
ईरानी वार्ताकार ग़ालिबाफ़: अमेरिका से युद्ध आत्मसमर्पण से खत्म नहीं होगा, बातचीत के लिए युद्ध की तैयारी ज़रूरी
ईरान के शीर्ष वार्ताकार ने कहा कि केवल युद्ध के लिए तैयार देश ही अमेरिका से बातचीत कर सकते हैं, जबकि युद्धविराम टूटने के बाद भी कूटनीतिक चैनल खुले हैं।
ईरान के शीर्ष वार्ताकार और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाग़ेर ग़ालिबाफ़ ने शुक्रवार को कहा कि अमेरिका के साथ जारी सैन्य टकराव "कभी भी ईरान के आत्मसमर्पण के साथ खत्म नहीं होगा।" उन्होंने यह भी कहा कि उनके दृष्टिकोण से "केवल वही लोग अमेरिका के साथ बातचीत कर सकते हैं जो युद्ध के लिए तैयार हों।" यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों देशों के बीच पिछले सप्ताह सैन्य कार्रवाइयाँ तेज़ हुई हैं और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने युद्धविराम को "खत्म" घोषित कर दिया है।
ईरानी पक्ष के अनुसार, ग़ालिबाफ़ ने इंडोनेशियाई संसद अध्यक्ष के साथ बैठक में कहा कि ईरान ने कभी युद्ध नहीं चाहा, लेकिन अगर अमेरिकी पक्ष जून के मध्य में हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन का उल्लंघन करता है तो तेहरान "पूर्ण रक्षा" के लिए तैयार है। उन्होंने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस के साथ हुई बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि ईरान को अमेरिका पर "बिल्कुल भी भरोसा नहीं है।" ईरानी सरकारी मीडिया के अनुसार, ग़ालिबाफ़ ने यह भी दावा किया कि पिछले युद्ध से पहले अमेरिका, इज़राइल और नाटो को लगता था कि वे कुछ दिनों में ईरान को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर देंगे, लेकिन उन्हें जल्द ही एहसास हो गया कि वे अपने लक्ष्य हासिल नहीं कर पाएँगे।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने शुक्रवार को सोशल मीडिया पर लिखा कि ईरान ने बातचीत जारी रखने का अनुरोध किया है और अमेरिका इसके लिए राज़ी हो गया है, लेकिन उन्होंने दोहराया कि युद्धविराम "खत्म हो चुका है।" वाशिंगटन ने ईरान पर होर्मुज़ जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक जहाज़ों को निशाना बनाने का आरोप लगाया, जिसके जवाब में अमेरिकी सेना ने ईरानी क्षेत्र के अंदर हमले किए। इसके बाद ईरान ने कुवैत, बहरीन, क़तर और जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ड्रोन और मिसाइल हमलों की ज़िम्मेदारी ली। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि ईरान की कार्रवाइयों ने समझौते का उल्लंघन किया, जिसके चलते सैन्य जवाबी कार्रवाई ज़रूरी हो गई।
पाकिस्तान की मध्यस्थता और क़तर की अहम भूमिका से तैयार हुए 14-सूत्रीय समझौता ज्ञापन में होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलने, ईरान पर कुछ वित्तीय प्रतिबंधों में ढील देने और भविष्य की तकनीकी वार्ताओं में परमाणु कार्यक्रम पर चर्चा की रूपरेखा तय की गई थी। इसमें सभी मोर्चों पर युद्धविराम का प्रावधान भी था और 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौते के लिए बातचीत शुरू करने की समय-सीमा तय की गई थी। स्विट्ज़रलैंड में एक दौर की सीधी बातचीत और दोहा में अप्रत्यक्ष तकनीकी बैठकों के बाद हालिया सैन्य टकराव ने इस प्रक्रिया को पटरी से उतार दिया है। दक्षिण एशिया के लिए, विशेष रूप से भारत के लिए, होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुज़रने वाली ऊर्जा आपूर्ति में किसी भी रुकावट के गंभीर आर्थिक परिणाम हो सकते हैं, ऐसा क्षेत्रीय विशेषज्ञों का मानना है।
मौजूदा गतिरोध के बावजूद, कूटनीतिक माध्यम पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। क़तर का एक प्रतिनिधिमंडल शुक्रवार को बातचीत के लिए तेहरान पहुँचा, और क्षेत्रीय शक्तियाँ युद्धविराम को फिर से स्थापित करने और स्थायी शांति के लिए बातचीत बहाल करने का प्रयास कर रही हैं। हालाँकि, दोनों पक्षों के बीच विश्वास की भारी कमी और सैन्य तैयारियों के बीच, यह स्पष्ट नहीं है कि वार्ता का अगला दौर कब और किस रूप में शुरू होगा।
| अरब लेवांत-मगरिब प्रेस | 0.00 | neutral |
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| दक्षिण-पूर्व एशियाई प्रेस | 0.00 | neutral |
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | 0.00 | neutral |
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