
इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन लागू: ईरान ने कहा, अमेरिका ने प्रतिरोध मोर्चे को मान्यता दी
संसद अध्यक्ष कालीबाफ ने हिजबुल्लाह, हमास और यमनी नेताओं से कहा कि समझौते में सहयोगियों के खिलाफ युद्ध रोकने और क्षेत्रीय अखंडता की शर्तें शामिल हैं, जिनका क्रियान्वयन कठिन किंतु संभव है।
ईरान के संसद अध्यक्ष और वार्ता दल के प्रमुख मोहम्मद बाकर कालीबाफ ने घोषणा की है कि अमेरिका के साथ हुआ इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन अब लागू हो चुका है। तेहरान में दिवंगत सर्वोच्च नेता के अंतिम संस्कार के दौरान हिजबुल्लाह, हमास और यमन के अंसारुल्लाह के प्रतिनिधिमंडलों से अलग-अलग मुलाकातों में कालीबाफ ने बताया कि ईरान ने वार्ता में इस बात पर जोर दिया था कि प्रतिरोध मोर्चे में उसके सहयोगियों के खिलाफ युद्ध समाप्त करने और लेबनान जैसे देशों की क्षेत्रीय अखंडता सुनिश्चित करने के प्रावधान समझौते का हिस्सा बनें। उनके अनुसार, ये शर्तें अब एक बाध्यकारी अनुच्छेद के रूप में दस्तावेज में शामिल हैं और इनका कार्यान्वयन जारी है, भले ही यह चुनौतीपूर्ण हो।
ईरानी पक्ष ने इस समझौते को कूटनीतिक स्तर पर एक ऐसा मोड़ बताया जिसमें अमेरिका और इजरायल को प्रतिरोध मोर्चे के घटकों को वास्तविक रूप से मान्यता देने के लिए बाध्य होना पड़ा। कालीबाफ ने कहा कि युद्ध के दौरान जब इजरायल ने बेरूत के दाहिया इलाके पर हमला किया, तब वार्ता स्थगित हो गई थी, लेकिन ईरान ने अपनी शर्तों पर अडिग रहते हुए अमेरिकी पक्ष को सहयोगियों की सुरक्षा से जुड़ी पंक्तियां जोड़ने पर राजी किया। हमास के राजनीतिक ब्यूरो प्रमुख मोहम्मद दरविश ने इसी संदर्भ में कहा कि समझौते की हर धारा ईरान की जीत और अमेरिका की हार है, और यह दिखाता है कि ईरान ने कूटनीति के मैदान में भी संतुलन इस्लामी उम्मत के पक्ष में मोड़ दिया है।
हिजबुल्लाह के वरिष्ठ सदस्य मोहम्मद फनीश ने तेहरान में स्पष्ट किया कि लेबनान में युद्धविराम ईरान के हस्तक्षेप और अमेरिका-इजरायल को समझौता ज्ञापन की शर्तें लागू करने के लिए बाध्य करने से ही संभव हुआ। उन्होंने यह भी कहा कि युद्ध की अंतिम समाप्ति भी इसी रास्ते से हो सकती है। यमन के उपराष्ट्रपति मोहम्मद अल-नईमी ने इस मौके पर कहा कि अंसारुल्लाह कूटनीतिक प्रयासों के लिए तैयार है, लेकिन यदि वे विफल होते हैं तो रक्षात्मक कार्रवाई के लिए भी पूरी तरह तैयार है। इन बयानों से संकेत मिलता है कि प्रतिरोध मोर्चे के घटक समझौते को अपनी सैन्य उपलब्धियों की राजनीतिक स्वीकृति के रूप में देख रहे हैं।
कालीबाफ ने क्षेत्रीय परिदृश्य पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अब कई इस्लामी देश यह समझ चुके हैं कि अमेरिका और इजरायल के साथ सहयोग उनके लिए न तो सुरक्षा लाता है और न ही आर्थिक शक्ति। उन्होंने जोर देकर कहा कि ईरान ने समझौते के बाद क्षेत्रीय देशों के साथ पारदर्शी संवाद स्थापित करने का प्रयास किया है और मुस्लिम देशों को आपसी मतभेद भुलाकर एकजुट होना चाहिए। ईरानी संसद अध्यक्ष ने यह भी दोहराया कि कूटनीति की सफलता के लिए पूर्ण सैन्य तैयारी और शहादत की भावना अनिवार्य है, और यही दोहरी नीति दुश्मन को युद्ध की ओर बढ़ने से रोकती है।
ये सभी मुलाकातें दिवंगत सर्वोच्च नेता के शोक समारोह के इतर आयोजित हुईं, जिसमें ईरान ने सैकड़ों अंतरराष्ट्रीय ब्लॉगरों और पत्रकारों को आमंत्रित कर अपनी कूटनीतिक पहुंच प्रदर्शित करने का प्रयास किया। हालांकि, पश्चिमी शक्तियों ने उच्च-स्तरीय प्रतिनिधि भेजने से परहेज किया, जिसे ईरान इंटरनेशनल जैसे मीडिया ने बढ़ते अंतरराष्ट्रीय अलगाव के संकेत के रूप में रेखांकित किया। फिलहाल, समझौता ज्ञापन के क्रियान्वयन की प्रक्रिया जारी है और ईरानी पक्ष ने संकेत दिया है कि अगले चरण में गाजा की स्थिति पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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Iran claims the success of the 'Islamabad understanding', which would guarantee an end to the war against Resistance allies and Lebanon's sovereignty. Iranian diplomacy, backed by military readiness, forced Washington to recognize Tehran's allies. The agreement is being implemented and represents a victory for the Resistance Axis.
The Iran-US deal is presented as a move by Tehran to mask its international isolation, while the regime tries to exploit Khamenei's funeral for propaganda. Qalibaf's statements are framed as an attempt to claim a success that is not reflected in reality.
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