
नए हिजरी वर्ष पर काबा ने धारण की नई किस्वा: सोने-चांदी के धागों से बुनी गई पवित्र चादर
सऊदी अरब ने 1 मुहर्रम 1448 हिजरी (16 जून 2026) को काबा की किस्वा बदली, जिसे 150 कारीगरों ने 11 महीने में सोने-चांदी के धागों और 1000 किलो रेशम से तैयार किया।
इस्लामी नव वर्ष के पहले दिन, 1 मुहर्रम 1448 हिजरी (16 जून 2026) को मक्का स्थित मस्जिद अल-हरम में एक सदियों पुरानी परंपरा ने फिर से जान ले ली। ख़ाना काबा की पवित्र चादर ‘किस्वा’ को पूरे धार्मिक अनुष्ठान के साथ बदला गया। सऊदी अरब के आधिकारिक मीडिया के अनुसार, यह क्षण न केवल एक भव्य समारोह है, बल्कि आध्यात्मिक नवीनीकरण और आत्म-शुद्धि का प्रतीक भी है। इंडोनेशियाई हज प्रबंधन से जुड़े एक अधिकारी ने इस मौके को ‘नई भावना और आत्म-पवित्रता के जन्म का प्रतीक’ बताया, जो दुनिया भर के मुसलमानों के लिए एक साझा पवित्र क्षण बन जाता है।
इस भव्य किस्वा को तैयार करने में कोई साधारण मेहनत नहीं लगी। मक्का स्थित किंग अब्दुलअज़ीज़ कॉम्प्लेक्स फॉर द काबाज़ किस्वा में लगभग 150 कारीगरों ने 11 महीने तक सोने और चांदी के धागों से बारीक कसीदाकारी की। 1,000 किलोग्राम से अधिक शुद्ध रेशम का उपयोग करके चार अलग-अलग पैनल और बाब-ए-काबा का पर्दा तैयार किया गया। प्रतिस्थापन की रात, 159 तकनीशियनों और शिल्पकारों की टीम ने पुरानी किस्वा को उतारने से पहले सोने की परत चढ़ी आयतें, लालटेन और अन्य आभूषण सावधानी से हटाए। हर पैनल को अलग-अलग काबा की छत तक ऊपर खींचा गया और फिर पुरानी चादर के ऊपर समान रूप से फैलाया गया, ताकि पवित्र इमारत बिना किसी बाधा के नई पोशाक धारण कर सके।
यह आयोजन सऊदी अरब की ‘दो पवित्र मस्जिदों के संरक्षक’ की भूमिका को रेखांकित करता है। सरकार ने इस वार्षिक अनुष्ठान को एक उच्च-समन्वित राष्ट्रीय अभियान में बदल दिया है, जिसमें पारंपरिक कारीगरी और आधुनिक तकनीक का संगम दिखता है। इंडोनेशिया जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से आने वाली प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि यह परंपरा केवल अरब प्रायद्वीप तक सीमित नहीं है; वहां के विद्वान इसे ‘आध्यात्मिक और भौतिक दोहरे अर्थ’ वाला क्षण मानते हैं। अरब मीडिया ने इस बात पर ज़ोर दिया कि किस्वा बदलने की प्रक्रिया हर साल मुसलमानों की निगाहों का केंद्र होती है, और इस बार भी हाल ही में हज संपन्न कर लौटे तीर्थयात्रियों की यादों के बीच यह नई शुरुआत का संदेश लेकर आई।
आगे की ओर देखें तो यह परंपरा सऊदी अरब की धार्मिक सॉफ्ट पावर को मज़बूत करने के साथ-साथ वैश्विक इस्लामी एकता का एक मूर्त प्रतीक बनी रहेगी। किस्वा का निर्माण अब पूरी तरह स्थानीय सऊदी कारीगरों द्वारा किया जाता है, जो राज्य की आत्मनिर्भरता और विरासत संरक्षण की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। अगले मुहर्रम तक यह सुनहरी-रेशमी चादर काबा की शोभा बढ़ाएगी, और हर नज़र इसे देखकर सदियों से चली आ रही आस्था और नवीनीकरण की इस जीवित परंपरा का हिस्सा बनेगी।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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The annual ritual of replacing the Kiswa marks the start of the Islamic year 1448. The moment is portrayed as sacred, bringing spiritual renewal and a fresh spirit for the Muslim community. The coverage blends factual details of the event with its symbolic significance.
Saudi Arabia reaffirms its custodianship of the holy sites by draping the Kaaba with a new Kiswa, the result of 11 months of work by 150 Saudi artisans. The covering, woven with gold and silver threads, celebrates the Kingdom's craftsmanship and dedication to Islam. The ritual is presented as a powerful centuries-old tradition showcasing Saudi excellence.
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