
अमेरिकी खुफिया चेतावनी: नेतन्याहू ईरान समझौते को कमजोर कर सकते हैं, लेबनान संघर्ष बना बाधा
अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने ट्रंप प्रशासन को आगाह किया है कि इज़राइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू, घरेलू राजनीतिक दबाव में, ईरान के साथ उभरते शांति समझौते को विफल करने वाले कदम उठा सकते हैं।
अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू द्वारा ऐसे कदम उठाए जाने की संभावना है जो ईरान के साथ ट्रंप प्रशासन की नवजात शांति पहल को कमजोर कर देंगे। इस सप्ताह वितरित एक आकलन में कहा गया है कि इज़राइल लेबनान में हिजबुल्लाह के विरुद्ध सैन्य अभियान जारी रखने पर दृढ़ है, जो समझौते के उस मूल प्रावधान का उल्लंघन करता है जिसमें लेबनान में शत्रुता समाप्त करने की बात कही गई है। इसी बीच, स्विट्जरलैंड में होने वाली अमेरिका-ईरान वार्ता स्थगित कर दी गई और उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस की यात्रा रद्द हुई, जो बढ़ते तनाव का ठोस परिणाम है।
अमेरिकी खुफिया सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि नेतन्याहू का राजनीतिक भविष्य इस शरद ऋतु में होने वाले चुनावों से पहले इस बात पर निर्भर करता है कि वे जनता को यह विश्वास दिला सकें कि वे लेबनान से सेना नहीं हटाएंगे और हिजबुल्लाह के खिलाफ लड़ाई तेज करेंगे। इज़राइली जनमत सर्वेक्षणों में 70 प्रतिशत यहूदी नागरिकों ने हिजबुल्लाह के विरुद्ध कार्रवाई तेज करने का समर्थन किया है। वहीं, इज़राइली सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने सैन्य गतिविधियों को केवल आत्मरक्षा बताया है। ट्रंप प्रशासन के अधिकारी इस बात पर जोर देते हैं कि समझौता इज़राइल को हिजबुल्लाह के हमलों का जवाब देने से नहीं रोकता, और उनकी प्राथमिकता वैश्विक आर्थिक संकट टालने के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलना है। इज़राइल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-ग्वीर जैसे कट्टरपंथी नेताओं ने सार्वजनिक रूप से उत्तेजक बयान दिए हैं, जिनमें सामूहिक दंड की मांग की गई है।
खुफिया रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि भले ही इज़राइल अपने अभियानों का विस्तार न करे, दक्षिणी लेबनान से सेना हटाने से इनकार करना मात्र इस नाजुक समझौते को ध्वस्त कर सकता है। एक अमेरिकी अधिकारी ने निरंतर सैन्य उपस्थिति को “विनाश का नुस्खा” बताया, जिससे इज़राइली सेना और हिजबुल्लाह के बीच संघर्ष फिर शुरू होना लगभग तय है। विश्लेषकों का मानना है कि नेतन्याहू के लिए ट्रंप के साथ बड़ी दरार का जोखिम है, क्योंकि ट्रंप ने इज़राइल के आग्रह पर ईरान के खिलाफ आर्थिक और परोक्ष युद्ध छेड़ा था, लेकिन अब वे समझौते को स्थायित्व देना चाहते हैं। अमेरिका के पास दबाव के कई उपकरण हैं, जैसे गोला-बारूद, ईंधन, खुफिया जानकारी साझा करना बंद करना या इज़राइली हवाई क्षेत्र की रक्षा कर रहे अमेरिकी बलों को हटाना।
होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति का अहम मार्ग है, और इसका बंद रहना भारत जैसी ऊर्जा आयात-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं के लिए गंभीर संकट पैदा करेगा। भारत के ईरान और इज़राइल दोनों के साथ रणनीतिक संबंध हैं, ऐसे में क्षेत्रीय अस्थिरता सीधे दक्षिण एशिया की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करेगी। अमेरिका-ईरान समझौते की सफलता या विफलता मध्य पूर्व के भू-राजनीतिक संतुलन और वैश्विक तेल बाजारों को आकार देगी, जिसके दूरगामी परिणाम पूरे दक्षिण एशिया पर पड़ सकते हैं।
फिलहाल, वार्ता स्थगित है और तनाव बरकरार है। अमेरिकी प्रशासन अपने सहयोगी की घरेलू मजबूरियों और क्षेत्रीय स्थिरता के अपने रणनीतिक लक्ष्य के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है। आगामी सप्ताह यह परखेंगे कि क्या वाशिंगटन समझौते को बचाने के लिए इज़राइली कार्रवाइयों पर लगाम लगा पाता है, या नेतन्याहू की चुनावी गणना इसे ध्वस्त कर देती है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने कथित तौर पर ट्रंप प्रशासन को चेतावनी दी है कि नेतन्याहू के नेतृत्व में इज़राइल ऐसे कदम उठा सकता है जो ईरान के साथ उभरते शांति समझौते को कमजोर कर सकते हैं। चिंता लेबनान में हिज़्बुल्लाह के खिलाफ सैन्य अभियान जारी रखने के इज़राइल के दृढ़ संकल्प पर केंद्रित है, जो शत्रुता समाप्त करने की मांग वाले समझौते के एक प्रमुख खंड का उल्लंघन होगा। रिपोर्ट नेतन्याहू सरकार और ट्रंप अधिकारियों के बीच बढ़ते तनाव को उजागर करती है।
ट्रंप प्रशासन को खुफिया चेतावनियों से नेतन्याहू के 'भ्रमित करने वाले' इरादे का पता चलता है कि वह ईरान के साथ स्थायी शांति के प्रयासों को संभावित रूप से पटरी से उतार सकते हैं। इज़राइल लेबनान में सैन्य अभियान जारी रखने पर आमादा दिखता है, जिससे उभरते समझौते के एक मुख्य तत्व के उल्लंघन का जोखिम है। यह आकलन नेतन्याहू के मंत्रिमंडल और अमेरिकी अधिकारियों के बीच बढ़ती तनातनी के बीच आया है जिन्होंने सार्वजनिक रूप से इज़राइल को सावधान किया है।
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