
जब आवाज़ और चादर बन जाएँ प्रतिरोध के हथियार: ईरान से अफ़ग़ानिस्तान तक औरतों की ख़ामोश लड़ाई
ईरान में एक गायिका को बिना हिजाब गाने पर 74 कोड़ों की सज़ा और अफ़ग़ानिस्तान में पोशाक को लेकर महिलाओं की गिरफ़्तारियों ने दिखाया कि कैसे व्यक्तिगत आवाज़ और शरीर नियंत्रण के ख़िलाफ़ सबसे तीखा हथियार बन रहे हैं।
ग्यारह दिसंबर 2024 की एक शाम, ईरान की 29 वर्षीय पारस्तू अहमदी ने यूट्यूब पर एक लाइव कॉन्सर्ट प्रसारित किया। उन्होंने लंबी काली पोशाक पहनी थी जिसकी पतली डोरियाँ कंधों पर लगभग अदृश्य थीं, होंठों पर चटकीली लिपस्टिक लगाई थी, और सिर पर कोई हिजाब नहीं था। उनके साथ सात संगीतकार थे। इस प्रदर्शन ने लाखों बार देखा जाने वाला एक वीडियो बन गया, और क़ोम शहर की एक अदालत ने इसे 'सार्वजनिक शील के विरुद्ध अपराध' और 'इंटरनेट पर अश्लील व अनैतिक सामग्री' करार दिया। सज़ा सुनाई गई: 74 कोड़े, दो साल तक ईरान छोड़ने पर प्रतिबंध, और दो साल तक किसी भी कलात्मक गतिविधि पर रोक।
यह सज़ा कोई अचानक आई सख़्ती नहीं थी। ईरान में 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से महिलाओं को मिश्रित दर्शकों के सामने एकल गायन की अनुमति नहीं है, क्योंकि धार्मिक व्यवस्था के अनुसार स्त्री की आवाज़ पुरुषों के लिए 'प्रलोभन और पाप का स्रोत' है। 2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद भड़की लहर ने इस नियम को खुलेआम चुनौती देना शुरू किया—हज़ारों महिलाएँ सड़कों पर बिना स्कार्फ़ के निकलीं, और उनमें से कई को हिंसा, गिरफ़्तारियों और सज़ाओं का सामना करना पड़ा। अहमदी ने अपने वीडियो के नीचे लिखा था: 'मैं एक लड़की हूँ जो उन लोगों के लिए गाना चाहती है जिनसे मैं प्यार करती हूँ। यह एक ऐसा अधिकार है जिसे मैं अनदेखा नहीं कर सकती—उस धरती के लिए गाना जिसे मैं पूरी जान से चाहती हूँ।'
लगभग इसी समय, अफ़ग़ानिस्तान के हेरात प्रांत में एक और किस्म की चुप्पी तोड़ी गई। तालिबान की 'सदाचार प्रसार और बुराई निवारण मंत्रालय' की पुलिस ने दर्जनों महिलाओं को इसलिए गिरफ़्तार कर लिया क्योंकि उन्होंने चादर या बुर्क़ा नहीं पहना था। इसके विरोध में सड़कों पर प्रदर्शन हुए, और इस बार एक नई बात यह थी कि पुरुष भी बड़ी संख्या में महिलाओं के साथ खड़े हुए। तालिबान ने भीड़ पर गोलियाँ चलाईं—कम से कम एक मौत की पुष्टि हुई, और कई घायल हुए। गिरफ़्तार महिलाओं का आज तक कोई पता नहीं है। इतालवी ग़ैर-सरकारी संस्था 'नोवे केयरिंग ह्यूमन्स' की निदेशक लिविया माउरित्सी के अनुसार, हेरात सांस्कृतिक रूप से हमेशा आगे रहा है, और वहाँ का गवर्नर तालिबान के रूढ़िवादी धड़े के क़रीब है, इसलिए वहाँ दमन अधिक कठोर रहा।
अफ़ग़ानिस्तान में यह घटनाक्रम किसी एक क़ानून के उल्लंघन की सज़ा नहीं, बल्कि एक पूरी व्यवस्था का चेहरा है। 2021 में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद से महिलाओं को शिक्षा, नौकरी, सार्वजनिक जीवन, न्याय प्रणाली और यहाँ तक कि मानवीय सहायता संस्थाओं के साथ काम करने से भी क्रमशः बाहर निकाल दिया गया है। संयुक्त राष्ट्र महिला संस्था के आँकड़ों के अनुसार, लगभग 80 प्रतिशत लड़कियाँ स्कूल नहीं जा पातीं। 'नोवे' की सह-संस्थापक एरियाना ब्रिगांती इसे 'संस्थागत लैंगिक भेदभाव' कहती हैं, जिसे कुछ विश्लेषक 'जेंडर अपार्थीड' का नाम दे रहे हैं। हाल ही में सरकारी कर्मचारियों के लिए स्मार्टफ़ोन के इस्तेमाल पर प्रतिबंध जैसे नए आदेश इस अलगाव को और गहरा रहे हैं।
इन दोनों देशों की घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींचा, लेकिन प्रतिक्रिया सीमित रही। यूरोपीय संघ ने हेरात की हिंसा की निंदा की, संयुक्त राष्ट्र ने चिंता जताई। ससेक्स विश्वविद्यालय के अफ़ग़ान विश्लेषक ज़लमई निशात का कहना है कि तालिबान इस समय आर्थिक कमज़ोरी और आंतरिक विरोध के कारण स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, और इसीलिए नागरिक समाज पर आतंक की एक अतिरिक्त खुराक थोप रहे हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि पश्चिमी देशों द्वारा भेजी जा रही नक़दी की मदद से तालिबान अपनी सत्ता मज़बूत कर रहे हैं। दूसरी ओर, ईरान में न्यायिक अधिकारियों ने हिजाब को 'सामाजिक स्थिरता और राष्ट्रीय पहचान का स्तंभ' बताकर सज़ा को सही ठहराया।
पारस्तू अहमदी के कॉन्सर्ट की आख़िरी तस्वीर और हेरात की सड़कों से उठाई गई महिलाओं की अनुपस्थिति—ये दोनों एक ही सच्चाई की ओर इशारा करती हैं। एक आवाज़ जिसने अपनी धरती के लिए गाने का हक़ माँगा, अब कोड़ों की गिनती में तब्दील हो चुकी है। कुछ औरतें जिन्होंने अपने शरीर पर कपड़े का चुनाव करने का साहस किया, अब किसी अज्ञात हिरासत में ख़ामोश हैं। यह प्रतिरोध क्षणिक रोशनी की तरह चमका और फिर उसी ख़ामोशी और अदृश्यता में डूब गया जो इन समाजों में औरतों की नियति बना दी गई है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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ईरान में एक गायिका को बिना हिजाब के प्रदर्शन करने पर 74 कोड़े मारने की सज़ा सुनाई गई, जबकि अफ़गानिस्तान में बुर्का अनिवार्यता के ख़िलाफ़ विरोध करने वाली महिलाओं को गिरफ़्तार कर हिंसक तरीके से दबाया जा रहा है। अफ़गान महिलाओं का मूक प्रतिरोध तालिबान शासन को हिला रहा है, और यूरोप से इन दमनकारी शासनों के साथ सभी वार्ता बंद करने का आग्रह किया जा रहा है।
ईरान में एक गायिका को बिना नक़ाब के प्रदर्शन करने पर 74 कोड़े मारने की सज़ा सुनाई गई, जो आयतुल्लाहों के उन नियमों के अनुरूप है जो महिलाओं को पुरुष दर्शकों के सामने गाने से रोकते हैं। समाचार में फ़ैसले के तथ्य बिना किसी अतिरिक्त टिप्पणी के दिए गए हैं।
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