
रूस में 'एलजीबीटी आंदोलन' मामले में पहली सजा: ऑरेनबर्ग के बार कर्मचारियों को 7 साल तक की कैद
रूस की एक अदालत ने 'अंतरराष्ट्रीय एलजीबीटी आंदोलन' को चरमपंथी संगठन घोषित किए जाने के बाद पहली बार तीन बार कर्मचारियों को दोषी ठहराते हुए सात साल तक की सजा सुनाई है।
रूस के ऑरेनबर्ग शहर की एक अदालत ने सोमवार को एक बार के मालिक और दो कर्मचारियों को 'अंतरराष्ट्रीय एलजीबीटी आंदोलन' नामक एक गैर-मौजूद चरमपंथी संगठन की गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में दोषी ठहराया। यह पहला मामला है जिसमें नवंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उक्त आंदोलन पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद आपराधिक सजा सुनाई गई है। बार पोज़ के मालिक व्याचेस्लाव खासानोव को सात साल, प्रशासक डायना कामिल्यानोवा को छह साल तीन महीने और कला निर्देशक अलेक्ज़ांडर क्लिमोव को दो साल तीन महीने के कारावास की सजा दी गई। अदालत ने खासानोव से दस लाख रूबल से अधिक की आय भी जब्त कर ली और तीनों पर मनोरंजन व आतिथ्य उद्योग में दो से तीन साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया।
रूसी जांच एजेंसियों के अनुसार, तीनों अभियुक्तों ने प्रतिबंध के बावजूद बार में ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए जो 'गैर-पारंपरिक यौन अभिविन्यास वाले व्यक्तियों से संबंध प्रदर्शित करते थे' और इस प्रकार चरमपंथी संगठन की गतिविधियों को जारी रखा। अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि कामिल्यानोवा ने ट्रैवेस्टी कलाकारों के प्रदर्शन की वीडियो रिकॉर्डिंग की और क्लिमोव ने टेलीग्राम पर एलजीबीटी संबंधों का 'प्रचार' किया। तीनों ने अदालत में खुद को निर्दोष बताया। यह सुनवाई बंद कमरे में हुई। स्थानीय राष्ट्रवादी संगठन 'रूसी समुदाय' और 'सुरक्षित इंटरनेट लीग' की प्रमुख येकातेरिना मिज़ुलीना की शिकायतों के बाद मार्च 2024 में बार पर छापा मारा गया था, जिसके बाद गिरफ्तारियां हुईं।
मानवाधिकार संगठनों और निर्वासित रूसी मीडिया ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की है। उनका कहना है कि 'अंतरराष्ट्रीय एलजीबीटी आंदोलन' कोई वास्तविक संगठन नहीं है और यह कानून यौन पहचान को ही अपराध घोषित करने का एक औजार बन गया है। रूसी एलजीबीटी अधिकार समूह 'विखोद' (जिसे 'विदेशी एजेंट' घोषित किया गया है) की कानूनी विशेषज्ञों ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले में चरमपंथी गतिविधि की जो परिभाषा दी गई थी, उसका इस मामले में विस्तार किया गया है, जिससे मनोरंजन स्थलों को निशाना बनाने का रास्ता खुला है। पश्चिमी सरकारों और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार निकायों ने भी रूस में एलजीबीटी समुदाय के खिलाफ बढ़ते दमन पर चिंता जताई है।
यह मामला रूस में बढ़ती रूढ़िवादी नीतियों की एक कड़ी है। 2013 में 'समलैंगिक प्रचार' पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून के बाद 2022 में इसका दायरा सभी आयु वर्गों तक बढ़ा दिया गया। नवंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने न्याय मंत्रालय के अनुरोध पर 'अंतरराष्ट्रीय एलजीबीटी आंदोलन' को चरमपंथी घोषित कर दिया, जिसके बाद रोसफिनमॉनिटरिंग ने इसे आतंकवाद और चरमपंथ से जुड़े व्यक्तियों की सूची में डाल दिया। इसी कानून के तहत चिता शहर में एक महिला को एलजीबीटी क्लब चलाने के आरोप में पहले चार साल की सजा सुनाई गई थी, जिसे बाद में अपीलीय अदालत ने बढ़ाकर छह साल दो महीने कर दिया। एक ट्रैवल एजेंसी के प्रमुख आंद्रेई कोतोव की मॉस्को की जेल में मौत के बाद भी उनके खिलाफ मरणोपरांत मुकदमा चल रहा है।
ऑरेनबर्ग अदालत का यह फैसला अभी लागू नहीं हुआ है और इसके खिलाफ अपील की जा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सजा पूरे देश में ऐसे मामलों के लिए एक मिसाल कायम करेगी और आने वाले महीनों में इसी तरह के और मुकदमे दर्ज होने की संभावना है। भारत जैसे देशों के लिए, जहां सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था, रूस का यह रुख वैश्विक स्तर पर नागरिक अधिकारों के प्रति बढ़ते ध्रुवीकरण को रेखांकित करता है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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रूस की एक अदालत ने अंतरराष्ट्रीय एलजीबीटी आंदोलन की गतिविधियों के आयोजन और उसमें भाग लेने के लिए पहली सज़ा सुनाई, जिसे चरमपंथी माना गया है। ऑरेनबर्ग के एक बार के मालिक, प्रशासक और कला निर्देशक को प्रतिबंध के बाद भी कार्यक्रम आयोजित करने के लिए सात साल तक की क़ैद की सज़ा मिली। यह फ़ैसला चरमपंथी संगठनों के ख़िलाफ़ कानून के प्रवर्तन की पुष्टि करता है।
रूस द्वारा अस्तित्वहीन 'अंतरराष्ट्रीय एलजीबीटी आंदोलन' को चरमपंथी घोषित करने के बाद पहले आपराधिक मामले में, ऑरेनबर्ग की एक अदालत ने एक क्वीयर बार के तीन कर्मचारियों को दो से सात साल की जेल की सज़ा सुनाई। आरोप उस स्थान पर छापे से उपजे थे, और इस मामले को यौन अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ कार्रवाई के एक नए चरण के रूप में देखा जा रहा है। मानवाधिकार रक्षक एलजीबीटीक्यू+ समुदाय को सताने के लिए आतंकवाद-विरोधी कानूनों के इस्तेमाल की निंदा करते हैं।
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