
विश्व कप 2026: नस्लीय गालियों पर शिकंजा, मुंह ढका तो सीधा लाल कार्ड
फ़ीफ़ा विश्व कप के नॉकआउट दौर में खिलाड़ियों पर ऑनलाइन और मैदान पर नस्लीय हमलों की लहर के बीच फ़ीफ़ा ने मुंह ढककर गाली देने पर तत्काल बेदखली का सख्त नियम लागू किया है, जबकि मेज़बान मेक्सिको में बाल शोषण का ख़तरा गहराया है।
जैसे ही फ़ीफ़ा विश्व कप 2026 अंतिम 16 के मुकाबलों में पहुंचा, खिलाड़ियों पर नस्लीय दुर्व्यवहार की आंधी थमने का नाम नहीं ले रही। अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी संघ फ़ीफ़प्रो ने ताज़ा चेतावनी में बताया कि खिलाड़ियों को ऑनलाइन और आमने-सामने 'बढ़ते हुए पैटर्न' के तहत नस्लीय और भेदभावपूर्ण टिप्पणियों का सामना करना पड़ रहा है। फ़ीफ़ा की सोशल मीडिया सुरक्षा सेवा के अनुसार, ग्रुप चरण के दौरान ऑनलाइन गाली-गलौज में 13 गुना का उछाल दर्ज हुआ, जिनमें से 11 फ़ीसदी नस्लीय प्रेरित थीं। नीदरलैंड्स के खिलाड़ी जस्टिन क्लुइवर्ट, क्विंटन टिम्बर और क्रिसेंसियो समरविले को मोरक्को के खिलाफ़ पेनल्टी शूटआउट हारने के बाद ऑनलाइन ज़हर उगलने का शिकार होना पड़ा।
फ़ीफ़प्रो ने ज़ोर देकर कहा कि ये घटनाएँ पृथक नहीं हैं, बल्कि एक 'प्रणालीगत पैटर्न' की ओर इशारा करती हैं जिसे फ़ुटबॉल या समाज का स्वीकृत हिस्सा नहीं रहने दिया जा सकता। बयान में खिलाड़ियों की सुरक्षा, गरिमा और भलाई को सर्वोपरि रखने की मांग करते हुए कहा गया, 'राष्ट्रीय टीम खिलाड़ियों के कार्यस्थल का ही विस्तार है और उनकी उसी आधार पर हिफ़ाज़त की जानी चाहिए।' संगठन ने क़ानूनी एजेंसियों, सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म और प्रशंसकों सहित सभी पक्षों से सामूहिक प्रतिबद्धता की पुकार लगाई, क्योंकि सिर्फ़ निगरानी और रिपोर्टिंग से व्यवहार बदलना या नुकसान रोकना मुमकिन नहीं।
इसी ज़हरीले माहौल को काबू करने के लिए फ़ीफ़ा ने एक बेहद सख्त नियम भी हाथ में लिया है। अब अगर मैदान पर किसी खिलाड़ी ने किसी दूसरे से बहस या झगड़े के दौरान हाथ, आस्तीन या जर्सी से अपना मुंह ढक लिया तो रेफ़री सीधे लाल कार्ड दिखा सकता है। यह क़दम खिलाड़ियों द्वारा अपशब्दों को लिप-रीडिंग कैमरों से छुपाने की कोशिशों को नाकाम करने के लिए उठाया गया है। इस नियम का शिकार पैराग्वे के मिगेल अल्मीरोन और इक्वाडोर के पिएरो इनकापिए पहले ही हो चुके हैं, जिन्हें मैदान से बाहर जाना पड़ा। हालांकि, यूईएफ़ए ने चैंपियंस लीग जैसी प्रतियोगिताओं में इस नियम को अपनाने से इनकार कर दिया है; वह पीला कार्ड और बाद में जांच पसंद करता है।
मैदान के बाहर भी चुनौतियाँ कम नहीं हैं। विश्व कप की मेज़बानी कर रहे मेक्सिको में बाल तस्करी और यौन शोषण का जोखिम चिंताजनक रूप से बढ़ गया है। 65 लाख से अधिक पर्यटकों के आने की उम्मीद के बीच, रिइन्सर्टा संस्था और यूएनएएम के पीयूडीएच ने चेतावनी दी है कि मेक्सिको में पहले से 20 हज़ार नाबालिग तस्करी के शिकार हैं और यह संख्या बढ़ सकती है। सीनेट और ओईसीडी के आंकड़ों के हवाले से बताया गया है कि टूर्नामेंट के दौरान प्राधिकारियों के सुरक्षा पर ज़ोर देने से कमज़ोर वर्गों की सुरक्षा कमज़ोर पड़ जाती है, जिससे तस्करों को पनपने का मौका मिलता है। मैक्सिको सिटी के नागरिक सुरक्षा परिषद के अनुसार, तस्करी की 66 फ़ीसदी पीड़िताएँ महिलाएँ हैं और उनमें से 39 फ़ीसदी नाबालिग हैं; ऑनलाइन बाल यौन शोषण सामग्री में भी 86 फ़ीसदी की बढ़ोतरी दर्ज हुई है। यहाँ तक कि घरेलू हिंसा भी मैचों के दौरान बढ़ जाती है—पसंदीदा टीम के जीतने पर 26 फ़ीसदी और हारने पर 38 फ़ीसदी तक, शराब के सेवन के साथ यह 40 फ़ीसदी तक पहुंच जाती है।
फ़ीफ़प्रो ने साफ़ किया है कि दोषियों के लिए 'सार्थक परिणाम' तय करना और सभी हितधारकों—क़ानून प्रवर्तन, सोशल मीडिया, मीडिया, प्रशंसकों और आम लोगों—की सामूहिक कोशिशों से ही इस दिशा को बदला जा सकता है। अगले दौर के मुकाबले जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, फ़ुटबॉल के इस महाकुंभ पर खिलाड़ियों की सुरक्षा और सामाजिक ज़िम्मेदारी की परीक्षा और तेज़ होती जाएगी।
| अरब लेवांत-मगरिब प्रेस | 0.00 | neutral |
|---|---|---|
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | +0.30 | aligned |
| दक्षिण-पूर्व एशियाई प्रेस | −0.20 | neutral |
The Arab world merely records sporting events without taking a stance on controversies.
Omitting mentions of abuse allows a low-profile, non-critical stance toward host countries.
Reports of racism and child exploitation, present in other sources, are omitted.
Mexico and Latin countries take pride in their World Cup participation and look optimistically to the future.
Focusing on sporting results and fan reactions fosters national unity, overshadowing criticism.
No mention of accusations of racism or child exploitation.
Local governments urge moderation but do not openly criticize the World Cup organization.
A cautious tone avoids direct controversy while acknowledging potential issues.
Similarly, reports of discrimination are omitted.
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