
जी-7 शिखर सम्मेलन: ईरान समझौते पर यूरोपीय चिंता, हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर सवाल
एवियां-ले-बां में जी-7 नेताओं ने ट्रंप के ईरान समझौते पर गहन चर्चा की, यूरोपीय संघ ने अस्थायी समझौते से परमाणु कार्यक्रम स्थिर होने की आशंका जताई और हॉर्मुज की माइन स्वीपिंग में सहयोग की अपेक्षा पर मतभेद उभरे।
फ्रांस के एवियां-ले-बां में सोमवार रात जी-7 नेताओं के भोज के दौरान ईरान के साथ हुए प्रारंभिक समझौते पर गहरी लेकिन स्पष्ट चर्चा हुई। यूरोपीय नेताओं ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को आगाह किया कि एक सतही और अस्थायी समझौता तेहरान के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रमों को खत्म करने के बजाय उन्हें स्थायित्व प्रदान कर सकता है। ट्रंप रविवार को वर्चुअली हस्ताक्षरित इस समझौते को लेकर आश्वस्त दिखे, लेकिन यूरोपीय नेताओं ने स्पष्ट किया कि उनके मन में अब भी कई सवाल हैं, खासकर हॉर्मुज जलडमरूमध्य को वाणिज्यिक जहाजरानी के लिए कितनी तेजी से खोला जाएगा, इस पर अमेरिकी अधिकारियों के बयानों में विरोधाभास नजर आया।
यूरोपीय पक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि कोई भी समझौता ठोस, गंभीर और अंतिम रूप लिए हुए होना चाहिए, न कि केवल युद्धविराम तक सीमित। फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि प्राथमिकता एक मजबूत परमाणु समझौते की है जो ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को वास्तव में सीमित करे। यूरोपीय अधिकारियों की चिंता इस बात को लेकर भी है कि समझौते का पाठ अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है, जिससे पारदर्शिता और दीर्घकालिक प्रवर्तन पर संदेह बना हुआ है। दूसरी ओर, अमेरिकी पक्ष ने उम्मीद जताई कि यूरोपीय देश शत्रुता समाप्त होने के बाद हॉर्मुज जलडमरूमध्य में माइन स्वीपिंग अभियानों में योगदान देंगे, लेकिन इस मुद्दे पर भी सहमति नहीं बन पाई।
यूक्रेन युद्ध को लेकर भी यूरोपीय नेताओं ने ट्रंप पर अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने का दबाव डाला। जी-7 की यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब वैश्विक शक्तियां दो बड़े संघर्षों के समाधान की दिशा तलाश रही हैं, लेकिन यूरोपीय संघ और अमेरिका के बीच दृष्टिकोण का अंतर स्पष्ट हो गया है। यूरोपीय देश चाहते हैं कि ईरान के साथ कोई भी समझौता क्षेत्रीय स्थिरता को मजबूत करे, न कि तेहरान को अपने सैन्य कार्यक्रमों को वैधता दिलाने का मौका दे।
दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत के लिए इस समझौते के दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं। हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरने वाला कच्चा तेल भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, और यदि माइन स्वीपिंग में देरी हुई तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। इसके अलावा, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर यूरोपीय चिंताएं भारत के कूटनीतिक संतुलन को भी प्रभावित करेंगी, क्योंकि नई दिल्ली ईरान के साथ ऊर्जा और चाबहार बंदरगाह जैसे रणनीतिक संबंध रखता है, साथ ही पश्चिमी प्रतिबंध व्यवस्थाओं का पालन भी करता है।
आगे की राह में, शुक्रवार को प्रस्तावित औपचारिक हस्ताक्षर से पहले यूरोपीय संघ के सवालों का समाधान जरूरी होगा। यदि समझौता केवल अस्थायी राहत देता है और ईरान के मिसाइल कार्यक्रम या क्षेत्रीय प्रभाव को नहीं रोकता, तो यह पश्चिमी गठबंधन में नई दरारें पैदा कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि बहुपक्षीय सत्यापन तंत्र और स्पष्ट समयसीमा के बिना यह समझौता दीर्घकालिक शांति की जगह केवल एक और अनिश्चित विराम साबित हो सकता है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
2 संपादकीय समूह · 3 भाषाएँ
एवियन में G7 शिखर सम्मेलन में, यूरोपीय नेता ट्रम्प की परीक्षा लेंगे, चेतावनी देंगे कि ईरान के साथ एक सतही अंतरिम समझौता तेहरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों को मजबूत कर सकता है। वे उनसे यूक्रेन रणनीति पर पुनर्विचार करने का भी आग्रह करेंगे। इस बैठक को ट्रम्प की सहयोगियों की चिंताओं को सुनने की इच्छा की कसौटी के रूप में देखा जा रहा है।
G7 शिखर सम्मेलन में दो घंटे के रात्रिभोज के दौरान, नेताओं ने ईरान समझौते पर स्पष्ट और गहन चर्चा की। यूरोपीय अधिकारियों ने अभी भी बने हुए सवालों को उठाया, विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य को वाणिज्यिक जहाजरानी के लिए फिर से खोलने की समय-सीमा पर, जिस पर अमेरिकी प्रतिक्रियाएँ अलग-अलग रही हैं।
संबंधित लेख
बेडफोर्ड के पास दो यात्री ट्रेनों की टक्कर, कई घायल; चालक की मौत की अपुष्ट सूचना
10 भाषाएँ · 30 स्रोत
भू-राजनीति और राजनीतिलेबनान में इज़रायली हमलों के चलते अमेरिका-ईरान वार्ता स्थगित, युद्धविराम समझौते पर संकट
7 भाषाएँ · 19 स्रोत
खेलअर्जेंटीना से 3-0 की हार के बाद अल्जीरिया ने मेसी के विवादित टैकल पर फीफा में दर्ज कराई शिकायत
8 भाषाएँ · 16 स्रोत