
एंथ्रोपिक के मिथोस मॉडल ने अमेरिकी गुप्त प्रणालियों में खामियां ढूंढीं, वैश्विक एआई नियंत्रण पर बहस तेज
प्रोजेक्ट ग्लासविंग के तहत परीक्षण में मिथोस ने घंटों में संवेदनशील प्रणालियों की कमजोरियां पहचानीं, जिसके बाद अमेरिका ने विदेशी पहुंच रोकी और कानूनी चुनौतियां सामने आईं।
एंथ्रोपिक के कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल मिथोस ने अमेरिकी सरकार की अत्यंत संवेदनशील वर्गीकृत कंप्यूटर प्रणालियों में कमजोरियों की पहचान की है। एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, प्रोजेक्ट ग्लासविंग नामक प्रतिबंधित कार्यक्रम के तहत खुफिया एजेंसियों के साथ संयुक्त परीक्षण में मिथोस ने कुछ ही घंटों में ये खामियां ढूंढ निकालीं। सीनेटर मार्क वार्नर ने एनएसए प्रमुख जोशुआ रड के हवाले से कहा कि मॉडल ने “लगभग सभी वर्गीकृत प्रणालियों को हफ्तों में नहीं, घंटों में भेद दिया”, हालांकि अज्ञात अमेरिकी अधिकारी ने स्पष्ट किया कि यह केवल कमजोरियों की पहचान थी, उनका दोहन नहीं।
प्रोजेक्ट ग्लासविंग सैकड़ों संगठनों को जोड़ता है और इसका उद्देश्य हमलावरों से पहले महत्वपूर्ण सॉफ्टवेयर की कमजोरियां खोजकर उन्हें ठीक करना है। परीक्षण में मिथोस की क्षमता ने साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का ध्यान खींचा, लेकिन एंथ्रोपिक ने अपने सार्वजनिक मॉडल फेबल 5 और मिथोस 5 में अतिरिक्त सुरक्षा उपाय जोड़े हैं। जर्मन मीडिया के अनुसार, संवेदनशील अनुरोधों को ये मॉडल संभालते नहीं, बल्कि सीमित क्षमता वाला क्लॉड ओपस 4.8 कार्यभार लेता है। कंपनी ने दुरुपयोग रोकने के लिए सुरक्षा मानकों को सख्त रखने की बात कही है।
इस घटनाक्रम के तुरंत बाद अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने 12 जून को एंथ्रोपिक को आदेश दिया कि वह फेबल 5 और मिथोस 5 तक “किसी भी विदेशी नागरिक” की पहुंच रोके। कंपनी ने अनुपालन के लिए सभी ग्राहकों की पहुंच बंद कर दी। इस कदम से अमेरिकी कानूनी प्रौद्योगिकी फर्म लीजन लीगलटेक का कारोबार प्रभावित हुआ, जिसने संघीय अदालत में प्रशासन पर मुकदमा दायर कर इस निर्देश को अवैध बताया। कंपनी का कहना है कि कनाडा स्थित उसकी सॉफ्टवेयर टीम की पहुंच कट गई और प्रतिस्पर्धा में पिछड़ने का नुकसान अपूरणीय है।
अमेरिकी प्रतिबंधों ने वैश्विक स्तर पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता संप्रभुता की बहस छेड़ दी है। कनाडाई एआई कंपनी कोहियर के सीईओ एडन गोमेज़ ने लोकतांत्रिक देशों को विदेशी एआई “किराए पर लेने” के बजाय स्वयं नियंत्रण रखने की चेतावनी दी, इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए संरचनात्मक जोखिम बताया। रूसी मीडिया ने इस प्रकरण को एआई निर्यात नियंत्रण का पहला पूर्ण प्रतिबंध बताया और एंथ्रोपिक के नैतिक रुख—निगरानी व स्वायत्त हथियारों में उपयोग से इनकार—तथा ट्रंप प्रशासन के बीच तनाव को रेखांकित किया। भारतीय मीडिया ने भी इस घटनाक्रम को प्रमुखता से स्थान दिया, हालांकि दक्षिण एशियाई प्रौद्योगिकी कंपनियों पर प्रत्यक्ष प्रभाव अभी स्पष्ट नहीं है।
अगला ठोस पड़ाव लीजन लीगलटेक द्वारा निर्देश को रद्द करने और प्रवर्तन पर रोक लगाने की मांग वाली अदालती सुनवाई है। साथ ही, एंथ्रोपिक और प्रशासन के बीच प्रतिबंधों को शीघ्र सुलझाने की बातचीत जारी है। सौ से अधिक साइबर सुरक्षा अधिकारियों ने प्रतिबंध हटाने का आग्रह किया है, जिससे आगामी सप्ताहों में नीतिगत समीक्षा की संभावना बनी हुई है।
| रूसी और सीआईएस प्रेस | −0.70 | critical |
|---|---|---|
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | +0.30 | aligned |
| भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रेस | 0.00 | neutral |
Russia denounces US hypocrisy: the vulnerabilities exposed by Mythos demonstrate the fragility of American systems, and the AI export restrictions are merely a cover for hegemonic control.
By inverting blame, the US vulnerability is used to accuse Washington of hypocrisy, turning a weakness into an attack on others' credibility.
The Russian material omits mentioning that Mythos might be a hacker group with ties to Russia, and does not discuss legitimate US national security concerns.
The United States acts prudently: the vulnerabilities discovered by Mythos require control measures to protect national security, and the AI export restriction is a proportionate response.
By normalizing the reaction, the US response is presented as a technical and depoliticized measure, avoiding discussion of geopolitical implications.
The Atlantic material omits analyzing possible political motivations behind the restrictions and does not mention international criticism of the measure.
India watches carefully: the Mythos incident and US AI restrictions pose challenges and opportunities for its own technological development, requiring an autonomous strategy.
By strategically distancing itself, India presents itself as a neutral actor evaluating implications for its own interests, without openly taking sides.
The Indian material omits analyzing broader geopolitical implications and does not mention reactions from other countries like China or Russia.
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