
ट्रंप ने नेतन्याहू पर साधा निशाना: 'हर किसी पर बमबारी करना चाहते हैं, मैं थक गया'
अमेरिकी राष्ट्रपति की सार्वजनिक खीझ और ईरान समझौते ने इज़रायल को रणनीतिक झटका दिया, जिससे पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इज़रायली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के बीच गहराते तनाव का खुलासा वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट ने किया है। रिपोर्ट के अनुसार, हाल ही में लेबनान को लेकर हुई एक फोन कॉल में ट्रंप ने नेतन्याहू से सीधे पूछा, "आप इमारतें क्यों उड़ा रहे हैं? इसे रोकिए।" सूत्रों का कहना है कि ट्रंप ने अपने सलाहकारों से शिकायत की कि नेतन्याहू "हर किसी पर बमबारी करना चाहते हैं" और वे इससे थक चुके हैं। यह सार्वजनिक आलोचना का वह स्तर है जो किसी भी पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ने इज़रायली नेता के प्रति नहीं दिखाया।
यह खीझ उस समय सामने आई जब ट्रंप ने ईरान के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों द्वारा वर्साय के महल में आयोजित रात्रिभोज के दौरान हुआ यह समझौता इज़रायल के लिए एक रणनीतिक झटका है। अरब मीडिया के अनुसार, ट्रंप ने स्वीकार किया कि ईरान के साथ युद्ध के कुछ पहलुओं में नेतन्याहू के उद्देश्य भिन्न थे, जिसकी एक वजह इज़रायल की भौगोलिक निकटता भी है। ट्रंप ने नेतन्याहू को "शानदार व्यक्ति" बताया, लेकिन यह भी कहा कि "कभी-कभी वे ज़रूरत से ज़्यादा आगे बढ़ जाते हैं।"
इज़रायली प्रतिक्रिया में गहरी चिंता और मौन का मिश्रण देखने को मिला। नेतन्याहू ने सार्वजनिक रूप से चुप्पी साध ली, जबकि तेल अवीव में अधिकारियों ने अनौपचारिक ब्रीफिंग में इस समझौते को "रणनीतिक और राजनीतिक आपदा" करार दिया। वाशिंगटन में नेतन्याहू के रिपब्लिकन सहयोगी और मीडिया भी ट्रंप की मुहर वाले समझौते का खुलकर विरोध करने से हिचक रहे हैं। रूसी मीडिया ने इस पूरे प्रकरण को ट्रंप की थकान के रूप में रेखांकित किया, जिसमें बार-बार सैन्य कार्रवाई की मांग करने वाले नेतन्याहू से अमेरिकी राष्ट्रपति ऊब गए थे।
यह घटनाक्रम अमेरिका-इज़रायल गठबंधन में एक नए यथार्थवाद की ओर इशारा करता है, जहां ट्रंप का लेन-देन आधारित दृष्टिकोण सैन्य सहयोग की पुरानी धारणाओं को चुनौती दे रहा है। ईरान के साथ समझौता पश्चिम एशिया में तनाव कम कर सकता है, लेकिन इससे इज़रायल की सुरक्षा चिंताएं और अलगाव बढ़ेगा। दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत के लिए, यह बदलाव महत्वपूर्ण है। ईरान के साथ स्थिर संबंध भारत की ऊर्जा आपूर्ति और चाबहार बंदरगाह परियोजना को गति दे सकते हैं, जो अफगानिस्तान और मध्य एशिया से जुड़ने का वैकल्पिक मार्ग है। हालांकि, इज़रायल के साथ भारत के बढ़ते रक्षा संबंधों पर इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है। आने वाले महीने बताएंगे कि क्या ट्रंप की 'अमेरिका प्रथम' नीति पुराने सहयोगियों को पीछे छोड़कर नए कूटनीतिक समीकरण गढ़ेगी।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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ट्रंप ने नेतन्याहू की खुलकर आलोचना की, ऐसी भाषा में जो पहले किसी अमेरिकी नेता ने नहीं अपनाई, और कहा कि वह हर किसी पर बमबारी करना चाहते हैं और वे इससे थक गए हैं। उन्होंने लेबनान में इमारतों को उड़ाने पर रोक लगाने को कहा। यह एक दरार को दर्शाता है, क्योंकि ट्रंप ईरान के साथ समझौते की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि इज़रायली प्रधानमंत्री युद्ध जारी रखना चाहते थे।
ट्रंप के ईरान के साथ नए समझौते ने इज़राइल को असमंजस में डाल दिया है, और नेतन्याहू चुप हैं। इज़रायली अधिकारी इसे एक रणनीतिक और राजनीतिक आपदा मानते हैं। नेतन्याहू, जिन्होंने 'पूर्ण विजय' का वादा किया था, को समझौता स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ा और वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अकेले हैं जो मानते हैं कि युद्ध जारी रहना चाहिए था।
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