
ट्रंप का नाटो सहयोगियों पर तीखा हमला: ब्रिटेन, इटली और जर्मनी को ईरान युद्ध में मदद न करने पर फटकार
अमेरिकी राष्ट्रपति ने कीर स्टार्मर के इस्तीफे पर भी टिप्पणी की, कहा- 'वह विंस्टन चर्चिल नहीं थे', और यूरोपीय सहयोगियों को भविष्य में अमेरिकी सहायता न मिलने की चेतावनी दी।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ब्रिटेन, इटली और जर्मनी सहित प्रमुख नाटो सहयोगियों पर ईरान के विरुद्ध सैन्य अभियान में सहयोग न देने का आरोप लगाया। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ने वर्षों तक यूरोप की सुरक्षा के लिए खरबों डॉलर खर्च किए, लेकिन जब वाशिंगटन को 'छोटी-छोटी चीज़ों' में भी मदद की ज़रूरत पड़ी, तो सहयोगियों ने इनकार कर दिया। उन्होंने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के हालिया इस्तीफे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि स्टार्मर 'विंस्टन चर्चिल नहीं थे' और उनकी ऊर्जा व आप्रवासन नीतियों ने उन्हें राजनीतिक रूप से बहुत नुकसान पहुंचाया।
व्हाइट हाउस से जारी बयानों के अनुसार, ट्रंप ने आरोप लगाया कि ईरान संघर्ष के दौरान ब्रिटेन ने अमेरिकी बमबारी अभियान के लिए सैन्य अड्डों का उपयोग देने से शुरू में इनकार कर दिया था, और स्टार्मर ने कहा था कि 'जब आप जीत जाएंगे तब हम आएंगे'—जिसे ट्रंप ने अस्वीकार्य बताया। इटली और जर्मनी के बारे में उन्होंने कहा कि दोनों देशों ने 'बहुत बुरा व्यवहार' किया और कोई सहायता नहीं दी। ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि यदि सहयोगी भविष्य में अमेरिकी अनुरोधों पर सहयोग नहीं करते, तो वाशिंगटन भी उनकी मदद करने से इनकार कर सकता है।
यूरोपीय कूटनीतिक हलकों से मिली प्रतिक्रिया में, ब्रिटेन में स्टार्मर के इस्तीफे को लेकर ट्रंप की टिप्पणियों को व्यक्तिगत आलोचना के रूप में देखा गया, जबकि इटली की सरकार ने चुप्पी की नीति अपनाई है। इतालवी प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़े सूत्रों का कहना है कि जॉर्जिया मेलोनी पहले ही ट्रंप के पिछले हमलों का जवाब दे चुकी हैं और फिलहाल सीधे टकराव से बचा जा रहा है। जर्मनी की ओर से अभी तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। नाटो मुख्यालय से जुड़े विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप के बयानों ने गठबंधन के अनुच्छेद पांच के तहत सामूहिक रक्षा की प्रतिबद्धता पर नई अनिश्चितता पैदा कर दी है।
इस पूरे प्रकरण की पृष्ठभूमि में ईरान के खिलाफ अमेरिकी नेतृत्व वाला सैन्य अभियान है, जिसमें वाशिंगटन ने यूरोपीय सहयोगियों से प्रत्यक्ष सहभागिता की अपेक्षा की थी। ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका नाटो पर प्रतिवर्ष लगभग 600 अरब डॉलर खर्च करता है, जिसे उन्होंने 'पागलपन' करार दिया। उन्होंने इटली और स्पेन से अमेरिकी सैनिकों की वापसी की समीक्षा की धमकी भी दी। दूसरी ओर, नाटो के नए महासचिव मार्क रूते इसी सप्ताह वाशिंगटन की यात्रा पर हैं, जहां वे ट्रंप और पेंटागन के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात करेंगे।
दक्षिण एशियाई परिप्रेक्ष्य में, यह घटनाक्रम अमेरिकी विदेश नीति की प्राथमिकताओं में संभावित बदलाव का संकेत है, जिसका प्रभाव हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा साझेदारियों पर भी पड़ सकता है। भारत जैसे देश, जो अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध मजबूत कर रहे हैं, के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वाशिंगटन पारंपरिक गठबंधनों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को किस रूप में पुनर्परिभाषित करता है। फिलहाल, रूते की यात्रा के दौरान होने वाली बंद कमरे की बातचीत से इस बात के संकेत मिलने की उम्मीद है कि ट्रंप प्रशासन नाटो के भविष्य को लेकर कितना आगे बढ़ने को तैयार है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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ट्रंप ने यूरोपीय सहयोगियों पर ईरान संघर्ष में साथ न देने का कठोर आरोप लगाया, इटली, जर्मनी और ब्रिटेन का नाम लिया। यूरोपीय नेताओं को अविश्वसनीय बताया गया, जबकि वाशिंगटन नाटो पर खरबों डॉलर खर्च करने का दावा करता है। इस हमले से ट्रान्साटलांटिक दरार की आशंका बढ़ गई है और सामूहिक रक्षा प्रतिबद्धताओं पर सवाल उठ रहे हैं।
ट्रंप ने नाटो प्रमुख रूटे से मुलाकात से पहले यूरोप को एक तीखा संदेश भेजा, ईरान टकराव में वाशिंगटन का साथ न देने का आरोप लगाया। आलोचना में परिचालन विवरण नहीं है, लेकिन यह क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए संवेदनशील समय पर आई है। खाड़ी देश व्यावहारिकता से देख रहे हैं, जानते हुए कि अमेरिकी दबाव रक्षा संतुलन को बदल सकता है।
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