
जून के अंतिम दिनों की सर्द हवा में, दक्षिण अफ्रीका छोड़ने को मजबूर प्रवासियों की भीड़
एक अवैध अल्टीमेटम, स्वैच्छिक वापसी के लिए कांसुलर दरवाज़ों पर उमड़ते ज़िम्बाब्वेई और नाइजीरियाई नागरिक, और महाद्वीपीय एकता के सवाल पर गहराती खामोशी।
केप टाउन में दक्षिणी गोलार्ध की सर्दियाँ अपने साथ एक भेदती नमी लेकर आती हैं। पिछले सप्ताहों में, ज़िम्बाब्वे के सैकड़ों नागरिक इसी ठंड में अपने वाणिज्य दूतावास के बाहर जमा रहे, कई दिनों तक खुले आसमान के नीचे बैठे रहे। वे सुरक्षा की गुहार लगा रहे थे—दरअसल, वापस घर भेजे जाने की। प्रिटोरिया में नाइजीरियाई उच्चायोग के सामने भी कुछ ऐसा ही दृश्य था, जहाँ फंसे हुए नागरिकों ने विलंब के खिलाफ़ नारे लगाए: “वी नो गो ग्री ओ, वी वान गो”—हम नहीं मानेंगे, हमें जाना है। ये तस्वीरें किसी एक देश की नहीं, बल्कि पूरे महाद्वीप के भीतर उठ रहे एक तूफ़ान की गवाही दे रही थीं, जिसकी आँच 30 जून की एक काल्पनिक समय-सीमा के आसपास और तेज़ हो गई थी।
यह तारीख़ कुछ छोटे, संगठित समूहों द्वारा ‘अवैध प्रवासियों’ को देश छोड़ने के लिए दी गई एक अल्टीमेटम है, जिसका कोई कानूनी बल नहीं है। फिर भी इसने भय का ऐसा वातावरण रच दिया है कि दक्षिण अफ्रीकी पुलिस ने राष्ट्रव्यापी तैनाती बढ़ा दी है और सेना हवाई अड्डों जैसे रणनीतिक स्थलों की सुरक्षा कर रही है। कार्यवाहक पुलिस मंत्री फ़िरोज़ कचालिया ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को दोहराते हुए चेतावनी दी कि “अपराध, धमकी, हिंसा और सार्वजनिक सुरक्षा को कमज़ोर करने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।” इस बीच, स्वैच्छिक वापसी के अभियान कई देशों द्वारा चलाए जा रहे हैं। घाना, मोज़ाम्बिक, नाइजीरिया और ज़ाम्बिया अब तक सैकड़ों नागरिकों को वापस भेज चुके हैं। डरबन में लगभग दस हज़ार मलावी नागरिक अपने घर छोड़कर एक भीड़-भाड़ वाले सामुदायिक स्थल पर डेरा डाले हुए हैं; पाँच हज़ार से अधिक को पहले ही रवाना किया जा चुका है। 19 जून को पीटरमैरिट्ज़बर्ग में एक प्रदर्शन हिंसक हुआ और एक 29 वर्षीय मलावी नागरिक की मौत हो गई। जून के मध्य तक, 2,700 से अधिक विदेशी स्वेच्छा से अपने देश लौट चुके थे।
यह सब एक ऐसे सवाल को सामने लाता है जो घाना के मीडिया में गूँज रहा है: “अफ्रीकियों को जाना ही है… लेकिन कहाँ?” यह प्रश्न अलंकारिक लग सकता है, पर इसकी जड़ें महाद्वीप के औपनिवेशिक अतीत में हैं। आज जिन सीमाओं के आधार पर ‘अपने’ और ‘पराए’ का फ़ैसला होता है, वे कभी यहाँ की जैविक पहचान का हिस्सा नहीं थीं; उन्हें औपनिवेशिक शक्तियों ने प्रशासनिक और निष्कर्षण की सुविधा के लिए खींचा था। एक समय था जब अफ्रीकी लोग संस्कृति और सह-अस्तित्व के विशाल क्षेत्रों में आवाजाही करते थे। आज दक्षिण अफ्रीका, जो 30 प्रतिशत से अधिक बेरोज़गारी झेल रहा है, में प्रवासियों को नौकरियाँ और अपराध का कारण बताकर निशाना बनाया जाता है। पर घानाई विश्लेषक याद दिलाते हैं कि प्रवासी अक्सर वही काम करते या व्यवसाय चलाते हैं जिन्हें स्थानीय लोग नहीं अपना रहे, और संरचनात्मक असंतुलन को संबोधित किए बिना उन्हें निकालने की माँग कोई नीति नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी से बचने का प्रयास है।
इस संकट का गूँज पूरे महाद्वीप में सुनाई दे रही है। नाइजीरिया के नागरिक, जिनमें से 258 को निकाला जा चुका है लेकिन 742 से अधिक अब भी विभिन्न प्रांतों में फंसे हैं, प्रिटोरिया में विलंब के खिलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं—उनके सामने भूख और बेघर होने का संकट है। घाना में ‘घाना फर्स्ट अलायंस’ नामक एक दबाव समूह ने सरकार से माँग की है कि टारक्वा स्थित गोल्ड फील्ड्स खदान का पट्टा 2027 में नवीनीकृत न किया जाए, इसे दक्षिण अफ्रीकी कंपनियों के खिलाफ़ कूटनीतिक जवाबदेही और पारस्परिकता का मामला बताया गया है। दूसरी ओर, दक्षिण अफ्रीका के कुछ राजनीतिक नेताओं, जैसे जूलियस मालेमा, ने घाना की त्वरित निकासी को अनावश्यक बताते हुए कहा कि इससे यह गलत धारणा बनी कि सभी दक्षिण अफ्रीकी विदेशियों के खिलाफ़ हैं। ये तनाव स्थानीय चुनावों से ठीक पहले उभरे हैं, जहाँ मतदाता पंजीकरण के दौरान ही चार राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गोली मारकर हत्या कर दी गई।
डरबन के उस अस्थायी शिविर में, जहाँ दस हज़ार मलावी नागरिकों ने शरण ली है, एक दूसरा स्थल भी बनाया जा रहा है ताकि लगातार आ रहे लोगों को जगह मिल सके। वहाँ से कुछ ही दूरी पर, पीटरमैरिट्ज़बर्ग की सड़कों पर एक 29 वर्षीय युवक की मौत ने इस पलायन की मानवीय कीमत को रेखांकित कर दिया। केप टाउन की सर्द हवा में ज़िम्बाब्वेई नागरिकों की प्रतीक्षा, प्रिटोरिया में नारे लगाती भीड़, और डरबन के शिविरों में सिमटते जीवन—ये सब एक ऐसे महाद्वीप की कहानी कह रहे हैं जो अपनी ही बनाई सीमाओं के भीतर अपनों को पराया ठहराने और एक साझा भविष्य की संभावना के बीच झूल रहा है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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30 जून का अल्टीमेटम दिखाता है कि सड़कों पर उपजा ज़ेनोफोबिक आंदोलन राजनीतिक रूप से कैसे समाहित हो गया—राष्ट्रपति 'अफ्रोफोबिया' की निंदा करते हैं लेकिन आंदोलन के नेताओं का नाम लेने से बचते हैं। आंकड़े बताते हैं कि प्रवासियों में बेरोज़गारी स्थानीय नागरिकों से कम है, और जिन देशों ने कभी रंगभेद-विरोधी निर्वासितों को शरण दी थी, वे अब अपने नागरिकों को निकाल रहे हैं—एक कड़वी ऐतिहासिक विडंबना। संकट को सामान्य ज़ेनोफोबिया नहीं, बल्कि विशेष रूप से अश्वेत अफ्रीकियों के खिलाफ भावना के रूप में देखा जाता है, जो श्वेत और एशियाई विदेशियों को छोड़ देती है।
30 जून की समय-सीमा नज़दीक आते ही पुलिस तैनाती बढ़ा रही है और सतर्कता समूह बिना दस्तावेज़ वाले अफ्रीकियों को धमका रहे हैं। नैतिक सवाल गूंजता है: अगर अफ्रीकियों को जाना ही है, तो वे आखिर जाएं कहां? फंसे हुए नाइजीरियाई अपने उच्चायोग के सामने 'हम जाना चाहते हैं' के नारे लगा रहे हैं, जबकि घाना और नाइजीरिया जैसी सरकारें क्रूर हमलों के बीच वापसी उड़ानों की व्यवस्था कर रही हैं, जिनमें कई लोग मारे जा चुके हैं।
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