
मस्जिद में नमाजियों पर हमला, वेस्ट बैंक में बस्तियों के विस्तार की आग
बुरका गांव में यहूदी बाशिंदों ने मस्जिद का दरवाजा तोड़ आग लगाई, फिलिस्तीन ने इसे ‘संगठित आतंकवाद’ बताते हुए संयुक्त राष्ट्र से प्रतिबंधों की मांग की।
वेस्ट बैंक में यहूदी अवैध बस्तियों के बाशिंदों ने रविवार रात एक मस्जिद को आग के हवाले करने की कोशिश की, जब उसके भीतर नमाज़ी मौजूद थे। रामल्ला के पूर्व में स्थित बुरका गांव की इस घटना में हमलावरों ने पहले बाहर खड़े वाहन फूंके, फिर मस्जिद का दरवाजा तोड़ प्रवेश द्वार पर पेट्रोल डालकर आग लगा दी। ग्राम प्रधान के अनुसार, अंदर मौजूद लोगों ने बड़ी मुश्किल से आग पर काबू पाया, वरना बड़ा हादसा हो सकता था। यह कोई अलग-थलग वारदात नहीं, बल्कि पूरे पश्चिमी तट पर एक साथ उठी हिंसा की लहर का सबसे संगीन चेहरा थी।
उसी रात डीर दिब्वान में बाशिंदों ने दो गाड़ियाँ जलाईं और दो को क्षतिग्रस्त किया, जबकि क़लक़ीलिया की जीत बस्ती में चार वाहन और कृषि भूमि आग के हवाले कर दी गई। वहाँ घरों पर पेट्रोल बम फेंके गए। रामल्ला के पश्चिम में अीन अरीक़ गांव में भी हमलावरों ने तीन मकानों को निशाना बनाया और विरोध करने पर गोलियाँ चलाईं। नाब्लुस में बाशिंदों ने अम्मान स्ट्रीट पर उकसाने वाला मार्च निकाला, जबकि तुबास के पूर्व में एक नई चौकी बनाकर फिलिस्तीनियों की ज़मीन पर पशु चराने शुरू कर दिए। हेब्रोन के आसपास भी कई गाँवों पर हमले दर्ज हुए। इस समूचे आक्रमण को अकेले देखना भ्रामक होगा—यह एक सुनियोजित भौगोलिक विस्तार की रणनीति का हिस्सा है, जिसमें बस्तियाँ क्षेत्र को खंडित कर रही हैं और फिलिस्तीनी जीवन को जानबूझकर असहनीय बनाया जा रहा है।
फिलिस्तीनी विदेश मंत्रालय ने प्रतिक्रिया में ‘संगठित आतंकवाद’ शब्द का इस्तेमाल किया और आरोप लगाया कि ये धावे इज़राइली सेना की मूक सहमति या संरक्षण में होते हैं। हालाँकि सेना ने बुरका की घटना पर ‘इज़राइली नागरिकों द्वारा हिंसक दंगे’ भर कहा और बल भेजने की बात स्वीकारी, लेकिन गिरफ़्तारियों की कोई ठोस सूचना नहीं है। फिलिस्तीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से दोषियों पर अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत कार्रवाई और इज़राइल पर प्रतिबंध लगाने की अपील की है, यह तर्क देते हुए कि बस्तियाँ स्वयं युद्ध अपराध हैं और राज्य-प्रायोजित हिंसा को अब ‘नागरिक दंगा’ कहकर अलग नहीं किया जा सकता।
भारतीय और वैश्विक संदर्भ में, यह हिंसा महज़ एक क्षेत्रीय झगड़ा नहीं है। भारत लंबे समय से दो-राष्ट्र समाधान का समर्थक रहा है और फिलिस्तीनी हक़ों के प्रति संवेदनशील रहा है, जबकि इज़राइल के साथ उसके सामरिक संबंध भी मज़बूत हुए हैं। हाल की इस बर्बरता से नई दिल्ली के लिए एक संतुलनकारी कूटनीति की चुनौती पैदा होती है, ख़ासकर तब जब यह पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ाकर खाड़ी सहयोग और ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित कर सकती है। दक्षिण एशिया को भी यह याद दिलाता है कि अधिग्रहण और बस्ती विस्तार की नीति अंततः किसी भी शांति वार्ता को खोखला कर देती है, ठीक वैसे ही जैसे कश्मीर में अतिक्रमण ने कभी समाधान की राह कठिन बनाई।
आगे का रास्ता गंभीर संकेत देता है: अगर अंतरराष्ट्रीय समुदाय सिर्फ बयानबाज़ी तक सीमित रहा, तो ये आग और बंदूकें जल्द ही बड़े जन विस्थापन और संभावित विस्फोटक विद्रोह की चिंगारी बनेंगी। मस्जिद पर हमला महज़ एक घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है—उस व्यवस्था की परिणति जो बस्तियों को स्थायी बना देखना चाहती है और फिलिस्तीनी पहचान के प्रतीकों तक को मिटाने पर आमादा है। इसके रोकथाम के लिए संयुक्त राष्ट्र को न सिर्फ निगरानी, बल्कि बाध्यकारी प्रतिबंधों की ज़रूरत होगी, अन्यथा इतिहास केवल एक और अध्याय दर्ज करेगा जिसमें शब्दों ने आग पर पानी डालने का भ्रम दिया, पर हक़ीकत में राख ही फैली।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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वेस्ट बैंक में एक मस्जिद में आग लगाने की कोशिश की गई जब उसमें लोग थे, इसे प्रार्थना स्थल के खिलाफ गंभीर तोड़फोड़ माना जा रहा है। इज़राइली चरमपंथियों पर संदेह है, लेकिन सुरक्षा सूत्र सामान्यीकरण के खिलाफ चेतावनी देते हैं और पहले से तनावग्रस्त इलाके में शांति बनाए रखने के लिए सुरक्षा बलों के प्रयासों को रेखांकित करते हैं।
ज़ायोनी बाशिंदों का एक नया अपराध पश्चिमी तट में एक भरी हुई मस्जिद को निशाना बनाता है, जो कब्ज़ा करने वाली शक्ति द्वारा मुस्लिम पवित्र स्थलों और फ़िलिस्तीनी उपासकों के ख़िलाफ़ राज्य प्रायोजित आतंक की लहर की पुष्टि करता है। इज़रायली सेना के संरक्षण में किया गया यह हमला योजनाबद्ध नस्लीय सफ़ाए और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की मिलीभगत वाली चुप्पी का और सबूत है।
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