
अमेरिका-ईरान समझौते की आंच में गाजा: युद्धविराम के बावजूद जारी हिंसा और उपेक्षा का संकट
अमेरिका-ईरान युद्ध और उसके बाद की वार्ताओं ने गाजा पट्टी के भविष्य को हाशिए पर धकेल दिया है, जहाँ नाजुक युद्धविराम के बीच भी इजरायली कार्रवाइयाँ और मानवीय त्रासदी जारी है।
अमेरिका और ईरान के बीच पिछले महीने हुए प्रारंभिक समझौता ज्ञापन में गाजा पट्टी का कोई उल्लेख नहीं किया गया, जिसके ठोस परिणाम के रूप में अक्टूबर 2025 के युद्धविराम के बावजूद इजरायली सैन्य कार्रवाइयाँ नहीं रुकी हैं और क्षेत्र में मानवीय संकट गहराता जा रहा है। फलस्तीनी नागरिकों के अनुसार, अमेरिका-ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से दुनिया ने गाजा की त्रासदी को भुला दिया है और इजरायल बिना किसी अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप के हत्याएँ, विनाश और कब्जा जारी रखे हुए है। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) के आँकड़े बताते हैं कि युद्धविराम लागू होने के बाद से 275 बच्चे इजरायली सेना के हमलों में मारे जा चुके हैं, और एक स्वतंत्र संयुक्त राष्ट्र आयोग ने निष्कर्ष निकाला है कि इजरायल ने जानबूझकर बच्चों को निशाना बनाया है।
यूरोपीय विश्लेषकों और इजरायली सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार, गाजा का समझौते से बाहर रहना क्षेत्रीय प्राथमिकताओं में व्यापक बदलाव को दर्शाता है। यूरोपीय परिषद विदेश संबंध के ह्यू लोवाट का कहना है कि ईरान की नज़र में हमास का सामरिक महत्व घट गया है, और तेहरान अब हिजबुल्लाह को क्षेत्रीय संतुलन के स्तंभ के रूप में बचाए रखने पर अधिक जोर दे रहा है। इजरायली सैन्य विशेषज्ञ ईदो हेख्त के अनुसार, हमास ईरान का औजार नहीं बल्कि सहयोगी था, और अक्टूबर 2023 के हमले ने ईरान को असमय युद्ध में धकेल दिया, जिससे यह रिश्ता कमजोर हुआ। वहीं, इजरायल की स्थिति है कि किसी भी राजनीतिक बदलाव से पहले हमास का पूर्ण निरस्त्रीकरण अनिवार्य है, जबकि हमास वैकल्पिक फलस्तीनी शासन की गारंटी के बिना हथियार डालने से इनकार करता है।
राजनयिक सूत्रों के अनुसार, गाजा का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय थकान का शिकार हो रहा है और अधिकांश पक्ष इसे अल्प से मध्यम अवधि में असमाधेय मानते हैं। यरुशलम स्थित एक पश्चिमी राजनयिक का कहना है कि गाजा की अनुपस्थिति प्रगति नहीं बल्कि राजनीतिक गतिरोध को दर्शाती है, क्योंकि ‘अगले दिन’ के लिए कोई विश्वसनीय राजनीतिक ढाँचा मौजूद नहीं है। इस बीच, काहिरा में पर्दे के पीछे बातचीत जारी है, जिसमें हमास सहित फलस्तीनी गुट, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा गठित शांति बोर्ड और कतर व तुर्की जैसे क्षेत्रीय खिलाड़ी शामिल हैं। सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, वार्ताकार हमास के क्रमिक निरस्त्रीकरण और गाजा के लिए अंतरिम शासी प्राधिकरणों के गठन की रूपरेखा पर काम कर रहे हैं, हालाँकि इजरायली मीडिया ने सरकारी हलकों के हवाले से बताया है कि इजरायल ऐसे किसी ढाँचे को अस्वीकार कर देगा।
ज़मीनी हकीकत यह है कि युद्धविराम के बावजूद इजरायली क्वाडकॉप्टर और टैंक हमले जारी हैं, जिनमें पानी भरने गए बच्चे भी मारे जा रहे हैं। फलस्तीनी नागरिक सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, गाजा शहर के पुराने इलाके में एक ड्रोन हमले में एक बच्चे की मौत हुई और दूसरा घायल हो गया। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष का आकलन है कि 96 प्रतिशत बच्चे मृत्यु का भय झेल रहे हैं और पूरी आबादी गहरे मानसिक आघात से गुज़र रही है। एक हज़ार दिन के इस युद्ध ने यह भी स्पष्ट किया है कि इजरायल की सैन्य श्रेष्ठता राजनीतिक लक्ष्य हासिल करने में विफल रही है, और फलस्तीनी पहचान व आत्मनिर्णय की आकांक्षा को हथियारों से नहीं मिटाया जा सका है।
दक्षिण एशिया के लिए यह घटनाक्रम ऊर्जा सुरक्षा और खाड़ी क्षेत्र में कार्यरत प्रवासी समुदाय की सुरक्षा से जुड़े सवाल खड़े करता है, क्योंकि पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता और अमेरिका-ईरान टकराव का सीधा प्रभाव क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता है। फिलहाल, गाजा का राजनीतिक भविष्य काहिरा वार्ता की सफलता पर टिका है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि पुनर्निर्माण अभी दूर की कौड़ी है और ज़मीन पर लोगों के लिए कुछ नहीं बदल रहा है।
| दक्षिण-पूर्व एशियाई प्रेस | −0.70 | critical |
|---|---|---|
| अरब लेवांत-मगरिब प्रेस | −0.20 | neutral |
Palestinians denounce international abandonment and the marginalization of Gaza in US-Iran negotiations.
Direct testimony of a Palestinian is used to create empathy and denounce global hypocrisy, without delving into regional political dynamics.
The geopolitical reasons for Gaza's exclusion, such as parallel US-Iran deals and the Lebanon ceasefire, are omitted.
Lebanon and its political factions recalibrate priorities, setting aside the Gaza cause to ensure internal stability.
The national Lebanese dimension is emphasized and Hezbollah's sincerity is questioned, downplaying Gaza's relevance in the regional context.
The humanitarian suffering in Gaza and the Palestinian perspective are omitted, focusing only on Lebanese political maneuvers.
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