
डिजिटल थकान के दौर में नींद और ध्यान की नई तलाश
दुनिया भर में युवा पीढ़ी सोशल मीडिया के ध्यान-केंद्रित डिज़ाइन से होने वाली थकान से निपटने के लिए नियामक कदमों, उपकरणों और पोषण संबंधी रणनीतियों की ओर रुख कर रही है।
वैश्विक स्तर पर औसत इंटरनेट उपयोगकर्ता प्रतिदिन दो घंटे से अधिक सोशल मीडिया पर बिताता है, और इंडोनेशिया जैसे देशों में यह आँकड़ा और ऊँचा है। इसी के साथ एक विरोधाभासी रुझान उभर रहा है: डिजिटल डिटॉक्स और स्क्रीन समय घटाने की चाहत। इंडोनेशियाई मीडिया विश्लेषण इसकी जड़ अर्थव्यवस्था के उस मॉडल में देखते हैं जहाँ उपयोगकर्ता का ध्यान ही मुख्य मुद्रा है। इंस्टाग्राम और टिकटॉक जैसे प्लेटफ़ॉर्म अनंत स्क्रॉल, वैयक्तिकृत एल्गोरिदम और लगातार सूचनाओं के ज़रिए जुड़ाव बनाए रखने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं, जिससे ‘थोड़ी देर’ का सत्र घंटों में बदल जाता है और मानसिक थकान पैदा होती है।
इस डिज़ाइन का सीधा असर नींद पर पड़ता है। बांग्लादेश के विशेषज्ञ सोने से 30-60 मिनट पहले स्क्रीन बंद करने की सलाह देते हैं, क्योंकि उपकरणों की नीली रोशनी मेलाटोनिन उत्पादन को कम करती है। अर्जेंटीना के पोषण विशेषज्ञ आहार की भूमिका पर ज़ोर देते हैं: ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर मछली और समुद्री भोजन सेरोटोनिन उत्पादन को बढ़ावा देते हैं, जो मेलाटोनिन का अग्रदूत है, जबकि ट्रिप्टोफैन और मैग्नीशियम गहरी नींद में सहायक होते हैं। ब्रिटेन में ज़ेनोवेल का लूना ईयर स्टिमुलेटर ट्रांसक्यूटेनियस ऑरिक्युलर वेगस नर्व स्टिमुलेशन (taVNS) नामक तकनीक का उपयोग करता है, जो कान के माध्यम से वेगस तंत्रिका को हल्की उत्तेजना देकर पैरासिम्पेथेटिक तंत्रिका तंत्र को सक्रिय करने का दावा करता है, हालाँकि इस पर वैज्ञानिक प्रमाण अभी विकासशील अवस्था में हैं।
नियामक प्रतिक्रियाएँ इस समस्या को व्यक्तिगत अनुशासन से परे ले जा रही हैं। यूरोपीय संघ का डिजिटल सेवा अधिनियम प्लेटफ़ॉर्म एल्गोरिदम में पारदर्शिता को अनिवार्य करता है, जबकि ऑस्ट्रेलिया ने 16 वर्ष से कम आयु के उपयोगकर्ताओं के लिए सोशल मीडिया तक पहुँच सीमित करने का क़ानून पारित किया है। इंडोनेशिया के मीडिया अर्थशास्त्र के विश्लेषक इस बात पर ज़ोर देते हैं कि प्लेटफ़ॉर्म की जवाबदेही तय किए बिना केवल व्यक्तिगत साक्षरता पर निर्भर रहना अनुचित है। साथ ही, मीडिया साक्षरता कार्यक्रम युवाओं को स्रोत सत्यापन, फ़्रेमिंग पहचानने और फ़ैक्ट-चेकिंग टूल का उपयोग सिखा रहे हैं, ताकि वे ध्यान अर्थव्यवस्था के निष्क्रिय उपभोक्ता न बनें।
इस बीच, प्रौद्योगिकी का उपयोग उत्पादकता के लिए भी बढ़ रहा है। रूस के वीके एजुकेशन द्वारा 1,000 छात्रों पर किए गए सर्वेक्षण में 85 प्रतिशत ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) सहायकों का उपयोग करने की बात कही, जो अध्ययन के लिए सबसे लोकप्रिय तकनीकी उपकरण बन गए हैं। 76 प्रतिशत छात्रों के लिए पढ़ाई को भविष्य के करियर से जोड़ना मुख्य प्रेरणा है, जबकि 39 प्रतिशत रुचि होने पर घंटों एकाग्र रह सकते हैं। यह आँकड़े बताते हैं कि जेनरेशन ज़ेड तकनीक से दूरी नहीं बना रही, बल्कि उसके साथ एक स्वस्थ संबंध स्थापित करने के तरीके खोज रही है।
अगला ठोस पड़ाव ऑस्ट्रेलिया के सोशल मीडिया आयु प्रतिबंध का कार्यान्वयन होगा, जिसके प्रभाव का आकलन आने वाले वर्षों में किया जाएगा। साथ ही, taVNS जैसी तकनीकों पर नैदानिक परीक्षणों के नतीजे और यूरोपीय संघ में एल्गोरिदम पारदर्शिता की प्रवर्तन रिपोर्ट इस क्षेत्र में अगले मापदंड तय करेंगे।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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तकनीक ध्यान को एक वस्तु में बदल देती है, एक ऐसी पीढ़ी की नींद चुरा लेती है जो अंतहीन स्क्रॉल में फंसी है। युवा आलसी नहीं हैं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था के शिकार हैं जो उनकी चेतना के हर पल का शोषण करने के लिए बनाई गई है। इससे बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता एक आलोचनात्मक जागरूकता है जो प्लेटफार्मों के पीछे की आर्थिक मशीनरी को उजागर करे।
आधुनिक, हमेशा जुड़े रहने वाले पेशेवरों के लिए, रिकवरी अब वैकल्पिक नहीं बल्कि एक रणनीतिक निवेश है। एक अभिनव उपकरण कार्यस्थल उत्पादकता पर लागू होने वाली उसी दक्षता के साथ नींद को अनुकूलित करने का वादा करता है। विडंबना यह है कि वास्तव में डिस्कनेक्ट करने के लिए एक और तकनीक की आवश्यकता होती है, लेकिन प्रतिस्पर्धी बने रहने की यही कीमत है।
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