
मेल ब्रूक्स का शतक: जब हंसी बनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा हथियार
हास्य कला के दिग्गज मेल ब्रूक्स ने 100 वर्ष की आयु में भी यह संदेश दिया कि हंसना सेहत और ख़ुशी का राज़ है, और उनकी विरासत दिखाती है कि हास्य कितना गहरा प्रतिरोध हो सकता है।
28 जून 2026 की रात, इटली के बोलोग्ना शहर के पियात्सा मज्जोरे में 4,000 से अधिक लोगों ने एक साथ मिलकर ‘हैप्पी बर्थडे’ गाया। यह मौक़ा था सिनेमा रित्रोवातो फ़िल्म फ़ेस्टिवल का, जहाँ मेल ब्रूक्स की क्लासिक फ़िल्म ‘फ्रैंकनस्टाइन जूनियर’ की स्क्रीनिंग से पहले दर्शकों ने उनके सौवें जन्मदिन का जश्न मनाया। सांता मोनिका स्थित अपने घर से एक वीडियो संदेश भेजकर ब्रूक्स ने सबका अभिवादन स्वीकार किया—वह व्यक्ति जो एक सदी जीने के बाद भी रचनात्मक रूप से सक्रिय है और आगामी वर्षों के लिए नई परियोजनाओं पर काम कर रहा है।
1926 में ब्रुकलिन के एक यहूदी परिवार में जन्मे मेल्विन जेम्स कामिंस्की ने बचपन में ही पिता को खो दिया और द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिकी सेना के साथ यूरोप में सेवा की। युद्ध की भयावहता और नाज़ियों की क्रूरता ने उनके भीतर हास्य के प्रति एक ख़ास नज़रिया पैदा किया। बाद में उन्होंने कहा, “एक तानाशाह को भाषण से नहीं हराया जा सकता, लेकिन अगर आप उस पर लोगों को हँसा दें, तो उसकी ताकत तोड़ी जा सकती है।” यही दर्शन 1967 में उनकी पहली फ़िल्म ‘द प्रोड्यूसर्स’ में झलका, जिसमें हिटलर को हास्यास्पद पात्र बनाकर उन्होंने ऑस्कर जीता। मैक्सिकन नाट्य निर्माता आलेहांद्रो गोऊ के अनुसार, “मेल ब्रूक्स चार्ली चैपलिन के कद के कलाकार हैं; वे हँसाने के लिए पहले ख़ुद पर हँसते हैं और हर बार हास्य के साँचे तोड़ते हैं।”
ब्रूक्स की हास्य-शैली ने हॉरर, वेस्टर्न और साइंस-फ़िक्शन जैसी विधाओं की पैरोडी करते हुए गहरी सामाजिक टिप्पणियाँ कीं। ‘ब्लेज़िंग सैडल्स’ में नस्लवाद पर चोट की गई तो ‘यंग फ्रैंकनस्टाइन’ ने डरावनी फ़िल्मों को बुद्धि-सम्पन्न हास्य में बदल दिया। भारतीय फ़िल्म प्रेमियों के लिए भी उनका काम दिलचस्प रहा है, क्योंकि उन्होंने सिनेमाई भाषा की जड़ता को चुनौती दी। एगॉट (एमी, ग्रैमी, ऑस्कर, टोनी) जीतने वाले चंद कलाकारों में शामिल ब्रूक्स अक्सर कहते थे कि हास्य मनुष्य की सबसे बड़ी सुरक्षा कवच है। लेखक नील साइमन ने उन्हें “अब तक का सबसे अनूठा हास्य कलाकार” कहा।
जर्मनी में जब ‘द प्रोड्यूसर्स’ का मंचन हुआ, तो ब्रूक्स ने ख़ास संदेश दिया कि यह नाज़ियों का मज़ाक उड़ाता है, पीड़ितों का अपमान नहीं करता। हाल ही में पीपल पत्रिका को दिए साक्षात्कार में उन्होंने लंबी उम्र का राज़ बताया: “हँसना आपको स्वस्थ और ख़ुश रखता है।” अब वह 2027 में आने वाली ‘स्पेसबॉल्स’ की सीक्वल में फिर से योगर्ट की भूमिका निभाने वाले हैं। उनकी आत्मकथा ‘ऑल अबाउट मी’ में उन्होंने लिखा है कि मृत्यु के बारे में सोचना 60 की उम्र के बाद छोड़ दिया—अब तो बस जीने का आनंद लेते हैं।
बोलोग्ना की उस रात, 4,000 लोगों के कोरस के बीच, मेल ब्रूक्स का वीडियो संदेश एक हँसी की लहर बनकर गूँजा—एक ऐसी लहर जिसने पिछले सौ सालों की भयावहताओं और विडंबनाओं को अपने भीतर समेटकर उन्हें सिर्फ़ एक तमाशे में बदल दिया। शायद यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है: यह भरोसा कि जब तक हम हँस सकते हैं, कोई ताक़त हमें पूरी तरह हरा नहीं सकती।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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मेल ब्रूक्स को गोगोल जैसे कलाकार के रूप में देखा गया है जिनकी अतार्किक हास्य कला मानवीय स्थिति की गहराइयों में जाती है। गोगोल की 'डेड सोल्स' के बार-बार संदर्भ उनके भीतर के भावुक अधिकतमवादी को दर्शाते हैं। विश्लेषण से पता चलता है कि पैरोडी के पीछे एक गंभीर साहित्यिक विरासत छिपी है।
मेल ब्रूक्स को अत्याचार के खिलाफ हथियार के रूप में कॉमेडी का उपयोग करने के लिए सराहा जाता है, खासकर हिटलर को हंसी का पात्र बनाकर। यह विश्वास कि व्यंग्य किसी तानाशाह की शक्ति को तोड़ सकता है, प्रतिरोध के एक लचीले रूप के रूप में प्रस्तुत किया गया है। कहानी उनके शताब्दी करियर को हास्य की राजनीतिक ताकत के सबक के रूप में चित्रित करती है।
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