
जुलाई की तपिश और बारिश: जकार्ता से तेहरान तक मौसम की अनिश्चितताएँ
इंडोनेशिया के तटीय गांवों में ज्वार का पानी, ईरान के अहवाज़ में 48 डिग्री पारा और लेबनान के पहाड़ों पर घना कोहरा—दुनिया भर में मौसम अपने ही विरोधाभासों के साथ जुलाई का स्वागत कर रहा है।
सुबह के सात बजे थे जब मध्य जावा के पेकालोंगान के तटीय गांव में समुद्र का पानी धीरे-धीरे घरों की दहलीज़ चाटने लगा। मछुआरे अपनी नावों को ऊंचे बांध के पास बांध रहे थे, नमक किसान अपने खेतों से पानी निकालने की जल्दी में थे। यह कोई तूफ़ान नहीं था, बल्कि रोब—ज्वार का वह चढ़ाव जो हर साल जुलाई की शुरुआत में जावा सागर के उत्तरी तट को अपनी चपेट में ले लेता है। बीएमकेजी के पूर्वानुमान के मुताबिक इस बार लहरों की ऊंचाई एक मीटर तक पहुंच सकती थी, और ठीक वैसा ही हुआ। दर्जनों गांवों में सड़कें पानी में डूब गईं, बंदरगाह पर माल ढुलाई रुक गई और मछली पकड़ने वाली छोटी नौकाएं किनारे पर ही अटकी रह गईं।
यह नज़ारा सिर्फ इंडोनेशिया का नहीं था। उसी सुबह, अहवाज़ के बाज़ार में लोग 48 डिग्री सेल्सियस की तपिश में पंखे और कूलर की तलाश कर रहे थे। ईरान के मौसम विभाग ने पहले ही चेतावनी जारी कर दी थी कि देश के 18 प्रांतों में बादल फटने, ओले गिरने और धूल भरी आंधियों का सिलसिला शुरू होने वाला है। अलबोर्ज़ और तेहरान के पहाड़ी इलाकों में दोपहर बाद आसमान में बिजली चमकी और कुछ ही देर में सड़कें पानी से भर गईं। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार यह सब अल नीनो के विकसित होते स्वरूप का असर था, जो हिंद महासागर के मॉनसून को कमज़ोर कर रहा था और दक्षिण-पूर्व ईरान में बारिश को सामान्य से कम कर रहा था।
भूमध्य सागर के पूर्वी छोर पर लेबनान और इज़राइल इस उमस भरी गर्मी से जूझ रहे थे। बेरूत के समुद्र तट पर नमी 85 प्रतिशत तक पहुंच गई थी, जबकि पहाड़ों पर घना कोहरा छाया हुआ था—ऐसा कोहरा जो आमतौर पर जुलाई में नहीं दिखता। इज़राइल की मौसम सेवा ने जॉर्डन घाटी के लिए ‘रेड अलर्ट’ जारी किया, जहां लू के कारण शरीर का तापमान खतरनाक स्तर तक बढ़ने की आशंका थी। बीट शीआन और किनेरेट झील के आसपास ‘ऑरेंज अलर्ट’ था, और एलात में पारा 37 डिग्री को पार कर गया था। लेबनान के मौसम विभाग ने कहा कि शुक्रवार तक तापमान अपने मौसमी औसत पर लौट आएगा, लेकिन तब तक लोगों को सलाह थी कि वे दोपहर में बाहर न निकलें।
ये सब घटनाएं एक ही वैश्विक लय में बंधी थीं—जलवायु के वे उतार-चढ़ाव जो अब किसी एक देश की सीमा में नहीं रहते। इंडोनेशिया में जहां बीएमकेजी ने 83 मौसमीय क्षेत्रों में शुष्क मौसम के चरम की घोषणा की, वहीं आचे और कालीमंतन में भारी बारिश ने किसानों को चौंका दिया। प्रशांत महासागर में बना उष्णकटिबंधीय चक्रवात 96W और मैडेन-जूलियन दोलन जैसे वायुमंडलीय कारक एक साथ सक्रिय थे, जिससे सूखे और बाढ़ के बीच का फ़ासला कुछ ही दिनों में तय हो रहा था। भारतीय उपमहाद्वीप के लिए यह एक परिचित कहानी है—मॉनसून की अनियमितता, जो अल नीनो के वर्षों में और भी पेचीदा हो जाती है।
पेकालोंगान के उसी तटीय गांव में दोपहर तक पानी उतरने लगा था। एक बुज़ुर्ग मछुआरे ने अपनी नाव के पतवार पर हाथ फेरते हुए आसमान की ओर देखा—न तो बादल थे, न बारिश की कोई उम्मीद, बस एक धुंधली सी चमक थी जो अगले ज्वार के लौटने का इशारा कर रही थी।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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गांवों को जलमग्न करने वाली उच्च ज्वार की घटना मौसमी पैटर्न और जलवायु परिवर्तनशीलता से जुड़ी एक विसंगति है। अधिकारी सतर्कता और तैयारी का आग्रह करते हैं, इस बात पर जोर देते हुए कि ऐसी घटनाएं, हालांकि दुर्लभ हैं, क्षेत्र की जटिल मौसम संबंधी गतिशीलता का हिस्सा हैं। ग्लोबल वार्मिंग से कोई सीधा संबंध नहीं जोड़ा गया है, बल्कि स्थानीय पूर्वानुमान और अनुकूलन उपायों पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
उच्च ज्वार से गांवों का जलमग्न होना एक दैवीय परीक्षा और राष्ट्रीय लचीलेपन की आवश्यकता की याद दिलाने वाला माना जाता है। जहां कुछ लोग वैश्विक जलवायु अन्याय की ओर इशारा करते हैं, वहीं घरेलू तैयारियों और ऐसी घटनाओं के साथ अक्सर आने वाली बारिश की कृपा पर जोर दिया जाता है। इस घटना को आस्था और बुनियादी ढांचे के माध्यम से चरम मौसम का सामना करने की एक व्यापक कथा में रखा गया है।
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