
अमेरिका-ईरान युद्धविराम के बावजूद इसराइल का लेबनान में डटे रहने का ऐलान, ट्रंप से सीधा टकराव
इसराइली रक्षा मंत्री ने कहा कि सेना दक्षिण लेबनान से पीछे नहीं हटेगी और प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने ट्रंप को स्पष्ट कर दिया कि वे समझौते के लेबनान प्रावधान से बंधे नहीं हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम समझौते की घोषणा के तुरंत बाद इसराइल ने उसके एक अहम हिस्से को खुलेआम चुनौती दे दी है। इसराइली रक्षा मंत्री यिसराइल कात्स ने सोमवार को बयान जारी कर कहा कि उनकी सेना दक्षिण लेबनान से किसी भी दबाव के बावजूद पीछे नहीं हटेगी। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को पहले ही बता दिया था कि इसराइल समझौते के लेबनान संबंधी प्रावधान को नहीं मानेगा। कात्स ने यह भी चेतावनी दी कि अगर ईरान ने लेबनान की घटनाओं के चलते इसराइल पर हमला किया तो इसराइल पूरी ताकत से जवाब देगा।
ईरानी और पाकिस्तानी सूत्रों के मुताबिक अमेरिका-ईरान समझौते में लेबनान सहित सभी मोर्चों पर युद्धविराम शामिल है। ट्रंप ने रविवार को बेरूत के दाहिए इलाके पर इसराइली हवाई हमले की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि ऐसा नहीं होना चाहिए था। इसराइली मीडिया के अनुसार ट्रंप ने पहले ही लेबनान में इसराइल की स्वतंत्रता सीमित कर दी थी और ईरान पर हमले की योजना रद्द करने का आदेश दिया था। इन मतभेदों के बीच नेतन्याहू ट्रंप से तत्काल मुलाकात चाहते हैं ताकि हिजबुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई की स्वतंत्रता पर आश्वासन मिल सके।
इसराइल ने लेबनान, सीरिया और गाजा में बिना समय-सीमा के सुरक्षा क्षेत्र बनाए रखने की नीति अपनाई है। कात्स ने इसे 7 अक्टूबर 2023 के हमलों से मिला सबसे बड़ा सबक बताया और कहा कि इन इलाकों को स्थानीय आबादी से खाली कर दिया जाएगा तथा सीमावर्ती गांवों के घरों को ध्वस्त कर दिया जाएगा, जिन्हें वे हिजबुल्लाह के ठिकाने मानते हैं। उन्होंने जमीन पर कब्जे और सुरक्षा क्षेत्रों को युद्ध की “सबसे बड़ी उपलब्धियों” में से एक करार दिया। इसराइल ने लेबनान और ईरान को लेकर अनिश्चितता के मद्देनजर घरेलू मोर्चे पर आपातकाल की अवधि 30 जून तक बढ़ा दी है, जो संभावित संघर्ष के प्रति उसकी तैयारी को दर्शाता है।
इसराइल के इस रुख से पश्चिम एशिया में तनाव बना रहेगा, जिसका सीधा असर भारत समेत दक्षिण एशिया पर पड़ सकता है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा खाड़ी क्षेत्र से आयातित तेल-गैस पर निर्भर है, और किसी भी व्यापक संघर्ष से आपूर्ति श्रृंखला व कीमतों पर दबाव बढ़ेगा। साथ ही, खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी कामगार रहते हैं, जिनकी सुरक्षा चिंता का विषय बन सकती है। भारत को इसराइल, ईरान और अरब देशों के बीच कूटनीतिक संतुलन साधने की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
अमेरिका-इसराइल के बीच बढ़ती दरार समझौते की सफलता में सबसे बड़ी रुकावट बन सकती है। ट्रंप-नेतन्याहू मुलाकात तय करेगी कि वाशिंगटन इसराइल को समझौता मानने के लिए राजी कर पाता है या नहीं। अगर इसराइल लेबनान में कार्रवाई जारी रखता है, तो ईरान-हिजबुल्लाह की जवाबी कार्रवाई से युद्धविराम टूट सकता है और क्षेत्र फिर व्यापक हिंसा में घिर सकता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह समझौता कागजी बयान बनकर रह जाएगा या वास्तविक शांति की ओर ले जाएगा।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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इज़राइल का सैनिक वापसी से इनकार हिज़बुल्लाह के पुनर्सशस्त्रीकरण के विरुद्ध एक सुरक्षा अनिवार्यता है। ईरान अपने प्रॉक्सी को बनाए रखने के लिए एक बार फिर राष्ट्रीय हितों का बलिदान कर रहा है, जिससे वाशिंगटन के साथ समझौता ख़तरे में पड़ गया है।
इज़राइल क्षेत्रीय समझौते की अनदेखी करते हुए दक्षिण के दर्जनों कस्बों को सामूहिक विस्थापन की धमकी देता है। लेबनानी नागरिक फिर से इज़राइली आक्रमण का खामियाजा भुगत रहे हैं, जिससे वाशिंगटन और तेहरान द्वारा कराई गई नाजुक संघर्षविराम कमजोर हो रही है।
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