
बचपन का मोटापा और सेहत की अधूरी समझ: व्यायाम से प्रोटीन वॉशिंग तक
अमेरिका में 1 में से 5 बच्चे मोटापे से ग्रस्त हैं, वहीं इंडोनेशियाई विशेषज्ञ व्यायाम को संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए अपर्याप्त बताते हैं और ब्रिटेन में ‘प्रोटीन वॉशिंग’ व चीनी-मुक्त आहार के जोखिम उजागर हुए हैं।
अमेरिका में बचपन का मोटापा पिछले पचास वर्षों में चार गुना बढ़ गया है और अब 5 में से 1 बच्चे को प्रभावित करता है। रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र (सीडीसी) के अनुसार, इसके पीछे सामाजिक-आर्थिक, पर्यावरणीय और जीवनशैली संबंधी कई कारण हैं। पेंसिल्वेनिया और न्यूयॉर्क के हार्लेम जैसे इलाकों में वाईएमसीए और हार्लेम चिल्ड्रेन्स ज़ोन जैसे कार्यक्रम पूरे परिवार के खान-पान और शारीरिक गतिविधि की आदतों को बदलने पर जोर दे रहे हैं। हाल ही में एफडीए के पूर्व आयुक्त डॉ. मार्टी मकारी ने स्कूलों में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाने के बजाय वास्तविक भोजन उपलब्ध कराने और खाद्य पैकेटों पर स्पष्ट पोषण जानकारी देने की वकालत की।
इस बीच इंडोनेशिया के आरएस हारापन बुंदा के डॉ. आंदी सिट्टी तंदीना ने इस धारणा को मिथक करार दिया कि नियमित व्यायाम करने वाला व्यक्ति बीमारियों से पूरी तरह सुरक्षित रहता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि स्वास्थ्य केवल शारीरिक कसरत पर निर्भर नहीं है। इसी कड़ी में उभरती एक और स्वास्थ्य चुनौती है समय से पहले यौवन (प्यूबर्टी प्रीकोसियस), जो इंडोनेशिया के ही यूनिवर्सिटास मुहम्मदियाह सुराबाया के विशेषज्ञों के अनुसार बच्चियों में 8 और बच्चों में 9 वर्ष से पहले शुरू होने वाले शारीरिक बदलावों से जुड़ी है। यह स्थिति आगे चलकर कद छोटा रहने और मानसिक तनाव का कारण बन सकती है, जो स्वास्थ्य पर पूरा ध्यान देने की जरूरत को और रेखांकित करती है।
सेहत को लेकर अति उत्साह कई बार नुकसानदेह साबित होता है। एक पशु अध्ययन में, जिसमें प्रति समूह मात्र छह चूहे शामिल थे, शून्य-चीनी आहार पर रखे गए चूहों का वजन तो नहीं बढ़ा लेकिन उनका उपापचय बिगड़ गया—उनमें आँतों की सूजन और ग्लूकोज़ सहनशीलता में कमी देखी गई। इसी तरह, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, लॉस एंजेलिस के 140 से अधिक प्रतिभागियों पर हुए एक मानव अध्ययन ने दिखाया कि बचपन में गंभीर तनाव या वंचना झेलने वाले वयस्कों में माइटोकॉन्ड्रिया की कोशिकीय श्वसन क्षमता ‘हाइपरमेटाबॉलिज्म’ का रूप ले लेती है, जो दीर्घकाल में कोशिकाओं के लिए हानिकारक है।
ब्रिटिश बाजार में ‘प्रोटीन वॉशिंग’ की प्रवृत्ति ने इन भ्रांतियों को और बढ़ाया है। कई ‘हाई प्रोटीन’ लेबल वाले उत्पादों—जैसे शेकन अडर चॉकलेट मिल्कशेक (20 ग्राम प्रोटीन, 32 ग्राम चीनी)—में चीनी की मात्रा चिंताजनक पाई गई है, और इनमें प्रोटीन की वृद्धि मामूली ही होती है। पोषण विशेषज्ञ रॉब हॉब्सन ने चेताया कि उपभोक्ता ‘प्रोटीन’ शब्द को स्वतः स्वस्थ समझ लेते हैं, जबकि कई दावे भ्रामक हैं।
विभिन्न क्षेत्रों से मिले ये संकेत एक स्पष्ट संदेश देते हैं: स्वास्थ्य किसी एक आदत का परिणाम नहीं है। संतुलित आहार, पारिवारिक सहयोग और शुरुआती मानसिक-सामाजिक परिवेश पर ध्यान देना उतना ही आवश्यक है। अगला ठोस कदम अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन की ओर से खाद्य पैकेजिंग के सामने पोषण तथ्यों को सरल रूप में प्रस्तुत करने का प्रस्तावित नियम हो सकता है, जो उपभोक्ताओं को सूचित विकल्प चुनने में मदद करेगा।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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अटलांटिक ब्लॉक बचपन के मोटापे से पारंपरिक आहार और व्यायाम के ज़रिए लड़ने पर ध्यान केंद्रित करता है, साथ ही 'प्रोटीन वाशिंग' जैसी मार्केटिंग चालों की आलोचना करता है। यह चेतावनी देता है कि चीनी-मुक्त चरम प्रवृत्तियाँ चयापचय को नुकसान पहुँचा सकती हैं, और उपभोक्ताओं को स्वास्थ्य दावों पर संदेह बनाए रखने का आग्रह करता है। दीर्घकालिक कल्याण के लिए व्यावहारिक समाधान, न कि सनक, पर ज़ोर दिया जाता है।
भारतीय उपमहाद्वीप से अनुसंधान चेतावनी देता है कि बचपन की प्रतिकूलताएँ कोशिकीय अतिचयापचय का कारण बन सकती हैं, जो लंबे समय में हानिकारक है। जबकि माइटोकॉन्ड्रिया शुरू में तनाव से निपटने के लिए ऊर्जा उत्पादन बढ़ा सकते हैं, यह अनुकूली प्रतिक्रिया जीवनकाल में कुअनुकूल हो जाती है, जो खराब शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में योगदान करती है। अध्ययन प्रारंभिक जीवन के अनुभवों और आजीवन स्वास्थ्य परिणामों के बीच एक जैविक कड़ी पर प्रकाश डालता है।
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