती है। बीएनपी पारिबा की इसाबेल मातेओस वाई लागो ने जुलाई में वृद्धि की संभावना कम होने के बावजूद आगे दर बढ़ोतरी का तर्क बरकरार बताया। इसके विपरीत, यूरोजोन की मुद्रास्फीति 2.8% पर अपेक्षा से कम रही और मध्य-पूर्व संघर्ष के समाप्ति के संकेतों के बीच तेल कीमतों में नरमी से ईसीबी का दर वृद्धि चक्र समाप्त माना जा रहा है।
बैंक ऑफ अमेरिका (बोफा) ने 2026 में तीन बार 0.25% की दर वृद्धि का अनुमान लगाया है, जो फेड की दर को 5.00-5.25% तक ले जाएगा। इसके पीछे मजबूत आर्थिक गतिविधि, वस्तुओं और सेवाओं दोनों में लगातार मुद्रास्फीति और नए फेड अध्यक्ष केविन वॉर्श का रुख शामिल है। हालाँकि, बोफा के ब्राजील अर्थशास्त्री डेविड बेकर ने स्वीकार किया कि हाल के कमजोर रोजगार आँकड़ों के बाद यह परिदृश्य कम संभावित हो गया है। सीएमई फेडवॉच के अनुसार, बाजार इस वर्ष केवल एक ही वृद्धि की 7% संभावना देख रहा है। उभरते बाजारों के लिए, अमेरिकी दरों में वृद्धि का अर्थ होगा मजबूत डॉलर, पूँजी प्रवाह में कमी और मुद्रास्फीति नियंत्रण में कठिनाई।
भारत जैसे दक्षिण एशियाई देशों के लिए यह विचलन दोहरी चुनौती लेकर आता है। एक ओर सस्ते तेल से आयात बिल घट सकता है, वहीं दूसरी ओर अमेरिकी दरों में बढ़ोतरी से पूँजी बहिर्वाह और रुपए पर दबाव बढ़ सकता है। अगला ध्यान देने योग्य पड़ाव फेड की आगामी बैठक और अध्यक्ष वॉर्श का ताजा संवाद होगा, जिसमें मुद्रास्फीति जोखिमों के आकलन में किसी भी बदलाव पर बाजार की निगाहें टिकी रहेंगी।
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | +0.20 | neutral |
|---|---|---|
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | −0.10 | neutral |
The Argentine government presents the debt plan as a guarantee of stability, reassuring markets.
It omits any reference to the global oil context, focusing solely on the internal narrative of control and predictability.
No mention is made of the impact of the oil drop on Argentine finances or global rate expectations.
Global markets react urgently to the oil drop, questioning central banks' ability to stay on course.
A hierarchy of threats is created, linking the oil drop to geopolitical and monetary policy risks, amplifying uncertainty.
The positive impact of lower oil prices on consumers or importing economies is not discussed.
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